कांशीराम: राजनीति का बेमिसाल रसायनशास्त्री – दिलीप मंडल

कांशीराम साहब की जयंती, 15 मार्च, पर एक लेख दैनिक भास्कर के संडे सप्लिमेंट में छपा है. इसे लिखने में कांशीराम साहब की रचनाओं के संकलन में जुटे ए. आर. अकेला की किताबों से मदद मिली है. इन दिनों में मैं उनके द्वारा संकलित ‘मा. कांशीराम साहब के ऐतिहासिक भाषण’ किताब पढ़ रहा हूं. अकेला जी बेहद धैर्य से एक मुश्किल काम में जुटे हैं, … Continue reading कांशीराम: राजनीति का बेमिसाल रसायनशास्त्री – दिलीप मंडल

अधूरा कोई नहीं – आर. अनुराधा

      सुनती हूं बहुत कुछ जो लोग कहते हैं असंबोधित कि अधूरी हूं मैं- एक बार अधूरी हूं मैं- दूसरी बार क्या दो अधूरे मिलकर एक पूरा नहीं होते? होते ही हैं चाहे रोटी हो या मेरा समतल सीना और अधूरा आखिर होता क्या है! जैसे अधूरा चांद? आसमान? पेड़? धरती? कैसे हो सकता है कोई इंसान अधूरा!   जैसे कि केकड़ों की … Continue reading अधूरा कोई नहीं – आर. अनुराधा

बरसात – कँवल भारती

      (दिलीप मंडल को पढ़ने के बाद) दो किस्म के लोग होते हैं, एक वे जो मानसून के आगे-आगे भागते हैं दूसरे वे जो रोज मानसून में भीगते हैं, पहले किस्म के लोग आनंद लेते हैं मानसून का चाय-पकौड़ों के साथ दूसरे भीगते हैं पेट की आग बुझाने के लिए. हम एक को कह सकते हैं पेट-भरे लोग, और दूसरे को खाली पेट … Continue reading बरसात – कँवल भारती

मैं अब खाली हो गया हूं. बिल्कुल खाली – Dilip Mandal

      मैं अब खाली हो गया हूं. बिल्कुल खाली. मैं अपनी सबसे प्रिय दोस्त के लिए अब पानी नहीं उबालता. उसके साथ में बिथोवन की सिंफनी नहीं सुनता. मोजार्ट को भी नहीं सुनाता. उसे ऑक्सीजन मास्क नहीं लगाता. उसे नेबुलाइज नहीं करता. उसे नहलाता नहीं. उसके बालों में कंघी नहीं करता. उसे पॉल रॉबसन के ओल्ड मैन रिवर और कर्ली हेडेड बेबी जैसे … Continue reading मैं अब खाली हो गया हूं. बिल्कुल खाली – Dilip Mandal