Why I am returning my award – Arundhati Roy

Although I do not believe that awards are a measure of the work we do, I would like to add the National Award for Best Screenplay that I won in 1989 to the growing pile of returned awards. Also, I want to make it clear that I am not returning this award because I am “shocked” by what is being called the “growing intolerance” being fostered by … Continue reading Why I am returning my award – Arundhati Roy

दादरी का अख़लाक़ – राजेश जोशी की कविता

“दादरी का अख़लाक़” हर हत्या के बाद ख़ामोश हो जाते हैं हत्यारे और उनके मित्रगण. उनके दाँतों के बीच फँसे रहते हैं ताज़ा माँस के गुलाबी रेशे, रक्त की कुछ बूँदें भी चिपकी होती हैं होंठों के आसपास, पर आँखें भावशून्य हो जाती हैं जैसे चकित सी होती हों धरती पर निश्चल पड़ी कुचली-नुची मृत मानव देह को देखकर हत्या के बाद हत्यारे भूल जाते … Continue reading दादरी का अख़लाक़ – राजेश जोशी की कविता

आज ईद…कल से रोज़े (लघुकथा)

असगरी का दुपट्टा अब अपना रंग गंवा कर, सफेद और मटमैले के बीच के किसी रंग का हो चला था। किनारे की ज़री, कब धागों में बदल गई…पता भी नहीं चला। दुपट्टा जब डालती तो लगता कि बस एक दिन उसके सारे बाल भी इसी रंग के हो जाएंगे… “और क्या तब तक इसी दुपट्टे से काम चलाना पड़ेगा? ले दे कर उसके पास एक … Continue reading आज ईद…कल से रोज़े (लघुकथा)

Mayank Saxena

इंटरव्यू (कहानी) – Mayank Saxena

वो बोले, “ठीक है, आपका सीवी हमारे पास है…वी विल कांटेक्ट यू वेनएवर नीडेड” वो इस जुमले का मतलब ठीकठाक समझता था, लेकिन उसे ये समझ नहीं आ रहा था कि उससे चूक कहां हो गई…उसका इंटरव्यू तो अच्छा ही गया था, फिर ऐसा क्यों कहा? वो चौथी मंज़िल से सीधे नीचे पहुंचा और रिसेप्शनिस्ट को एक मुस्कान दे कर सीधे बाहर चला आया, भूख … Continue reading इंटरव्यू (कहानी) – Mayank Saxena

हम साम्प्रदायिक मूर्ख हैं, और अपने बच्चों को वैसा ही बनाते हैं (सच्ची घटना)

हालांकि मेरे वो मित्र और बड़े भाई नहीं चाहते थे, फिर भी आज चूंकि ये घटना बेहद प्रासंगिक है, इसलिए साझा करना चाहूंगा….शायद पिछले साल 14 अगस्त का वाकया है… मेरी वो 12 साल की भतीजी, अपनी स्कूल बस में थी। रोज़ की ही तरह वो स्कूल गई थी, 14 अगस्त आज़ादी का दिन तो होता है, लेकिन हिंदुस्तान और पाकिस्तान ने आधी रात की … Continue reading हम साम्प्रदायिक मूर्ख हैं, और अपने बच्चों को वैसा ही बनाते हैं (सच्ची घटना)

सालगिरह मुबारक पाकिस्तान…

बचपन से 15 अगस्त को स्कूल में होता था…बड़ा हुआ तो कॉलेज में जाने लगा…या फिर आस पास के किसी स्कूल या पिता जी के दफ्तर में…नौकरी में आया तो हर बार 15 अगस्त को दफ्तर में रहा…सुबह से देशभक्ति के नाम के झूठे नारे टीवी पर चलवाता रहा…लाल किले से किसी ने किसी धोखेबाज़ की ठगी को लाइव दिखवाता रहा…भाषणों का विश्लेषण करने के … Continue reading सालगिरह मुबारक पाकिस्तान…

प्यारे प्रधानमंत्री जी, आपके भाषण से भभूत तक – पीएम को पाती

सेवा में, प्रिय विदेश , परिधान, प्रधान-सेवक, प्रधान मंत्री, भारतीय जनता पार्टी, आर एस एस, भारत सरकार, इंदरप्रस्थ दिल्ली। विषय – आपके भाषण से भरोसे, जाति से जेल, सेवा से सरकार और भाषा से भभूत तक के सम्बंध में महोदय, आपको प्रधानमंत्री कहना चाहता हूं तो थोड़ा लम्बा हो जाता है, पीएम कहता हूं तो बहुत ही छोटा लगता है फिर प्राइम मिनिस्टर कहता हूं, … Continue reading प्यारे प्रधानमंत्री जी, आपके भाषण से भभूत तक – पीएम को पाती

यह देश है कि भीड़? – कविता

भीड़ के ख़तरों को तुम नहीं जानते भीड़ सुनती है सिर्फ लाउडस्पीकर को भीड़ सच नहीं सुनती भीड़ सुन नहीं सकती कैसे सुन सकता है कोई साफ-साफ किसी शोर को भीड़ आती है किसी बांध के टूटने के सैलाब सी भीड़ विपदा होती है जो गिर पड़ती है मनुष्यता पर जिसे रोका जा सकता है सिर्फ मनुष्य हो कर भीड़ बड़ी कारगर है मंदिरों-मस्जिदों-गिरजों-गुरुद्वारों में … Continue reading यह देश है कि भीड़? – कविता

नए वर्ष के आगमन पर..(कँवल भारती)

नया वर्ष तू क्या लेकर आया है? आशाएं विश्वास हमें तो करना ही है क्यों न करेंगे? करते ही आये हैं. वांच रहे हैं लोग राशियाँ राशिफल में कुछ के चेहरे मुरझाये हैं, कुछ के फिर भी खिले हुए हैं. आँखों देखा नहीं समझते, कागद लेखे सीस नवाते. पता नहीं क्यों विसराते हम इस यथार्थ को वृक्ष बबूल का बोएँगे तो आम कहाँ पाएंगे? बोएँगे … Continue reading नए वर्ष के आगमन पर..(कँवल भारती)

पेशानी पर पेशावर ! – पंकज परवेज़

एक 18 साल के जवान ने अपनी एके 47 से दर्जनों स्कूली बच्चों का बदन छलनी कर दिया एक और था जिसने अल्लाहो-अकबर का नारा लगाया और खुद को ही चिंदी-चिंदी उड़ा दिया तीसरे और चौथे ने उसे शहीद कहा ऐसी सलामी दी कि कई दर्जन और मासूम माँस के लोथड़ों में बदल गये ख़ून से तरबतर टिफिन, बस्तों और पानी की बोतलों में ज़िंदगी … Continue reading पेशानी पर पेशावर ! – पंकज परवेज़