साली मुफ्तखोर – Mayank Saxena

गांव गए हो कभी नुक्कड़ पर छप्पर के नीचे सुबह से गांजा लगा कर जुआ खेलते 9 पुरुष आपस में बात करते हैं अपनी औरतों से बेहद परेशान कहते हैं कल साली को खूब मारा आज कल हरामखोर हो गई है काम में मन नहीं लगता है साली मुफ्तखोर दो पड़े हैं देखो कैसे सुबह से लगी है खेत में काम पर अब देखो मुन्ना … Continue reading साली मुफ्तखोर – Mayank Saxena

कुछ मकान बूढ़े हो जाते हैं – Mayank Saxena

कुछ मकान बूढ़े हो जाते हैं जब तो दरकने लगते हैं दरकते मकानों को रास नहीं आती मरम्मत पुताई लेकिन वो करवाता जाता है ये सब कुछ सिर्फ इसलिए कि बचा रहे वो देता रहे लोगों को आसरा मानते रहें लोग उसका अहसान बने रहें शरण में कहते रहें देखो असल तो पुराना ही है नया तो बेकार है कभी लगता है समाज… कहीं कोई … Continue reading कुछ मकान बूढ़े हो जाते हैं – Mayank Saxena

धर्म की जय हो – Mayank Saxena

रक्तों के सागर में स्नान कर आया है खा कर मानव अंतड़ियां नाखूनों में देखो अभी तक भरा है मज्जा का गूदा आंखों से बह रही है हिंसा…और हिंसा उसके नाम अलग अलग हैं उसका तरीका एक ही धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो… Continue reading धर्म की जय हो – Mayank Saxena

तुम सिर्फ गण के कवि हो – Mayank Saxena

मैंने कहा मैं कवि हूं बांध दूंगा अपनी कविता में तुम्हें रोक दूंगा तुम्हारी उत्श्रृंखलता को वो बोला मैं कांवड़िया हूं तोड़ दूंगा तुम्हारी कलम छीन कर जला दूंगा सारे कागज़ हड्डियां छितरा दूंगा फिर लिखना कविता तुम सिर्फ गण के कवि हो और मैं शिव का गण हूं… हर हर महादेव…. Continue reading तुम सिर्फ गण के कवि हो – Mayank Saxena

Peace Begins in the mind of the child- Teesta Setalvad

Side by side with battling communal violence in the public arena, media and the courts, we began a unique experiment in 1994. It was working with young minds supplementing what is taught (or not taught) in the history and social studies curriculum. KHOJ borne of the fires that seared Bombay in 1992-1993 carries on today. One of the techniques we use is that of story … Continue reading Peace Begins in the mind of the child- Teesta Setalvad

Women Becoming Poems – Cynthia Fusillo

Praise to women becoming poems take time to choose truth. Praise to women who don’t have to be good use words to smooth pain into clear voice. Praise to women who belong to sky, stone heaven . . .to their own touch. Praise to women who want more than they are given stealing portions of minutes grateful for seconds to offer themselves to their questions. … Continue reading Women Becoming Poems – Cynthia Fusillo

उसके अलावा कुछ भी नहीं – राजेन्द्र राजन

चिड़िया की आंख शुरु से कहा जाता है सिर्फ चिड़िया की आंख देखो उसके अलावा कुछ भी नहीं तभी तुम भेद सकोगे अपना लक्ष्य सबके सब लक्ष्य भेदना चाहते हैं इसलिए वे चिड़िया की आंख के सिवा बाकी हर चीज के प्रति अंधे होना सीख रहे हैं इस लक्ष्यवादिता से मुझे डर लगता है मैं चाहता हूं लोगों को ज्यादा से ज्यादा चीजें दिखाई दें … Continue reading उसके अलावा कुछ भी नहीं – राजेन्द्र राजन

लड़कियाँ – मृत्युंजय प्रभाकर

लड़कियाँ हमारे बचपन में किसी पोशीदा राज की तरह होती थीं लड़कियाँ उनके संसार में वर्जित था हम लड़कों का प्रवेश भले ही वो हमारी बहनें ही क्यूँ न हों उनका होना हमारे लिए किसी अचरज का होना था जैसे किसी और ही ग्रह से थीं वे लड़कियाँ उनके खेल अलग किस्से अलग और विस्मित कर देने वाली मुस्कान भी अभी-अभी रो रही होतीं और … Continue reading लड़कियाँ – मृत्युंजय प्रभाकर

हल्ला हुआ है जी हल्ला हुआ है – Iqbal Abhimanyu

कहीं किसी रानी के कहीं किसी पोते को बेटा हुआ है, बेटा हुआ है जी बेटा हुआ है, सोने की चम्मच फैशनेबल पालकी फोटोजेनिक चेहरा लेटा हुआ है लेटा हुआ है जी लेटा हुआ है खबर है खबर है जबर है जबर है पेपर में टीवी में हल्ला हुआ है हल्ला हुआ है जी हल्ला हुआ है वो हमारा बाप है पर हैं सुर्खाब के … Continue reading हल्ला हुआ है जी हल्ला हुआ है – Iqbal Abhimanyu

कबिरा खड़़ा मंझधार में – Rakesh Kayasth

कबीरदास अक्सर बड़े लेखको के सपने में आते हैं। मैं छोटा लेखक हूं, लेकिन कबीर मेरे सपने में भी आये। सच कहूं तो कबीर से मेरी मुलाकात कहीं ज्यादा एक्सक्लूसिव थी। मैने कबीर को कुछ वैसे ही देखा जैसा मुन्नाभाई अक्सर बापू को देखा करता था, नींद में या जागते पता नहीं। सपना या अफसाना यहां से शुरू होता है कि कबीर बाज़ार में कहीं … Continue reading कबिरा खड़़ा मंझधार में – Rakesh Kayasth