मैं अक्सर लोगों के मुंह से कहते हुए सुनता हूँ ,आप तो अपने वाले हो। या कभी-कभी कोई पूछ लेता है , आप अपने भाई जात नहीं हो ? शुरुआत में तो मैं सोच में पड़ जाता की ये ‘अपने वाले’ या ‘अपने भाई जात ‘ क्या होता है।लोगों के इस प्रश्न का क्या जवाब हो सकता है की आप अपने वाले हो !
बचपन से लेकर करीब बीस साल की उम्र तक मैं आस्तिकता और नास्तिकता के झूले पर झूलता रहा।कभी कुछ पढ़कर ,धर्म की बात सुनकर मैं आस्तिक होने लगता लेकिन फिर दूसरे ही क्षण विज्ञान के आविष्कार ,पृथ्वी और सौर मंडल के बारे में पढ़कर मन सूर्य को देवता और पृथ्वी को माँ मानने से इनकार देता और मैं नास्तिकता की ओर लौटने लगता।इन्हीं सब के बीच मेरा पाला ऐसे प्रश्नों से पड़ने लगा , आप अपने वाले नहीं हो , अरे आप तो अपने भाई जात हो, आप अपने वालों के बारे में क्यों नहीं सोचते ,वगैरह वगैरह।

यही कोई बीस इक्कीस की उम्र रही होगी मेरी जब मुम्बई सब्जी की दूकान शुरु किया था।धर्म के कट्टरपन से अनभिज्ञ दुनियादारी से परे हर आने वाला ग्राहक मेरे लिए सिर्फ ग्राहक होता था ।वह किस धर्म से है किस जाति से है मुझे क्या। बारिश का मौसम था , बादल घिरे हुए थे पर बारिश का कहीं नामोनिशान नहीं था।एक आंटी जो पहली बार आयी थीं दुकान पर आलू छाँटकर टोकरी में रख रहीं थीं।उमस की गर्मी बर्दास्त के बाहर थी।तबतक मैं मस्त मौला बच्चा बादल देख अचानक बोल पड़ा-या अल्लाह ऐसी बारिश कर की चारों तरफ मौसम खुशनुमा हो जाये।इतना सुनते ही आंटी बोल पड़ी,” अरे वाह, आप तो अपने वाले हैं ।” मैंने संशय वश कहा – अपने वाले ! वो बोली ,’मैं तो आप को कुछ और समझ रही थी ,आप तो अपने वाले हैं ।” मैं समझ नहीं सका लेकिन हाँ हाँ कह दिया।वे खुश थीं और खूब सारी सब्जियां लेकर घर गयीं।
अब वे हफ्ते में एक या दो बार आतीं और आते ही कहती -अस्सलाम अलैकुम ।मैं भी जवाब में वालेकुम अस्सलाम कह देता।वह खुश होतीं और सब्जियां लेकर खैरियत वगैरह पूछकर चली जातीं। कुछ दिन बीत गया।एक दिन वह टोकरी में आलू छांट रही थीं ।तभी मेरे एक ग्राहक जो पहुँचते ही ‘जय श्री कृष्ण बेटे’ कहते थे ,आ गए और रोज की तरह कहा – जय श्री कृष्ण बेटे।मैंने भी कहा जय श्री कृष्ण अंकल।अंकल ने फिर एक दो सामान लिया और पुनः ‘जय श्री कृष्ण’ कहते हुए आगे बढ़ गए।उनके जाते ही आंटी ने तपाक से कहा – तुम मुसलमान नहीं हो ! मैंने कहा – नहीं आंटी मैं हिन्दू हूँ लेकिन ….।”…लेकिन क्या ,उस दिन तो तुमने कहा कि तुम अपने वाले हो …”, इतना कहकर आंटी ने निकाले हुए आलू पलट दिए और आगे बढ़ गयी।मैं मन ही मन कहता रहा , आंटी आ जाओ ,मैं अपने वाले हूँ ।मेरी भी एक नाक ,दो कान ,दो आँखे और दो पैर हैं।मैं भी आप की तरह इंसान हूँ ।क्या इंसान होना अपने वाले होने की निशानी नहीं है ?
लेकिन अफसोस की आंटी बाज़ार में तो दिखती हैं लेकिन दूकान पर कभी नहीं आती।
छोटी -छोटी चीजों के लिए समाज को बटते हुए देख बड़ी तकलीफ होती है।सब्जी मंडी में एक दिन एक मिर्ची वाला व्यापारी मुझसे पूछा – तुम नींबू कहाँ से लेते हो।मैंने बताया, वो जमील चाचा बैठे हैं न ,उनके पास से।फिर वह बोला- क्या भाई, आप अपने वाले होकर भी मुल्ले से माल ले रहे हो ! अरे अपने वालों के पास से लिया करो न ।उसकी बात सुन माथा ठनका , थोड़ा गुस्सा आया। आजतक उस मिर्ची वाले के पास मैं नहीं गया और जमील चाचा आज भी नींबू देते हैं।
एक पंडित जी थे ,उन्हें फ्री की खाने की आदत पड़ गयी थी।जब भी दूकान पर आते कभी नींबू कभी मूली तो कभी ग्रीन चायपत्ती उठा ले जाते।मना करने पर कभी नहीं सुनते ।कहते पंडित तो खिलाने से पुण्य मिलता है।थोड़े बुजुर्ग थे इसलिए झिड़क भी नहीं सकता था, सो झेल रहा था।पीछे गुप्ता जी हैं ,वो बोले ये ऐसे नहीं मानेंगे।मैंने कहा फिर क्या किया जाये ? गुप्ता जी ने एक युक्ति सुझाई और कहा की तुम पंडित जी से कह दो की मैं मुसलमान हूँ तो आना छोड़ देंगे। मैंने कहा – गुप्ता जी उनपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।गुप्ता बोले ,’ अच्छा मैं कहूंगा और गंभीर होकर समझाऊंगा की काहें मुसलमान की दूकान का खाते हो, कभी उल्टा सीधा कह देगा तो क्या इज्जत रह जायेगी !’ मैंने कहा- ठीक है गुप्ता जी आप ही ट्राय करना।
दूसरे दिन पंडित जी दो चार सामान उठाकर जाने लगे तो गुप्ता जी ने पंडित को पुकारा और कुछ देर तक धीरे धीरे पता नहीं क्या बतियाते रहे।कुछ देर में पंडित जी पास आये और बोले – नाम क्या है तुम्हारा !मैं तपाक से बोल पड़ा – सलीम ।इसके बाद पंडित जी चले गए और अब नहीं आते।
मैं पूछता हूँ यार क्या रखा है चार दिन की जिंदगी में ?यहाँ बाप बेटे का नहीं होता, बेटा बाप का नहीं होता, भाई ,भाई का नहीं होता, तो तुम्हे क्या लगता है कि महज हिन्दू या मुसलमान होने से कोई आपका हो जायेगा ?जबतक जिंदगी है जो मिले गले लगाते चलो अपना बनाते चलो क्योंकि मुसीबत में ‘अपने वाले’ काम नहीं आते ,वही काम आएंगे जिन्हें आप ने अपना बनाया है।