लड़कियाँ – मृत्युंजय प्रभाकर
लड़कियाँ हमारे बचपन में किसी पोशीदा राज की तरह होती थीं लड़कियाँ उनके संसार में वर्जित था हम लड़कों का प्रवेश भले ही वो हमारी बहनें ही क्यूँ न हों उनका होना हमारे लिए किसी अचरज का होना था जैसे किसी और ही ग्रह से थीं वे लड़कियाँ उनके खेल अलग किस्से अलग और विस्मित कर देने वाली मुस्कान भी अभी-अभी रो रही होतीं और … Continue reading लड़कियाँ – मृत्युंजय प्रभाकर