And because Love battles – Pablo Neruda

And because love battles not only in its burning agricultures but also in the mouth of men and women, I will finish off by taking the path away to those who between my chest and your fragrance want to interpose their obscure plant. About me, nothing worse they will tell you, my love, than what I told you. I lived in the prairies before I … Continue reading And because Love battles – Pablo Neruda

अच्छी होगी फसल मतदान की- गोरख पाण्डेय

छुरा भोंककर चिल्लाये .. हर हर शंकर छुरा भोंककर चिल्लाये .. अल्लाहो अकबर शोर खत्म होने पर जो कुछ बच रहा वह था छुरा और बहता लोहू… इस बार दंगा बहुत बड़ा था खूब हुई थी ख़ून की बारिश अगले साल अच्छी होगी फसल मतदान की – गोरख पाण्डेय Continue reading अच्छी होगी फसल मतदान की- गोरख पाण्डेय

किसी आतंकवादी संगठन से जुड़े सबूत – Rizvi

          मेरा एनकाउंटर कर के  हथियार, गोले, बारूद  किसी आतंकवादी संगठन से जुड़े सबूत  कोई पत्र, कुछ पैसे इत्यादि से मेरी लाश को सजाने से पहले    कम से में कम मेरे शरीर के अंग दान कर देना  ताकि किसी की जान बच जाय  मेरी आँखें भी किसी नेत्रहीन को दे देना    वर्दीवालों डरो नहीं,  मरने के बाद दान की … Continue reading किसी आतंकवादी संगठन से जुड़े सबूत – Rizvi

लड़ने के बहाने पहले से तय हैं – Himanshu Kumar

जन्म लेते ही मुझे हिन्दू, मुसलमान , या फलाना या ढिकाना  बना दिया गया जन्म लेने से पहले ही मेरे दुश्मन भी तय कर दिए गये जन्म से पहले ही मेरी ज़ात भी तय कर दी गयी यह भी मेरे जन्म से पहले ही तय कर दिया गया था कि मुझे किन बातों पर गर्व और किन पर शर्म महसूस करनी है अब एक अच्छा नागरिक होने के लिये मेरा कुछ … Continue reading लड़ने के बहाने पहले से तय हैं – Himanshu Kumar

मैं हूं – Mrityunjay Prabhakar

                गेहूं की बालियों मटर के दानों चावल की बोरियों आलू के खेतों में बनमिर्ची के झुरमुटों आम के दरख्तों जामुन की टहनियों अमरूद के पेड़ों में गांव की गलियों खेतों की पगडंडियों सड़कों के किनारों शहरों की परिधि में रात की चांदनी सहर के धुंधलके शाम की सस्ती चाय दोपहर के सादे भोजन में साइबरस्पेस के किसी … Continue reading मैं हूं – Mrityunjay Prabhakar

बाढ़-टूरिज्म – Iqbal Abhimanyu

देखा है किसी शहर को डूबते हुए? चौखटों, आंगनों, दीवारों, किलकारियों, झल्लाहटों को ‘गड़प’ से मटमैले पानी में गुम हो जाते देखा है? सर पर बर्तन-भांडे, संसार का बोझ लिए लड़खड़ाती औरतों को देखा है? लाइन में लग बासी पुरियों और सड़े आलुओं की सब्जी लेते स्कूल ड्रेस में खड़े बच्चे के कीचड खाए पैरों को देखा है? देखा है गौमाता की सडती लाशों पर … Continue reading बाढ़-टूरिज्म – Iqbal Abhimanyu

मैं तुम्हारे साथ हूं – Mayank Saxena

रुत बदल जाएगी तो क्या मैं तुम्हारे साथ हूं रात भी आएगी तो क्या मैं तुम्हारे साथ हूं आंधियों से लड़ रहा हूं, एक दिए के आसरे लौ भी बुझ जाएगी तो क्या मैं तुम्हारे साथ हूं आंख की कोरों पे टिकता एक आंसू कह रहा रूह घबराएगी तो क्या मैं तुम्हारे साथ हूं जागते रहने की आदत अब पुरानी हो चली नींद भटकाएगी तो … Continue reading मैं तुम्हारे साथ हूं – Mayank Saxena

तुम्हारे साथ रहकर – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गयी हैं, हर रास्ता छोटा हो गया है, दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गयी है जो खचाखच भरा है, कहीं भी एकान्त नहीं न बाहर, न भीतर। तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे लगा है कि हम असमर्थताओं से नहीं सम्भावनाओं से घिरे हैं, हर दिवार में द्वार बन सकता है और हर … Continue reading तुम्हारे साथ रहकर – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

मेरा घर वहां से शुरू होता है… – रिज़वी

जब मैं तुम्हारी कार के शीशे में अपने चेहरे का अक्स देखता हूँ तुम्हारा चेहरा घिनौना क्यों दिखाई देता है? मैं किसी मंगल गृह से नहीं आया, मैं तो अपने घर का वासी हूँ मेरा घर वहां से शुरू होता है जहाँ तुम्हारी गली का चौकीदार मुझे दौड़ा कर थक जाता है जहाँ पुलिस की वर्दी गन्दी होने लगती है जहाँ नगर निगम के अफ़सर … Continue reading मेरा घर वहां से शुरू होता है… – रिज़वी