Feminist Diary – Manisha Pandey

Manisha Pandey
Manisha Pandey

Manisha Pandey, a digital warrior on Facebook was surprised recently when Facebook deleted many of her political posts. Most of these postings protested against capital punishment in general and hanging of Afzal Guru in particular.

Manisha’s writings are an excellent example of how a social network can be used by Feminists to engage with people. Manisha writes in Hindi.This encourages many people to discuss matters of heart and power very openly with her. Her posts and the reactions to her posts are intense and very engaging. We publish here some of Manisha’s Facebook writeups-

अपने घर की बड़ी-बूढियों और पड़ोसिनों, मिश्रा आंटी, तिवारी आंटी और चौबे आंटी से अच्‍छी लड़की होने के लक्षणों और गुणों पर काफी भाषण सुना है। और-तो-और, हॉस्‍टल में भी लड़कियाँ भी अक्‍सर मुझमें एक अच्‍छी लड़की के गुणों का अभाव पाकर उंगली रखती रहती थीं।
अच्‍छी लड़की न होने के बहुत सारे कारण हो सकते थे।
दादी के पैमाने ज्‍यादा संकुचित थे, मां के उनसे थोड़ा उदार और हॉस्‍टल के सहेलियों के थोड़ा और उदार। लेकिन पतित सभी की नजरों में रही हूं। जैसेकि शीशे के सामने चार बार खड़ी हो गई, या कोई रोमांटिक गाना गुनगुनाया, थोड़ा ज्‍यादा नैन मटका लिए, चलते समय पैरों से ज्‍यादा तेज आवाज आई, भाइयों के सामने बिना दुपट्टा हंसी-ठट्ठा किया तो दादी को मेरे अच्‍छी लड़की न होने पर भविष्‍य में ससुराल में होने वाली समस्‍याओं की चिंता सताए जाती थी।
मां इतनी तल्‍ख तो नहीं थीं। उनके हिसाब से घर में चाहे जितना दांत दिखाओ, सड़क या गली से गुजरते हुए चेहरा एक्‍सप्रेशनलेस होना चाहिए। सामने वाले शुक्‍ला जी का लड़का छत पर खड़ा हो तो छत पर मत जाओ। घर में भले बिना दुपट्टा रहो पर छत पर बिना दुपट्टा अदाएं दिखाना पतित होने के लक्षण हैं। अड़ोसी-पड़ोसी लड़कों से ज्‍यादा लडि़याओ मत। पूरा दिन घर से बाहर रहकर घूमने को जी चाहे तो लक्षण चिंताजनक है। रात में घर न लौटकर दोस्‍त के घर रुक जाने या इलाहाबाद यूनिविर्सिटी के गर्ल्‍स हॉस्‍टल में किसी सहेली के कमरे में रात बिताने को जी चाहे तो मां की नींद हराम होने के दिन आ गए हैं, ऐसा समझ लेना चाहिए। जबकि पापा अपने कॉलेज के दिनों के किस्‍से इस उम्र में भी मजे लेकर सुनाते रहे थे कि कैसे घर में उनके पांव ही नहीं टिकते थे, कि साइकिल उठाए वो कभी भी दस दिनों के लिए घर से अचानक गायब हो सकते थे और इलाहाबाद से सौ किलोमीटर दूर तक किसी गांव में जिंदगी को एक्‍स्‍प्‍लोर करते 10-15 दिन बिता सकते थे।
हॉस्‍टल की लड़कियां ज्‍यादा खुली थीं। वहां मैं कह सकती थी कि 20 पार हूं, लड़कों से बात करने को जी चाहता है। आमिर खान बड़ा हैंडसम है, मुझे उससे प्‍यार जैसा कुछ हो गया है। इन बातों को लड़कियां पतित नहीं समझतीं। उनके भी दिलों का वही हाल था। लेकिन वहां भी पतन के कुछ लक्षण प्रकट हुए। जैसेकि ये तू बैठती कैसे है, पैर फैलाकर आदमियों की तरह। मनीषा, बिहेव लाइक ए डीसेंट गर्ल। ये पेट के बल क्‍यूं सोती है, लड़कियों के सोने में भी एक अदा होनी चाहिए।
हॉस्‍टल में मेरी रूममेट और दूसरी लड़कियां दिन-रात मुझमें कुछ स्त्रियोचित गुणों के अभाव को लेकर बिफरती रहतीं और जेनुइनली चिंताग्रस्‍त होकर सिखाती रहतीं कि अगर मुझे एक अच्‍छी लड़की, फिर एक अच्‍छी प्रेमिका, अच्‍छी पत्‍नी और अच्‍छी मां होना है, तो उसके लिए अपने भीतर कौन-कौन से गुण विकसित करने की जरूरत है।
जो मिला, सबने अपने तरीके से अच्‍छी लड़की के गुणों के बारे में समझाया-सिखाया। और मैं जो हमेशा से अपने असली रूप में एक पतित लड़की रही हूं, उन गुणों को आत्‍मसात करने के लिए कुछ हाथ-पैर मारती रही, क्‍योंकि आखिरकार मुझे भी तो इसी दुनिया में रहना है और अंतत: मैं खुद को इग्‍नोर्ड और आइसोलेटेड नहीं फील करना चाहती।
इसलिए कहीं-न-कहीं अपने मन की बात और अपनी असली इच्‍छाएं कहने में डरती हूं, क्‍योंकि मुझे पता है कि वो इच्‍छाएं बड़ी “पतनशील” इच्‍छाएं हैं और सारी प्रगतिशीलता और भाषणबाजी के बावजूद मुझे भी एक अच्‍छी लड़की के सर्टिफिकेट की बड़ी जरूरत है। हो सकता है, अपनी “पतनशील” इच्‍छाओं की स्‍वीकारोक्ति के बाद कोई लड़का, जो मुझसे प्रेम और शादी की कुछ योजनाएं बना रहा हो, अचानक अपने निर्णय से पीछे हट जाए। ‘मैं तो कुछ और ही समझ रहा था, ये तो बड़ी “पतनशील” निकली।’
कोई मेरे दिल की पूछे तो मैं पतित होना चाहती हूं, भले पैरलली अच्‍छी लड़की होने के नाम से भावुक होकर आंसू चुहाती रहूं।
वैसे पतनशील होना ज्‍यादा आसान है और अच्‍छी लड़की बनने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। हो सकता है, मेरे जैसी और ढेरों लड़कियां हों, जो अपनी पतनशीलता को छिपाती फिरती हैं, अच्‍छी लड़की के सर्टिफिकेट की चिंता में। डर रही हूं, कि खुद ही ओखल में सिर दे दिया है, लेकिन अब दे दिया तो दे दिया। चार और साथिनें आगे बढ़कर अपनी पतनशील इच्‍छाएं व्‍यक्‍त करेंगी, तो दिल को कुछ सुकून मिलेगा। लगेगा, मैं ही नहीं हूं साइको, और भी हैं मेरे साथ।

Post 2
मुंबई में जिन तीन अलग-अलग हॉस्‍टलों में मैं रही, उन सब जगहों पर लड़कियों की जिंदगी में एक चीज कॉमन थी, और वह थी आए दिन सिर उठा लेने वाली बोरियत। हमेशा कोई-न-कोई बोरियत की शिकायत करता मिलता। -‘यार बोर हो रहा है। क्‍या करूं, चल वेस्‍टसाइड होकर आते हैं। विंडो शॉपिंग करेंगे। बोरियत जैसे कोई सबसे खूबसूरत रेशमी साड़ी थी, जिसे आपस में बांटकर बारी-बारी से लड़कियां पहना करती थीं। बोरियत के ये दौरे सांवली, कमजोर, साधारण नैन-नक्‍श और मामूली तंख्‍वाहों वाली लड़कियों पर नहीं आते थे। ये गाना ज्‍यादातर वो लड़कियां गाती थीं, जिनके वीकेंड उनके ताजातरीन ब्‍वॉयफ्रेंड के साथ बैंड स्‍टैंड और मरीन ड्राइव पर बीता करते थे। जिनके परफ्यूम तो क्‍या, जूते-चप्‍पल तक खुशबू मारते थे। ये गाना मैं भी गाती थी कभी-कभी, पर मेरा सुर इतना सधा हुआ नहीं था। डेजरे डायस तो जब देखो तक तानपूरा उठाए बोरियत राग का आलाप लेती नजर आतीं। सुबह बोरियत का आलाप चल रहा होता। शाम तक मरीन ड्राइव की एक सैर और AXE का नया डियो। बोरियत दूर भाग जाती। लेकिन कब तक के लिए। दो दिन बाद डियो पुराना पड़ जाता और फिर वही जानलेवा बोरियत। फिर एक नई सैंडिल से जीवन में कुछ दिन नयापन रहता और फिर वही डिप्रेसिंग बोरियत। लिप्‍सटिक के किसी नए शेड में कुछ ज्‍यादा समय तक बोरियत को दूर रखने की कूवत होती थी। नई ब्रांडेड जींस या टी-शर्ट में लिप्‍स्‍टिक के बराबर या उससे कुछ मामूली-सी ज्‍यादा। और भी कुछ चीजें बोरियत भगातीं और जिंदगी में नयापन लातीं, जैसेकि कोई नई हेयर-स्‍टाइल, एकाध किलो वजन कम होना, जींस की नई स्‍टाइलिश बेल्‍ट, ऑक्‍सीडाइज्‍ड या कॉपर ज्‍वेलरी, कोलाबा या कफ परेड में घूमते-शॉपिंग करते बिताई गई कोई शाम, ब्‍वॉयफ्रेंड का एक किस, लिबर्टी या मेट्रो में कोई नई रोमांटिक फिल्‍म, शाहरुख खान का नया लुक या ‘कल हो ना हो’ में प्रीती जिंटा के अमेजिंग आउटफिट्स वगैरह।
मुझे याद है, एक दिन डिनर के बाद सभी टीवी रुम में बैठे बोर होने की शिकायत कर रहे थे। तभी ‘इट्स द टाइम टू डिस्‍को’ टीवी में आने पर अचानक बातचीत का रुख प्रीती जिंटा के वेस्‍टर्न आउटफिट्स की ओर मुड़ गया। देबाश्री और डेजरे की आंखें उत्‍साह से चमकने लगीं। सभी लड़कियां अपने समय के उस बेहद जरूरी कन्‍वर्सेशन में अपना योगदान देने के लिए मचलने लगी

Post 3

जब भी हिंदी और अंग्रेजी की बात चलती है, कॉन्फिडेंट और कमजोर लोगों की बात चलती है, मुझे अपना बचपन और अपना स्‍कूल याद आता है। मेरे पिता प्रतापगढ़ के एक गांव के बेहद गरीब घर में पैदा हुए थे। लेकिन जब वे दस साल के थे, तो दादाजी अपने परिवार को इलाहाबाद ले आए क्‍योंकि वो अपने बच्‍चों को यूनिवर्सिटी में पढ़ाना चाहते थे। यहां एक कमरे के मामूली से घर में रहकर और खुद इलेक्ट्रिशियन का काम करके उन्‍होंने मेरे पापा और ताऊजी को यूनिवर्सिटी तक पढ़ने भेजा। मेरी पढ़ाई भी एक सरकारी हिंदी मीडियम स्‍कूल में हुई, जहां की फीस दो रुपया महीना थी। मैं दो रुपया महीना फीस वाले स्‍कूल में ही पढ़ सकती थी क्‍योंकि अपना पूरा जीवन कम्‍युनिस्‍ट पार्टी को समर्पित कर चुके मेरे पिता की इससे ज्‍यादा फीस भरने की हैसियत नहीं थी। हालांकि तब भी इलाहाबाद में पार्टी की कमान संभाले बड़े लीडरानों के बच्‍चे शहर के सेंट मेरीज और सेंट जोसेफ में ही पढ़ते थे। तीसरी क्‍लास में एक बार पापा मुझे ऐसे ही एक लीडर साहब के घर पार्टी मीटिंग में ले गए। उनकी बेटी से मेरी दोस्‍ती हो गई। उस लड़की ने मुझे अपने स्‍कूल का बैग दिखाया। बहुत सुंदर प्रिंटिंग में बड़े-बड़े चित्रों वाली अंग्रेजी में लिखी हुई किताबें। चमकीला कवर और रंग-बिरंगी कॉपियां। मेरे सरकारी स्‍कूल की सरकारी किताबें तो बहुत मटमैले अखबारी कागज पर छपी हुई और बहुत घटिया बाइंडिंग वाली होती थीं, जो साल खत्‍म होने से पहले फटने लगती थीं। मां बड़े जतन से मोटे वाले सूजे और पतंग के माजे से फटी किताबों की सिलाई करतीं। बड़े लीडर की बेटी स्‍कूल से आए दिन नए-नए प्रोजेक्‍ट लेकर लौटती थी। कभी रंगीन कागजों की गेंद, नाव, चिडि़या बनाती। उसके स्‍कूल में तो हैंडवर्क और चित्र बनाना भी बहुत इंपॉर्टेंट काम होता था। मुझे वो और उसका स्‍कूल दोनों किसी दूसरी दुनिया की चीज लगते थे। मेरे स्‍कूल में तो टीचरें क्‍लास में बैठकर स्‍वेटर बुनती थीं और जाड़े में बालकनी की धूप में खड़े होकर बतियाती थीं। किसी पुरानी कॉपी से क्‍वेश्‍चन-आंसर लिखवा देती थीं और उसी को रटकर आने के लिए कहती थीं। विज्ञान की किताब की हिंदी कथा की किताब की तरह रीडिंग करवाती और गणित की कॉपी को सुलेख वाली कॉपी की तरह सिर्फ हैंड राइटिंग देखकर जांचती थीं। आठवीं पास करने के बाद तक मुझे ये भी नहीं पता था कि अक्षांस और देशांतर रेखाएं क्‍या बला हैं, क्‍योंकि भूगोल की स्‍वेटर बुनने वाली मैडम तो सिर्फ क्‍वेश्‍चन-आंसर लिखवाया था। कुछ समझाया थोड़े न था।
लेकिन फिर भी मैंने विज्ञान, भूगोल और साहित्‍य पढ़ा, समझा। इसलिए नहीं कि ये मुझे स्‍कूल में पढ़ाया गया था, इसलिए कि मेरे पिता एक गरीब, लेकिन पढ़े-लिखे इंसान थे और किताबों कीमत की समझते थे। उन्‍होंने विज्ञान को अपने तरीके से पढ़ाया। स्‍कूल में शुंग वंश, नंद वंश, गुप्‍त काल, मौर्य काल रटाते थे। पापा ने राजा अशोक, धनानंद, चाणक्‍य और गौतम बुद्ध को अपने तरीके से समझाया, जो किताब में नहीं लिखा था।
हम जिस आर्थिक हैसियत से आते थे, उससे हमारे स्‍कूल तय हुए और हमारे आगे का भविष्‍य भी। सेंट मेरीज में पढ़ने वाली लड़की अमेरिका चली गई और मेरे स्‍कूल की लड़कियां शादी करके इलाहाबाद के एजी ऑफिस के क्‍लर्क का घर बसा रही हैं। उस सरकारी हिंदी मीडियम स्‍कूल और वहां के टीचरों से न मुझे ज्ञान मिला, न आत्‍मविश्‍वास। दुनिया में सिर उठाकर जीने की हिम्‍मत भी नहीं। ये सब पापा ने दिया।
आज मैं सोचती हूं कि अगर गरीबी वैसी ही होती, जैसी थी, स्‍कूल वैसा ही होता, जैसा था, टीचर और किताबें भी वैसे ही होते, जैसे थे और बाकी सबकुछ एज इट इज होता, सिर्फ पापा नहीं होते, उनकी किताबें नहीं होतीं तो आज मेरी जिंदगी क्‍या होती।
दो रुपया फीस वाले स्‍कूल में पढ़कर एक गरीब घर की लड़की हार्वर्ड नहीं जा सकती थी। हां, कचहरी के वकील साहब की वकीलाइन जरूर बन सकती थी।
मैंने उस पथेटिक नियति को तोड़ा है। लेकिन आर्य कन्‍या पाठशाला की सब लड़कियां नहीं तोड़ पाईं। सब लड़के भी नहीं तोड़ पाए। वो वैसी ही जिंदगी जी रहे हैं, जो उस आर्थिक और भाषाई हैसियत में मुमकिन थी।

3 thoughts on “Feminist Diary – Manisha Pandey

  1. बहुत अचरज की बात है कि जो मोनोलाग मनीषा की है, वो ही मोनोलाग कितने ही सफल असफल और संघर्षरत युवाओं की भी है, फर्क बस इतना है कि हममेसे अधिकांश उसे भूलाने की जद्दोजेहद में लगे हैं। वो मुहम्मद रफ़ी साहब का गाना जो दिलीप साहब पर फिल्माया गया था, “आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज ना दो”. अफ़सोस कि ये पर्दादारी हमारी संस्कृति बन गई है। सबसे आखरी पोस्ट के सन्दर्भ में ही देखें तो आज भी समाज का दोहरा चरित्र, दोहरी शिक्षा व्यवस्था और दोहरे मापदंड लगातार प्रयोजन में हैं, हम इसे आज भी सराहते हैं, हमें ये परवाह नहीं है कि हम सर्वश्रेष्ट व्यवस्था को अपनायें, हमें बस अपने आपको औरों से बेहतर रहने में आनंद आता है। धर्म, भाषा और संस्कृति मानव समुदाय की बेहतरी के लिए प्रायोजित किये गए हैं। इतनी छोटी सी बात को समझने समझाने में कितनी पुस्तें गँवानी पड़ेगी हमें? हम धर्म, भाषा और संस्कृति की बेहतरी में अपनी महिलाओं को अपने बच्चों को, अपने समाज को झोंके जा रहे हैं, और ना जाने कब तक झोंकते रहेंगे। आज फिल्म “लिंकन” को ओस्कर पुरस्कारों की श्रेणी में सराहा गया, डेनिअल डे लुईस को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला, 2012 में बनी फिल्म 1865 के अमेरिकी समाज के कूढ़ को दिखाता है, एक अवलोकन उस समय के समाज की कमियों का, और एक प्रक्रिया को भी कि समाज की जड़ता को कैसे ख़तम किया जा सकता है। 1865 से आज के समय में उस समुदाय ने काफी प्रगति की है, अपनी कमियों को खोद खोद कर उजागर कर के, हमने भी और हमारे समाज ने भी प्रगति की है, उन कमियों को ढकने के नए नए तरीके निकाल कर। जैसे, कागज़ के प्लेट्स, प्लास्टिक के ग्लास, काफी हद तक छुआ छूत को ढकने में कामयाब हैं, ऐसे ढेरों उदाहरण हैं। जरूरत है कि मनीषा दी का यह मोनोलाग एक संवाद बने, डायलोग बने, और दोहरी प्रवीर्ती को जड़ से चोट करे, एक आमराय हो क्या सही है और क्या होने चाहिए, और जो सही है वो हर कीमत पर होना चाहिए।

  2. Ye ham striyo ki jang he un rudhivadi paramparao se jo hame aage bdhne se rokti hai.par badlav ki shuruwat ho chuki he ab ise koi nhi rok skta…han waqt jarur lgega

  3. हमारी व्यवस्था वर्गों में अंतर बनाये रखने के लिए अलग अलग औजार इस्तेमाल करती है . शिक्षा के अलग अलग स्तर और भाषा उनमे से ही एक है .यह कोई इत्तेफाक नहीं है की सरकारी स्कूल में पड़ी लड़कियां उन्ही की तरह सरकारी स्कूल में पढ़े क्लर्क लड़कों के घर सवारने में लगी है और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ी लड़कियां इंग्लैंड या न्यू योर्क में ( हो सकता है वो भी किसी का घर ही सवार रही हो ) . मेरी शिक्षा दीक्षा कहाँ हुई है उससे मेरा भविष्य तय होता है .
    पिछले २०-२५ सालों में ये अंतर और गहरा गया है. मतलब इस औजार का उपयोग वर्ग अंतर बनाये रखने के लिए ज्यादा नंगे तौर पर हो रहा है .. २०-२५ साल पहले हम जैसे हिंदी स्कूलों में पढ़े लोग इस व्यस्था में कहीं ना कहीं पैर ज़माने में सफल हुए है ( हालंकि ऐसे लोग अधिकतर ऊँची जाती के ) और इस व्यवस्था को गरियाते हुए इसका लाभ भी उठा रहे है. कारण यह की सरकारी स्कूलों में पढ़ने के बावजूद युनिवर्सिटी के दरवाजे हम लोगों के लिए भी खुले थे . उच्च शिक्षा के अधिकतर केंद्र निजी ना होकर सार्वजनिक ही थे . कालेजों की फीस मामूली थी और उनमे पैर फसाने की संभावनाएं थी. पर आज तस्वीर पूरी तरह बदल गयी है . अधिकतर प्रोफेशनल डिग्री कॉलेज निजी है जहाँ निम्न मध्यम वर्ग या निम्न वर्ग के बच्चों का जाना नामुमकिन है और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में भी अधिकतर बच्चे प्राइवेट स्कूलों से ही आते हैं. सरकारी स्कूलों का स्तर इस हद तक गिरा गया है ( गिरा दिया गया है मतलब ये कोई इत्तेफाक नहीं एक सोची समझी साजिश का हिस्स्सा है )कि यहाँ पढ़ कर आप किसी ठीक ठाक कॉलेज में प्रवेश नहीं पा सकते .अगर अपवाद स्वरुप किसी निम्न वर्ग के बच्चे का एडमिशन किसी सार्वजनिक विश्वविद्यालय के कॉलेज में हो भी जाता है तो कम से कम दस बीस हज़ार फीस के लिए चाहिए .ट्युशन फी अभी भी कम ही है पर अलग शुल्कों के नाम पर कॉलेज मोटी फीस वसूल रहे हैं. दस बीस हजार आज के दौर में मामूली रकम लग सकती है पर निम्न वर्ग के लिए आज भी इतने पैसे जुटाना एक समस्या है . I personally know on such case .

    आज कल कि अर्थव्यवस्था में service sector का हिस्सा बढ़ता जा रहा है जहाँ शिक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है और शिक्षा एक commodity बन चुकी है जिसे ख़रीदा और बेचा जा रहा

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