उसके अलावा कुछ भी नहीं – राजेन्द्र राजन

चिड़िया की आंख शुरु से कहा जाता है सिर्फ चिड़िया की आंख देखो उसके अलावा कुछ भी नहीं तभी तुम भेद सकोगे अपना लक्ष्य सबके सब लक्ष्य भेदना चाहते हैं इसलिए वे चिड़िया की आंख के सिवा बाकी हर चीज के प्रति अंधे होना सीख रहे हैं इस लक्ष्यवादिता से मुझे डर लगता है मैं चाहता हूं लोगों को ज्यादा से ज्यादा चीजें दिखाई दें … Continue reading उसके अलावा कुछ भी नहीं – राजेन्द्र राजन

लड़कियाँ – मृत्युंजय प्रभाकर

लड़कियाँ हमारे बचपन में किसी पोशीदा राज की तरह होती थीं लड़कियाँ उनके संसार में वर्जित था हम लड़कों का प्रवेश भले ही वो हमारी बहनें ही क्यूँ न हों उनका होना हमारे लिए किसी अचरज का होना था जैसे किसी और ही ग्रह से थीं वे लड़कियाँ उनके खेल अलग किस्से अलग और विस्मित कर देने वाली मुस्कान भी अभी-अभी रो रही होतीं और … Continue reading लड़कियाँ – मृत्युंजय प्रभाकर

Mayank Saxena

भूलने का दर्शन…

भूलने का दर्शन… *********** भूल जाओ जो कुछ हुआ आगे बढ़े उस से हां लेकिन तुम नहीं बढ़ोगे आगे अपनी मज़हबी-धार्मिक पवित्र किताबों के जिनको हमारे साथ हुए … अन्याय से भी कहीं पहले लिख दिया था अनजान लोगों ने तुम याद रखोगे 600 साल पहले हुआ एक हमला 1400 साल से चल रहा धर्मयुद्ध न जाने कब तोड़ा गया (या फिर नहीं) एक मंदिर … Continue reading भूलने का दर्शन…

अक्सर अकेले में ढुंढती हूँ

अक्सर अकेले में ढुंढती हूँ, उन छः महीनों का हाल, बस खुद को यकीं दिलाने को, के हाँ, शायद मैं बचा सकती थी तुम्हें…. खंगालती हूँ अपने दिमाग का हर इक कोना, याद करने को उस ताले का नंबर, जिसमे छुपाये तुम्हारी डायरी के कुछ पन्ने, शायद अभी भी इंतजार करते होंगे मेरा… तुम्हारी काबिलियत पर कभी भी, शक न था मुझे, तभी तो आज … Continue reading अक्सर अकेले में ढुंढती हूँ