नब्बे साल के मेरे चाचा जी के पुराने किस्से – हिमांशु कुमार

कल अपने चाचा जी के पास बैठा था,

वो पुराने किस्से सुनाने लगे,

चाचा जी ने मुझे बताया कि सन चालीस के लगभग की बात है,

एक बार तेरे दादा जी मुज़फ्फर नगर में घर के सामने बैठे थे,

तभी दुल्ला कसाई एक लंगड़ी गाय लेकर जा रहा था,

हमारे घर की भैंस कुछ दिन पहले मर चुकी थी,

घर में दूध की दिक्कत थी,

दादा जी ने आवाज़ लगा कर कहा अरे कितने में लाया भाई इस गाय को ?

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दुल्ला ने कहा जी दस में लाया,

दादा जी ने कहा ले ग्यारह रुपये मुझ से ले ले और गाय यहाँ बांध दे,

कुछ महीनों की खिलाई पिलाई से गाय बिल्कुल स्वस्थ हो गई,

फिर वह ग्याभन हुई और दस लीटर दूध देने लगी,

मैने चाचा जी से पूछा क्या तब गाय काटने पर हिन्दु कोई झगड़ा नहीं करते थे ?

चाचा जी नें बताया झगड़े का कोई सवाल ही नहीं था,

ये उनका खाना था वो खा सकते थे,

हिन्दु कसाई भी थे,

वो खटीक कहलाते थे,

मुस्लिम लीग का हेड आफिस मुज़फ्फर नगर था,

उनका चुनाव चिन्ह बेलचा था,

लोग उन्हें बेलचा पार्टी कहते थे,

तो उस गाय ने बछिया को जन्म दिया,

घर में सफाई के लिये आने वाली जमादारिन ने हमारी दादी से कहा चाची जी ये बछिया मुझे दे दीजिये,

दादी ने कहा खोल ले और ले जा,

वो बछिया वहाँ उनके घर पर ब्याह गई और एक दिन में पन्द्रह लीटर दूध देने लगी,

एक दिन मैं और अब्बा जी शामली अड्डे से घर की तरफ आ रहे थे,

हमारे सब से बड़े ताऊ जी को पूरा शहर अब्बा जी के नाम से जानता था,

अब्बा जी वकील थे,

स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे,

उनके मुंशी मुसलमान थे,

उनका बेटा हमारे ताऊ जी को अब्बा जी बोलता था,

उनकी देखा देखी घर के सारे बच्चे उन्हें अब्बा जी कहने लगे,

रास्ते में अब्बा जी को जमादारिन ने रोक लिया,

और बोली पन्डत जी जो बछिया आप से लाई थी उसका दूध पी के जाओ,

मैनें उत्सुकतावश पूछा क्या अब्बा जी ने वहाँ दूध पिया ?

चाचा जी ने बताया हाँ वो गांधी जी का ज़माना था,

आज़ादी की लड़ाई में लगे लोगों के लिये जात पात और हिन्दु मुसलमान का भेदभाव मिटाने का बहुत जोश था,

चाचा जी आगे सुनाते रहे,

सन् पचपन की बात है,

मुझे ऊन का कताई केन्द्र शुरू करने के लिये रुड़की के पास मंगलोर भेजा गया,

वहाँ पास में एक मुसलमानों का गांव था,

गांव में बस एक हिन्दु बनिया था जो दुकान चलाता था,

गांव के प्रधान एक मुस्लिम थे,

मुस्लिम प्रधान नें चाचा जी से कहा पंडत जी कहो तो आपके रहने खाने का इंतज़ाम बनिये के यहाँ करवा दूँ ?

मैं तो मुसलमान हूँ,

चाचा जी ने कहा आप मेरे बड़े भाई जैसे हैं मुझे आपके घर पर रहने खाने में कोई आपत्ति कैसे हो सकती है ?

चाचा जी वहाँ छ्ह महीना रहे,

गूजरों के गांव में जाकर भेड़ की ऊन खरीदना और उसे गांव की महिलाओं से चर्खे पर कतवाना और उससे कंबल बनवाना उनका काम था,

केन्द्र शुरू करने के छह माह बाद उनका शुरूआती काम पूरा हुआ,

गांव छोड़ते समय चाचा जी ने अपने मुस्लिम मेजबान से हाथ जोड़ कर कहा भाई साहब मेरे रहने खाने का पैसा ले लीजिये,

गांव के उस मुस्लिम प्रधान ने कहा पंडत जी आपने मेरी गांव की महिलाओं को रोज़गार दिया मेरे गांव के लोगों की खिदमत करी और मुझे बड़ा भाई कह रहे हो ,

बताओ मैं अपने छोटे भाई से पैसे कैसे ले सकता हूँ ?

बताते हुए नब्बे साल के मेरे चाचा जी अपनी आंखों में भर आया पानी पोंछने लगे थे,

मुझे उस समय के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक राजनैतिक माहौल की एक झलक मिली जिसे साझा करने का लोभ मैं रोक नहीं पाया और आपके साथ बांट रहा हूं,

 

2 thoughts on “नब्बे साल के मेरे चाचा जी के पुराने किस्से – हिमांशु कुमार

  1. एक समय गावों कस्बों में टोपी कुर्ते नही दिखा करते थे, हिन्दू मुसलमान में फ़र्क़ करना मुश्किल था। फिर आया तुष्टीकरण का दौर। काँग्रेस, मुलायम, लालू, नीतीश,ममता, लल्लू पंजू सभी को वोट बैंक चाहिए था। तो लगे मुसलमानों को चढ़ाने। आज स्थिति है कि मुज़लमान खुद को अरब से जोड़ कर देखते हैं और उनके दलाल पार्टियाँ भी उनका कोई भला नही कर पाईं ।

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