साल के शुरू में एक कविता आयी थी यवन की परी. स्त्री की यातना, पीडा़, दर्द और आंसुओं में लिपटी उस कहानी को कहानी भर माना जा सकता था. माना भी गया. मगर यहां जो कुछ हम पढ रहे हैं-वह अपने आसपास की पीडा़ है, वेदना है, यातना है और कुछ सवाल हैं-जिनके जवाब बाकी हैं. हो सकता है कि कुछ प्रतिप्रश्न भी हों, जिन्हें और जिनके जवाब हम समय के साथ तलाशेंगे (कोशिश करेंगे) मगर अभी वे सवाल पूरे के पूरे और दर्द का वह आवेग-पूरा का पूरा. क्या हुआ जो यह सब उस कवि के बारे में है जिसे अपने समय में हम सबसे अधिक प्यार करते हैं, चाहते हैं.
असीमा भट्ट का यह आत्मसंघर्ष कथादेश के जुलाई अंक में छपा है. यह बहुत लंबा है इसलिए यहां उसे क्रमवार रूप से (साभार) दिया जा रहा है. आज पहली किस्त.
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना
असीमा भट्ट
कितनी अजीब बात है जब मैं पत्रकारिता करती थी, लोगों से साक्षात्कार लेती थी और उनके बारे में लिखती थी और जब कुछ खास नहीं होता था तो खीझ कर कहती थी-कहानी में कोई डेप्थ नहीं है संघर्ष नहीं है ! मजा नहीं आ रहा, क्या लिखूं? आज जब अपने बारे में लिखने बैठी हूं तो बड़े पसोपेश में हूं, अपने बारे में लिखना हमेशा कठिन होता है. कहां से शुरू करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा. यह जीवनी नहीं है. हां मेरे जीवन की कड़वी हकीकत जरूर है. कुछ कतरनें हैं, जिन्हें लिखने बैठी हूं. बहुत दिनों से कई मित्र कह रहे थे-अपने बारे में लिखो. पर हमेशा लगता था, अपना दर्द अपने तक ही रहे तो अच्छा. उसे सरेआम करने से क्या फायदा?
लेकिन सुधादी के स्नेह भरे आग्रह ने कलम उठाने पर मजबूर कर दिया क्योंकि यह सच है कि जिसे मैं अपनी निजी तकलीफ मानती हूं, सिर्फ अपना दर्द, वह किसी और का भी तो दर्द हो सकता है. लोहा-लोहे को काटता है इसलिए यह सब लिखना जरूरी है ताकि एक दर्द दूसरे के दर्द पर मरहम रख सके. हो सकता है, जिस कठिन यातना के दौर से मैं गुजरी हूं, कई और मेरी जैसी बहनें गुजरी हों, और शायद वे भी चुप रह कर अपने दर्द और अपमान को छुपाना चाहती हों. या अब तक इसलिए चुप रही हों कि अपने गहरे जख्मों को खुला करके क्या हासिल? खास करके जब जख्म आपके अपने ने दिये हों. वही जो आपका रखवाला था. जिसे अपना सब कुछ मान कर जिसके हाथों में आपने न केवल अपनी जिंदगी की बागडोर सौंप दी बल्कि अपने सपने भी न्योछावर कर दिये.
बिहार के एक प्रतिष्ठित परिवार में मेरा जन्म हुआ. मेरे दादा जी अपने इलाके के जाने-माने डाक्टर थे और उनका सिनेमा हॉल और ईंट के भट्ठे का कारोबार था. समाज में हमारे परिवार का बहुत नाम और इज्जत था. मेरे नाना जी स्वयं जमींदार थे. उनकी काफी खेती-बाड़ी और काफी तादाद में पशु (गाय-बैल और भैंस) थे. पिता जी कम्युनिस्ट थे. बनारस विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. छात्र जीवन से ही वे क्रांतिकारी हो गये. उन्होंने सरकारी तंत्र का कड़ा विरोध किया, जिसके लिए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा. लंबे समय तक उन्हें जेलों के यातनाघर (सेल) में रखा गया. बाद में उनके साथियों ने उनके लिए केस लड़ा और पिता जी जेल से बाहर आये बाद में जेपी आंदोलन में भी वे काफी सक्रिय रहे. मैं अपने माता-पिता की शादी के 14 साल बाद पैदा हुई थी. मेरे जन्म के बाद मेरे चाचा जी ने कहा था, इतने दिनों बाद हुई भी तो बेटी. इस पर मेरे पिता जी हमेशा कहते हैं-क्रांति मेरी ताकत है. मेरा विश्वास है. उन्हें मुझ पर बहुत गर्व था. वे कहते थे एक दिन आयेगा जब लोग कहेंगे देखो वह क्रांति का पिता जा रहा है.
दुनिया में कोई भी शादी इसलिए नहीं होती कि उसका अंजाम तलाक हो. शादी किसी भी लड़की की जिंदगी की नयी शुरुआत होती है. नये सपने, नयी उम्मीदें, नयी उमंगें, बचपन में हर लड़की अपनी दादी-नानी से परियों की कहानी सुनती है. एक परी होती है और एक दिन सफेद घोड़े पर सवार एक राजकुमार आता है और परी को ले जाता है. दुनिया की शायद ही कोई लड़की हो, जिसने ये सपने न देखे हों-सिंड्रेला की तरह.
मेरी शादी पांच जुलाई, 1993 को पटना में हुई. मेरे पति आलोकधन्वा एक प्रतिष्ठित-सम्मानित कवि हैं. खास तौर से संवेदना और प्रेम के कवि. हमारी शादी कई मायनों में भिन्न थी. जाति-बिरादरी के अलावा हमारी उम्र में लंबा अंतराल था. लगभग 20-22 साल का. शादी के वक्त मेरी उम्र 23वर्ष थी और उनकी 45 वर्ष. बड़ी उम्र होने की वजह से हमेशा उनमें एक कुंठा रहती थी. लेकिन शादी के बाद मैंने उम्र को कभी तूल नहीं दिया. प्यार किया तो पूरी तरह से डूब कर प्यार किया. पूरी शिद्दत, पूरी ईमानदारी से. मैं काफ़ी बागी किस्म की लड़की थी. बगैर उनके उम्र और दुनिया की परवाह किये मैं सरेआम, खुली सड़क पर उन्हें गले लगा कर चूम लेती थी और वे झेंपते हुए कहते-तुम प्रेमिकाओं की प्रेमिका हो.
हमारा प्रेम कुछ इस तरह परवान चढ़ा. छोटे शहरों में आज भी रंगमंच के क्षेत्र में कम ही लड़कियां आगे आती हैं. पटना में भी इस क्षेत्र में इनी-गिनी लड़कियां ही थीं. मैं भी उनमें से एक थी. उन दिनों उनकी बेहद मशहूर कविता भागी हुई लड़कियां का मंचन होना था. इसका मंचन संभवतः मई 1993 में हुआ था. उसी दौरान हमारी मुलाकात हुई. मैंने उनकी कविता में भूमिका भी की. शुरू-शुरू में हमारी उस कविता को लेकर बहुत बहस होती थी. अकसर मैं कविता को बारीकी से समझने के लिए पूछती, आखिर आपने यह पंक्ति क्यों लिखी? और वे हंसते हुए जवाब देते-मैंने तुम जैसी लड़कियों के लिए ही लिखा है.
धीरे-धीरे जान-पहचान दोस्ती में बदल गयी. कभी-कभी मैं उनके घर भी जाने लगी. उनकी उम्र को देख कर मुझे हमेशा लगता कि वे शादीशुदा हैं और शायद पत्नी कहीं बाहर रहती हैं या फिर अलग. एक दिन मैंने पूछ ही लिया. आपकी पत्नी कहां रहती हैं. कभी उन्हें देखा नहीं. वे जोर से हंसे और कहा-अरे पगली मैंने शादी नहीं की.
-क्यों?
-इसलिए कि अब तक कोई तुम जैसी पगली मेरी जिंदगी में नहीं आयी.
-आप मजाक कर रहे हैं.
-नहीं! मैं सच कह रहा हूं. तुमने तो जैसी मेरी कविता को सजीव बना दिया. जैसे यह कविता मैंने सिर्फ तुम्हारे लिए ही लिखी थी.
-आप जैसे कवि को कोई अब तक कोई मिली क्यों नहीं आखिर?
-शायद तुम मेरी तकदीर में थीं. वे अकसर ऐसी बातें करते और मैं उन्हें बस यों ही लिया करती थी. हां! एक बात जरूर थी कि उनका बात करने का खास अंदाज मुझे बहुत भाता.
मुझे याद है, एक दिन शरतचंद्र के श्रीकांत की अभया और टाल्सटाय की अन्ना कारेनीना पर बातें हो रही थीं. उन दोनों को देखने की उनकी दृष्टि मुझसे भिन्न थी और मैंने सहमत न होते हुए तपाक से कहा, आपको नहीं लगता, आखिर उन दोनों स्त्रियों (अभया और अन्ना कारेनीना) की तलाश एक ही थी और वह थी प्रेम की तलाश. वे अचानक बोले-तुम्हें पता है जब मर्लिन मुनरो, अन्ना कारेनीना और इजाडोरा डंकन को एक बोतल में मिला कर हिलाया जायेगा तो उससे जो एक व्यक्तित्व तैयार होगा वह हो तुम. तुम्हारे अंदर की आग ही मुझे तुम्हारे प्रति खींचती है. आज तक मुझे तुम जैसी बातें करनेवाली लड़की नहीं मिली. मुझसे शादी करोगी?
अप्रत्याशित सवाल से मैं चौक गयी-सर मैं आपकी कविताएं पसंद करती हूं. आपकी इज्जत करती हूं, लेकिन शादी के बारे में सोच भी कैसे सकती हूं, आप उम्र में मुझसे कितने बड़े हैं.
-तो क्या हुआ? ब्रेख्त की पत्नी हेलेना भी उनसे लगभग 20 वर्ष छोटी थीं. दिलीप साहब और सायरा जी की उम्र तो बाप-बेटी के बराबर है. दिलीप कुमार तो सायरा बानों की मां नसीम बानो के साथ अभिनय कर चुके थे. तुमने बंदिनी देखी है?उसमें अशोक कुमार और नूतन का प्रेम देखा है?
-फिर भी मैं ऐसा नहीं कर सकती. मैं अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी हूं. मेरी मां इसके लिए कभी राजी नहीं होगी.
-उन्हें बताने की क्या जरूरत है. आखिर तुम अपनी जिदंगी अपनी मां और भाई-बहन के लिए नहीं जी रही हो. तुम्हारी जैसी खुद्दार लड़की को अपने फैसले खुद लेने चाहिए. तुम्हें अपनी शर्तों पर जीना चाहिए.
-नहीं मैं आपसे शादी नहीं कर सकती-कहती हुई मैं वापस आ गयी.
उन दिनों मैं एक वर्किंग वीमेंस हॉस्टल में रहती थी और पटना से प्रकाशित होनेवाले हिंदी दैनिक आज में काम करती थी. तीन दिन बाद एक बुजुर्ग महिला (मेरे पति की मित्र) मुझसे मिलने मेरे दफ्तर आयीं और बताया कि तुम्हारे आने के बाद से वह गंभीर रूप से बीमार हैं. तुम्हारे ऑफिस में फोन किया लेकिन तुमने नहीं उठाया. तुम्हारे हॉस्टल भी मिलने गया लेकिन तुमने मिलने से मना कर दिया. वह हताश हो गया है. उसे गहरा सदमा लगा है. एक बार चल कर देख लो. उसे मुझे उनसे शादी नहीं करनी थी इसलिए उनसे मिलने या बात करने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं उनके साथ ही उन्हें देखने उनके घर आ गयी.
वाकई वे बहुत बीमार और कमजोर लग रहे थे. उस वक्त वहां उनके कुछ मित्र भी थे जो मेरे जाते ही बाहर चले गये. और मेरे कवि पति मेरे पैरों पर गिर कर रोने लगे-मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. तुम नहीं जानतीं तुम मेरे लिए कितनी अहमियत रखती हो. तुम्हारे आने से मेरी जिंदगी को एक नया अर्थ मिला है. मैं तुम्हें हमेशा, हर तरह से खुश रखूंगा.
इतना बड़ा कवि मेरे सामने फूट-फूट कर रो रहा था. मैं स्तब्ध थी और अचानक मेरे मुंह से निकला ठीक है, आपको शादी करनी है तो जल्दी कर लीजिए वरना मेरे घरवालों का दबाव पड़ेगा तो मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी. कहने की देर थी और हफ्ते भर में मेरी शादी हो गयी. शादीवाले दिन मेरा मन बहुत उदास था. आखिर मेरी उम्र की लड़कियों की जैसी शादी होती है, वैसा कुछ भी नहीं था. दिल के भीतर से कहीं आवाज उठ रही थी-जो हो रहा है, वह ठीक नहीं है मैं कहीं भाग जाना चाहती थी, ऐसा जी होता था कि किसी सिनेमा हॉल में जा कर बैठ जाऊं ताकि लोग मुझे ढूंढ न पायें. पर मुझे घर से बाहर जाने का मौका नहीं मिला क्योंकि शादी के कुछ दिन पहले से ही मेरे पति मुझे अपने घर ले आये थे, जहां उनकी बहनें लगातार मेरे साथ रहती थीं.
लगातार रोने और मन बेचैन होने से मेरे सर में दर्द था. हमारी शादी एक साहित्य भवन में हुई थी. वहां से घर आ कर मैं जल्दी सोने चली गयी. देर रात तक मेरे पति और उनकी महिला मित्र की आवाजें मेरे कानों में पड़ती रहीं. सुबह जब मैं जागी तो मेरे पति ने मुझसे कहा जाओ-जा कर उनका पैर छुओ.
-किनका? मैं चौंकी.
मैंने देखा, घर में कोई और नहीं था. उन्होंने रात ही अपनी मां-बहन को अपने घर भेज दिया था. थोड़ी देर बाद उनकी बड़ी बहन का फोन आया. उन्होंने पहला सवाल किया, वो मास्टरनिया (वो महिला एक स्कूल में पढ़ाती थी, इसलिए उन्हें सब मास्टरनिया बुलाते थे) रात में कहां थी?
-यहीं हमारे घर पर ही थीं.
-देखो, अब वह घर भी तुम्हारा है और पति भी. अब पति और घर तुम्हें ही संभालना है.
मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि सबने जान-बूझ कर मुझे धोखा दिया. मेरी सास-ननद को सब पता था और सबने मुझे इस आग में झोंक दिया. ऐसी थी मेरी सुहागरात! मैं शादी के पहले दिन ही बुरी तरह से बिखर गयी. मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया. मैं आज तक नहीं समझ पायी आखिर क्यों किया इन्होंने ऐसा?
बाद में मैंने इस पर बड़े धैर्य और प्यार से बात की-सर मैं आपको सर कहती हूं. आपकी बेटी की उम्र की हूं फिर भी आपसे शादी की. लेकिन जब आप किसी और से प्रेम करते थे तो आपने मुझसे शादी क्यों की? आप जैसे इनसान को तो उन्हीं से शादी करनी चाहिए थी, जिससे प्रेम हो.
-मैं उनसे शादी नहीं कर सकता था.
-क्यों?
-क्योंकि वह पहले से शादीशुदा हैं. उनके बच्चे हैं, वे उम्र में मुझसे 12 साल बड़ी हैं.
मैं जैसे आसमान से नीचे गिरी. मेरे मुंह से यकायक निकला- यह कहां की हिप्पोक्रेसी है सर? आप 22 साल छोटी लड़की से शादी कर सकते हैं और 12 साल बड़ी स्त्री से नहीं तो फिर आपको उनसे प्रेम संबंध भी नहीं बनाना चाहिए. पत्नियां जब ऐसे सवाल करती हैं तो उनका क्या हश्र होता है, शायद यह किसी से छिपा नहीं. सबसे घिनौनी बात यह थी कि मेरे पति अपनी महिला मित्र को सार्वजनिक जगहों पर घोषित रूप से दीदी बुलाते थे. सुना है, पुष्पाजी भी भारती जी को राखी बांधा करती थीं, यह इलाहाबाद में सभी जानते थे. भाई-बहन के रिश्ते का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है?
बाद में एक दिन उन दीदी का 60वां जन्मदिन भी हमारे ही घर पर बड़ी धूमधाम से मनाया गया. एक दिन मैंने उनसे कहा, अगर आप में साहस है तो खुल कर इस रिश्ते को स्वीकारें. मुझे खुशी होगी कि मेरे पति में इतनी हिम्मत है. यह कायरोंवाली हरकत देश के इतने बड़े कवि को शोभा नहीं देती. मैं आपका साथ दूंगी. आप उन्हें सार्वजनिक तौर पर स्वीकारें. लेकिन इसके लिए तैयार होने के बजाय उन्होंने मुझे बाकायदा धमकी दी कि मैं यह बात किसी से न कहूं, खास कर उनके भैया-भाभी और बच्चों से. वह दिन मुझे आज भी याद है, जब पहली बार उन्होंने मुझ पर हाथ उठाया. जो इनसान पहले मुझसे कहा करता था कि तुम्हारे अंदर आग है. तुम्हारे सवाल बहुत आंदोलित करते हैं, आज वही मेरे पत्नी होने के मूल अधिकार के सवाल पर मुझे प्रताड़ित कर रहा था. ऐसे में हर लड़की का आसरा मायका होता है पर मैं तो वह दरवाजा पहले ही बंद कर आयी थी. मैं बड़ी मन्नतों-मनौतियों के बाद पैदा हुई थी. इसलिए मुझे दादी और नानी के घर सभी जगह बहुत लाड़-प्यार मिला. सबके लिए मैं भगवान का भेजा हुआ प्रसाद थी. सबकी चहेती, सबकी लाडली, अपनी मरज़ी से शादी करके मैंने सबका दिल तोड़ था. चूंकि मैं कहीं जा नहीं सकती थी इसलिए छह महीने अंदर-ही-अंदर घुटती रही और सब सहती रही. एक दिन तंग आकर मां के पास चली गयी. हालांकि मुझमें मां को सब सच बताने की हिम्मत नहीं थी कि मेरे साथ क्या-क्या हो रहा है लेकिन वह मां थी. वह अपने आप समझ गयी थी कि मैं इस शादी को तोड़ने का फैसला करके आयी हूं. उन्होंने जो कहा उसने मुझे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया. मां ने कहा, हम औरत जात को दो-दो खानदानों की इज्जत निभानी पड़ती है. एक अपने मां-बाप की और दूसरा अपने ससुराल की. अब तुमने जो किया सो किया. अब शादी तो निभानी ही पड़ेगी. वरना लोग क्या कहेंगे? शादी-ब्याह कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल तो है नहीं.
मैं वापस वहीं लौट आयी जहां मेरे लिए एक पल भी जीना मुश्किल था, फिर भी मैंने एक अच्छी पत्नी बन कर घर बसाने की पूरी कोशिश की लेकिन मैं सफल न हो सकी. शायद मैं बंजर धरती पर फूल खिलाने की कोशिश कर रही थी. आज दुख इस बात का है कि जो रिश्ता बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए था उसे मैं सड़ी लाश की तरह घसीटती रही. लहरों के राजहंस में सुंदरी अपने विरेचक (बिंदी) को लगातार इस उम्मीद में गीला रखती है कि उसका पति नंद वापस आ कर उसका श्रृंगार प्रसाधन पूरा करेगा. आखिर सुंदरी हार कर कहती है, मुझे खेद है तो यही कि जितना समय इसे गीला रखना चाहिए था, उससे कहीं अधिक समय मैंने इसे गीला रखा.
मेरा मन कचोटता है-क्यों हर मां सिर्फ अपनी बेटी को ही घर बसाने और बचाने की नसीहत देती है? क्यों घर बचाना सिर्फ औरतों की जिम्मेदारी है? क्यों जब किसी औरत का घर टूटता है तो सारी दुनिया उसे ही कटघरे में खड़ा करती है? क्यों कोई मां अपने बेटे से नहीं कहती कि बेटा, शादी और गृहस्थी की गाड़ी तुम्हें भी चलानी है, कि समाज और खानदान की इज्जत तुम्हारे हाथ में भी है? घर को बचाने की जवाबदेही जितनी पत्नी की है, उतनी पति की क्यों नहीं है? मेरे कई सवालों के उत्तर मुझे आज तक नहीं मिले. क्रमशः


इतने संघर्षों, भयंकर मानसिक संत्रासों के बावजूद आपकी जिजीविषा, गहरा आत्मबोध, स्वाभिमान, उत्कट आत्मविश्वास वाकई प्रेरणास्पद है. तथाकथित मर्दवादी बौद्धिक शिकारियों को आपका यह संघर्ष समझ नही आएगा.
Ye bhart hai quki jha bgwan ram kud apni patni ko aag m jok skte h jinke aasre khte h dunia chlti h to fir is dunia k ye log kese kisi aurt ka saat de skte h jb maa kakai sumitra aurt hokr na saat de pai risto ko niabane or ijjt bachane ka teka hm aurte leti haadmi jaat yo kevl baccha peda lrne ki machine khilona smj kr sadi krte h or hme jnm dene dene wali kud kh deti h ja beti tu khilona bn ja