हर सुबह बरसात का इंतजार करेंगे – Dilip Mandal

    अभी-अभी बरसात के तेज-बहुत तेज होते ही बेटा भीगने भागा बिल्कुल अनुराधा पर गया है. चेजिंग द मानसून नाम की किताब पढ़ने के बाद अनुराधा ने कहा-चेज क्यों करेंगे पीछा क्यों करें चलो, ऐसा करते हैं कि मानसून के आगे-आगे भागते हैं. एक दिन में मानसून अगर 75 किमी जाता है जो शायद जाता है, तो हम हर दिन 100 किमी जाएंगे और … Continue reading हर सुबह बरसात का इंतजार करेंगे – Dilip Mandal

वो मनमोहन सिंह नहीं चुपेन्द्र है – Bodhi Sattva

वह चुपेन्द्र है     रेल का किराया बढ़ा वो चुप है डीजल पेट्रोल का दाम बढ़ा वो चुप है चीनी का भाव चढ़ा वो चुप है प्याज का भाव बढ़ा वो चुप है। वो मनमोहन सिंह नहीं चुपेन्द्र है। Continue reading वो मनमोहन सिंह नहीं चुपेन्द्र है – Bodhi Sattva

श्री लाल शुक्ल…ये आपको समर्पित है – Mayank Saxena

(राग दरबारी के अंश में थोड़ा शब्दों का हेर-फेर कर के ये अंश लिखा गया है…राग दरबारी के प्रेमी या पाठक ही पढ़ें…क्योंकि अन्य के लिए समझना थोड़ा मुश्किल होगा…बुरा न मानें-दिल पर न लें…लेना है तो शांति से काम लें…) उन्होंने लोगों के दो वर्ग बना रखे थेः राष्ट्रवादी और सेक्युलर। वे राष्ट्रवादियों की प्रकट रुप से और सेक्युलरों की गुप्त रुप से सहायता … Continue reading श्री लाल शुक्ल…ये आपको समर्पित है – Mayank Saxena

सच कहना हो ज़रूरी तो जेल में रहिये- पंकज परवेज़

ऐसे हर शख्स को सूली पे चढ़ाया जाये जो कहे सो रहा इंसान जगाया जाये सच कहना हो ज़रूरी तो जेल में रहिये हुक्म मुंसिफ का है, दस्तूर बनाया जाये क्या हिमाक़त है, हमें आईना दिखाता है जल्द महफ़िल में चिराग़ों को बुझाया जाये सरतराशी का बहुत ख़ूब हुनर है उसका रस्म कहती है कि सरताज बनाया जाये ना ज़मीं गोल ना सूरज के लगाती … Continue reading सच कहना हो ज़रूरी तो जेल में रहिये- पंकज परवेज़

दिल्लियाँ चुप रहने के लिए ही होती हैं हमेशा – शलभ श्रीराम सिंह

        हाथी की नंगी पीठ पर घुमाया गया दाराशिकोह को गली-गलीऔर दिल्ली चुप रही लोहू की नदी में खड़ामुस्कुराता रहा नादिर शाहऔर दिल्ली चुप रहीलाल किले के सामने बन्दा बैरागी के मुँह में डाला गयाताज़ा लहू से लबरेज़ अपने बेटे का कलेजाऔर दिल्ली चुप रही गिरफ़्तार कर लिया गयाबहादुरशाह जफ़र कोऔर दिल्ली चुप रहीदफ़ा हो गए मीर गालिबऔर दिल्ली चुप रही दिल्लियाँ चुप रहने के … Continue reading दिल्लियाँ चुप रहने के लिए ही होती हैं हमेशा – शलभ श्रीराम सिंह

वरना तो मुक्तिबोध की कविता हैं हम – Mayank Saxena

आदिवासी गरीब जूठन चाटते लोग आत्महत्या करते किसानों दिमागी बुखार हैजे कुपोषण से मरते बच्चों चूहा खाते मुसहरों और मैला ढोते लोगों के देश में मेरा तुम पर तुम्हारे भगवान पर और मुसलमानों पर टमाटर फेंकने थूकने वाले लोगों पर लिखते रहना वाकई कितना अश्लील है न ये ही लोग बदलेंगे देश और इसलिए अब मैं नहीं लिखूंगा सिर्फ देखूंगा कि तुम्हारा लोकतंत्र मुझे लिखने … Continue reading वरना तो मुक्तिबोध की कविता हैं हम – Mayank Saxena

मैं देखता हूं इसमें फासीवाद का उफान – Mayank Saxena

आप उसे जनसमुद्र जनसमर्थन जनता की भावना जनमत न जाने क्या क्या कहते हो मैं देखता हूं इसमें फासीवाद का उफान इस भीड़ को देख कर याद पड़ता है बिना शक लेकिन डरते हुए एक जनसैलाब इससे भी बड़ा था वो जो आया था ऐसी ही टोपियां पहने ऐसे ही झंडे थामे और एक मस्जिद नहीं समूचे दक्षिण एशिया की मोहब्बत और साथ की नींव ढहा कर अपने-अपने घर लौट गया था हंसते, नारे लगाते एक दूसरे को चुटकुले सुनाते और मैं इस भीड़ को देख डर जाता हूं जब … Continue reading मैं देखता हूं इसमें फासीवाद का उफान – Mayank Saxena

मैं नहीं लिखूंगा तब तक – Mayank Saxena

मैं नहीं लिखूंगा तब तक जब तक कि तुम समझ नहीं जाते कि इंसान सिर्फ इंसान है वो हो ही नहीं सकता यहूदी ईसाई मुसलमान हिंदू या कुछ और और तब तक तुम कोशिश करते रहना कि मैं लिखूं तुम्हारे बारे में एक भी लफ़्ज़ जो मैं सोच लिख बोल नहीं सकता… Continue reading मैं नहीं लिखूंगा तब तक – Mayank Saxena