सांप के अण्डे सपोले ही जनम देते हैं: खुर्शीद अनवर

 khur
तेरी आंखें

कि उतरता कोई नश्तर मेरे दिल में
दर्द महसूस करूं, या कि फ़िदा हो जाऊं
तेज़ झोंकों में हूं फ़ानूस इनका

रात को चीर दे, और दर्द को गहरा कर दे
ऐसे पेवस्त करो आंखों को सीने में मेरे
तेरी आंखों से मिले ज़ख़्म यूं चमके जैसे
आज के घोर अंधेरों में रोशनी की किरण
कल के ख़्वाबों को भी रोशन कर दे
और मेरी रूह पे भी छा जाए।
और जिस दम मेरी नज़रों से मिले तेरी नज़र
यह भी न याद रहे
हम कभी साथ भी थे, एक ही थी राहगुज़र

तेरे अल्फाज़ मेरा नग़मा थे
मेरे होठों पे वह उभरे थे तरन्नुम बनकर
लेकिन अफसोस कि मौसम बदले
खुशनुमा रंगों पे एक बर्फ की चादर फैली
यूं उड़े लफ़्ज तेरे जैसे परिंदा कोई
अजनबी रास्तों में खो जाए
फिर तेरा साथ छूटा
ख़्वाब के आइने भी टूट गए
दर्द के तूफां में हम डूब गए
ख़्वाब के टुकड़ों की झंकार लिए
ऐ वतन तुझ पे तड़पते ही रहे

तेरी आंखें हैं हम फ़िलिस्तीनी
तेरे हैं नाम हम फ़िलिस्तीनी
तेरे ख्वाब-ओ-ख़याल, जिस्म, लिबास
तेरी खामोशी और तेरी आवाज़
ज़िंदगी हो तेरी कि तेरी मौत
हम फ़िलिस्तीनी हम फ़िलिस्तीनी

तू बयाज़ों में जावेदां है मेरी
मेरी लफ़्जों में जो चिंगारी है
तेरे सीने से ही उठाई है
तेरे मज़मूं मेरा सरमाया हैं
ऐ वतन तेरे नाम पर मैंने
घाटियों को भी यूं ललकारा है!
दुश्मनो – तेरे तुंद घोड़ों से
सामना करना मुझको आता है
वक़्त बदला है पर ये याद रहे
पत्थरों और टापों के आगे
देव-पैकर तुम्हारे हर बुत पर
मेरे नग़मों की जवां चिंगारी
बिजलियां बनके बरसने को है

ऐ वतन तेरे नाम पर मैंने
अपने दुश्मन को यूं ललकारा है
अब मुझे चैन नहीं
नींद आए तो मेरे जिस्म को कीड़े खाएं
तुमको यह याद रहे
चीटिंयां चीलों की नस्लें नहीं पैदा करतीं
सांप के अण्डे सपोले ही जनम देते हैं
तुमको यह याद रहे
पहले भी घोड़ों के रुख हमने पलट रखे हैं
और यकीं आज भी है

अपने बाज़ू में लहू आज भी है।

फिलिस्तीन के इंकलाबी कवि महमूद दरवेश की कविता। अनुवाद: खुर्शीद अनवर

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