डैड, आपको सलाम, लेकिन जंग अभी बाकी है – संजीव भट्ट के नाम बेटे की चिट्ठी

हम आपको बहुत कुछ पढ़वाने की कोशिश करते हैं। इस में से कुछ ऐसा होता है, जो बेहद ज़रूरी होता है और कुछ ऐसा जो हमें लगता है कि आपके दिल को छुएगा। मनोरंजन भी करवाते हैं, तो ये ही उद्देश्य साथ होते हैं। लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो दिल को भी छूती हैं और ज़रूरी भी होती हैं। हम में से ज़्यादातर … Continue reading डैड, आपको सलाम, लेकिन जंग अभी बाकी है – संजीव भट्ट के नाम बेटे की चिट्ठी

‘जब तक जीवन है लड़ेंगे’ (सोनी सोरी) – देवेश त्रिपाठी की विशेष रिपोर्ट

दिल्ली में जिस वक्त एक सरकार आ गई है और वो देश की तकदीर बदल देने का दावा कर रही है, उसी समय देश की एक महिला और उसके समर्थन में तमाम एक्टिविस्ट, लेखक, वकील, मानवाधिकार कार्यकर्ता फासीवाद को चुनौती देने के लिए एकजुट हो रहे हैं। सोनी सोरी दिल्ली में थी, और अरुंधति राय, प्रशांत भूषण तथा हिमांशु कुमार के साथ एक प्रेस कांफ्रेंस … Continue reading ‘जब तक जीवन है लड़ेंगे’ (सोनी सोरी) – देवेश त्रिपाठी की विशेष रिपोर्ट

बलात्कार का हल फांसी नहीं, स्त्री-पुरुष के बीच के हिमालय को ढहाना है। (विशेष लेख)

2012 के दिसम्बर के बाद, न केवल महिलाओं के प्रति अपराधों को लेकर जागरुकता बढ़ी, बल्कि इसके लिए सिविल सोसायटी से गांव तक के लोग आगे आए। लेकिन दरअसल एक पुराने ढर्रे की मांग भी उठी, कि हमको बलात्कार से निपटने के लिए सख्त क़ानून चाहिए। इतिहास में सख़्त क़ानूनों को लेकर हमेशा दो राय रही हैं, एक कि इनसे ही अपराधियों पर अंकुश लगाया … Continue reading बलात्कार का हल फांसी नहीं, स्त्री-पुरुष के बीच के हिमालय को ढहाना है। (विशेष लेख)

Hille Le Fact Sheets – Religious and Cultural desecration (Gujrat Genocide, 2002)

Hille Le Fact Sheets is a new series. Genocides, Crimes against Humanity, atrocities, Crony Capitalism, Communalism and Fascism are things to be documented in a Democracy. Here we go with the First Fact-Sheet of Gujrat Genocide, 2002. The date-line of the happenings is March, 2002. By 4 p.m. on March 8, 2002. A tarred road replaced the shrine of the grandfather of Urdu poetry, Wali Gujarati, located … Continue reading Hille Le Fact Sheets – Religious and Cultural desecration (Gujrat Genocide, 2002)

सरकार या ईवेंट मैनेजमेंट? – रवीश कुमार

 सौजन्य – एनडीटीवी इंडिया देश काम से चलता है, लेकिन पिछले कई सालों से सरकारें आंकड़ों से काम चला रही हैं। इन आंकड़ों में एक और आंकड़ा शामिल करना चाहिए, बयानों का आंकड़ा। आंकड़े कि कब, किसने, कहां पर और किस तरह का बयान दिया, आपत्तिजनक बयान कौन से थे, किन बयानों का सबने स्वागत किया, किन बयानों पर विवाद हुआ, कौन से बयान वापस … Continue reading सरकार या ईवेंट मैनेजमेंट? – रवीश कुमार

परिधान सेवक, लाल किला, भाषण और भारत… (व्यंग्य)

एक रोज़ देश की आज़ादी अचानक से 68 साल बाद आई और सीधे टीवी और रेडियो पर गूंजने लगी। लगा कि इससे पहले तो आज़ादी थी ही नहीं और इसके बाद मिलेगी नहीं। डेढ़ घंटे तक देश आज़ाद रहा, भाईयों-बहनो, टीवी-रेडियो बंद करने, उसे तोड़ देने या अपना सिर फोड़ लेने की ऐसी आज़ादी कहां मिलती थी पहले? हमारे पास गुप्त सूत्रों के ज़रिए परिधान … Continue reading परिधान सेवक, लाल किला, भाषण और भारत… (व्यंग्य)

देश की आज़ादी की बुनियाद धर्मनिरपेक्षता, सबसे बड़ा देशद्रोह साम्प्रदायिकता – मयंक सक्सेना

इस देश के इतिहास में, वो 14 अगस्त 1947 की अहम रात थी, जब संविधान सभा की बैठक शुरु हुई। संविधान सभा के एक-एक व्यक्ति को ही नहीं पूरे देश को पता था कि अगली सुबह इस देश के लिए दरअसल एक देश बन जाने की सुबह है। उपनिवेश, एक आज़ाद मुल्क बनने वाला था। संविधान सभा की बैठक, महात्मा गांधी के होने और उससे आज़ादी … Continue reading देश की आज़ादी की बुनियाद धर्मनिरपेक्षता, सबसे बड़ा देशद्रोह साम्प्रदायिकता – मयंक सक्सेना

मेरा देश एक उदार भारत है – प्रियदर्शन

मेरे लिए आज़ादी अपनी सारी पहचानों को बचाते हुए अपनी भारतीयता को लगातार मानवीय अर्थों में परखने, और जो उपयुक्त न लगे, उससे पूरी तरह असहमत होने की आज़ादी है। मेरा देश एक उदार भारत है जिसमें अपनी पुरानी जड़ताओं और नई नाइंसाफियों को पहचानने और उसके पार जाने का साहस और सद्भाव दोनों है। इसी साहस ने इसे वह विलक्षण देश बनाया है जो … Continue reading मेरा देश एक उदार भारत है – प्रियदर्शन

आज़ादी की कविताएं – त्रिपुरारी कुमार शर्मा

ये कविताएं पढ़ते हुए आपको लगेगा कि कितनी अहम है आज़ादी और कितना दूर हैं हम उस से… आज़ादी जुबां तुम काट लो या फिर लगा दो होंठ पर ताले मिरी आवाज़ पर कोई भी पहरा हो नहीं सकता मुझे तुम बंद कर दो तीरग़ी में या सलाख़ों में परिंदा सोच का लेकिन ये ठहरा हो नहीं सकता अगर तुम फूँक कर सूरज बुझा दोगे … Continue reading आज़ादी की कविताएं – त्रिपुरारी कुमार शर्मा