Freedom – Bethany Maxwell (अनुवाद: खुर्शीद अनवर)

दक्षिणी सूडान ने वर्षों अपनी पहचान के लिए संघर्ष किया अंततः पिछले साल नया देश बना. यह उत्तरी सूडान से अलग अपने अस्मिता का प्रतीक है. यह कविता इसी की आवाज़ है . आज़ादी : बेथनी मैक्सवेल अनुवाद: खुर्शीद अनवर मुझको समझाओ कि आज़ादी का मफ़हूम है क्या मेरी माँ मुझको मेरे फैसलों को इज्ज़त दे ? यही आज़ादी है क्या ? कि मैं जो … Continue reading Freedom – Bethany Maxwell (अनुवाद: खुर्शीद अनवर)

Men – Maya Angelou

अनुवाद: खुर्शीद अनवर उन जवानी के दिनों के लम्हात मर्द जब सड़कों पे आवारागर्द होते थे मर्द कुछ उम्र दराज़, और शराबी कुछ मर्द नौजवां तेज़ और तर्रार से मर्द तकती रहती थी उन्हें पर्दों से छिपकर अक्सर देखो देखो तो इन्हें मर्द रहते किसी सिम्त रवां हर लम्हा उनको एहसास था होने का मेरे थी मैं जहाँ पन्द्रह बरसों की कि होने को थी … Continue reading Men – Maya Angelou

Learnprozess – Erich Fried

एरिच फ्रीड की 3 कविताएं अनुवाद – मयंक सक्सेना Learnprozess (सीखने का प्रक्रम) मैं कुछ नहीं हूं मैं हूं विश्व का आखिरी अस्तित्वहीन अपने समय की क्रांति का चीखा….एक प्रेरणा पाता कलाकार उन्होंने दोहराया तुम कुछ नहीं हो तुम आखिरी बचे अस्तित्वहीन प्राणी हो हमारी क्रांति में इस बार वो हताश था… ……………… Asche (राख) हां, मैं राख हूं.. अपनी ही आग की राख मैं … Continue reading Learnprozess – Erich Fried

Don’t Go Far Off – Pablo Neruda

अनुवाद : खुर्शीद अनवर बहुत दूर न जा ,बहुत दूर न जा एक भी दिन के लिए दूर न जा मेरे अलफ़ाज़ मेरा साथ नहीं देते अभी क्या कहूँ सोच नहीं पाता कहूँ तो क्या कहूँ दिन का कटना बड़ा मुश्किल है कि लंबे हैं दिन मुन्तजिर बैठूंगा खाली किसी स्टेशन पर जबकि वह रेल रुकी होगी कहीं और कहीं एक घंटे को भी तू … Continue reading Don’t Go Far Off – Pablo Neruda

खून खून खून – Mayank Saxena

खून खून खून सपनों का अरमानों को इंसानों का धर्म धर्म धर्म पुजारियों का मौलाना का सियासतदानों का आह आह आह रियाया की गरीबी की शऱाफ़त की वाह वाह वाह अमीरों की वज़ीरों की हुकूमत की Continue reading खून खून खून – Mayank Saxena

लियाकत नाम होने की सज़ा – Mayank Saxena

वो बहुत बड़ा आतंकी था हालांकि पुलिस के पास उसका नाम भी नहीं था वो अकेले ही दिल्ली आ रहा था अकेले ही गिरफ्तार हुआ अकेले ही रिहा हुआ वो अकेले ही उड़ा देता पूरी दिल्ली को लेकिन अफसोस देश का कानून आतंकियों के साथ है लियाकत बरी हो गया है तुम लोग तो चाहते थे न कि अगले 10 साल तक वो जेल में … Continue reading लियाकत नाम होने की सज़ा – Mayank Saxena

कुछ इंसान था – Mayank Saxena

देवताओं से भरी थी पगडंडियां जहां धरो कदम पांव के नीचे आ जाता था एक न एक उन्हीं से बचते हुए चाहता था चलना उन्हीं में फंस कर लड़खड़ा कर गिर पड़ता था मुंह के बल और वो जड़ रहते थे उनके बीच कहीं कहीं कुछ इंसान था जो टूट गए देवताओं को हटा कर रास्ते में रख देते थे नए देवता टूटने के लिए … Continue reading कुछ इंसान था – Mayank Saxena

तेरा कारोबार चले – Mayank Saxena

कभी तिरशूल चले और कभी तलवार चले तेरी ज़ुबान चले, तेरा कारोबार चले …….. एक देश में करोड़ों लोग भूखे थे जिनके पास थी रोटी वो बचाने निकल पड़े धर्म को बड़ी लड़ाई थी अंततः धर्म ज़िदा बच गया इंसानियत मर गई धर्म की विजय हो… अधर्म का नाश हो… Continue reading तेरा कारोबार चले – Mayank Saxena

एक चीख कहीं से उभरी – Mayank Saxena

खीर खाने से एक अवतार पैदा हुए… एक मसीहा मर के ज़िंदा हो गए… एक नबी पानी पर चल के सागर पार कर गए… एक किताब आसमान से उतरी… एक देवता ने धरती हाथ से थामी… एक ऋषि पी गए समुद्र का पानी… एक देवता ने एक औरत को बना दिया पत्थर… दूसरे देवता ने उसे फिर बनाया स्त्री एक अवतार ने जान ली एक … Continue reading एक चीख कहीं से उभरी – Mayank Saxena

A Worker Reads History by Bertolt Brecht

Who built the seven gates of Thebes? The books are filled with names of kings. Was it the kings who hauled the craggy blocks of stone? And Babylon, so many times destroyed. Who built the city up each time? In which of Lima’s houses, That city glittering with gold, lived those who built it? In the evening when the Chinese wall was finished Where did … Continue reading A Worker Reads History by Bertolt Brecht