“आपका पोस्ट पढ़ा . जिसमे आपके मित्र मेरे घर का पता मांग रहे हैं – “एड्रेस दिजिए, उनको लाल कर आते हैं”.एक और मित्र जो पूछ रहे हैं “एक चिड़िया होती है जिसका पिछवाड़ा लाल होता है क्या उन्हें भी हम लाल सलाम वाले कह सकते हैं कृपया बताये” ! मैं आपसे ये नहीं पूछूँगी की दो प्यारी बेटियों के पिता होने के नाते, अगर कोई उनके बारे मैं ऐसा कहता तो अपने उन मित्रों को आप क्या कहते l जिस देश में औरतों के साथ ये कह कर बलात्कार किया जाता है कि वो “गो मांस” खातीं हैं, वहां अपने “मित्रों” से भी शायद डर कर रहना चाहिए, पता नहीं कब वैचारिक मतभेद के कारण वो किसको मेरे घर का पता दे दें ? खैर, आपके निजी हमले और आपके मित्रों की भाषा ने एक बात तो साबित कर दी के भक्त लोग वैचारिक बहस या राजनैतिक व्यंग्य का जवाब सिर्फ धमकियों से ही दे सकते हैं I बस इतना कहना चाहूंगी कि मैं ऐसी धमकियों से डरना तो दूर , इस तरह कि मानसिकता को एक रोग मानती हूँ . आपसे मेरा सदा ही वैचारिक मतभेद था, आज पता चला कि नैतिक मतभेद भी हैI ये न समझें कि मैं डर गयी . मेरी विचारधारा और भक्तों के बारे मैं विचारों कि पुष्टि के लिए शुक्रिया .अपनी प्यारी बेटियों और पत्नी को मेरा प्यार भरा सलाम ज़रूर कहियेगा”
इन शब्दों के साथ मैंने अपने इस फेसबुक के “मित्र” को अनफ्रिएंड कर दिया जिसने एक भीड़ की मानसिकता रखने वाले फेसबुक पेज पर मेरे एक राजनीतिक व्यंग्य का ज़िक्र किया ताकि मुझे “सन्देश पहुंचा सके” .
मेरा उनके पूज्य नेता और उनके अंधभक्तों पर व्यंग्य उन्हें बुरा लगा तो पलट कर मेरी विचारधारा पर व्यंग्य करने के बजाय, ऐसा लगा जैसे उन्होंने मुझे फेसबुक के गुंडों के हवाले कर दिया हो . हम यहाँ कैसे पहुंचे की जहाँ अपने मित्रों के सामने विचार व्यक्त करने में डर लगता है? जहां हर वो शख्स जिससे हमारा मतभेद हो, इंसान से कुछ कम – एक “ग़ैर” हो गया हमारे लिए? उस ग़ैर को गाली देना, धमकाना, पीटना, बलात्कार या हत्या कर देना सब जायज़ हो गया हमारे लिए .
मेरे उस मित्र को मेरा उनकी बेटियों का ज़िक्र करना बहुत बुरा लगा ! मगर उन्हें मुझे दी गयी धमकियों पर कोई ऐतराज़ नहीं था क्योंकि उनकी नज़रों में मैं एक “बे मौसम लाल सलाम करने वाली” – ग़ैर हूँ ! जब राजनैतिक दल और नेता, पत्रकारों को “प्रेस्सटिट्यूट” बुलाने लगे, जब हर JNU का छात्र “एंटी नेशनल” और “पाकिस्तानी” चिन्हित कर दिया गया, जब अख़लाक़ की हत्या के बाद मांस की जांच पर सरकारी तवज्जो को हमने स्वीकार कर लिया , तो फिर फेसबुक पर किसी महिला के लिए अपशब्द कोई आश्चर्य की बात नहीं . ये सब लोग अब ग़ैर हैं , इनके साथ जितना बुरा हो, हमें स्वीकार्य है . ये किसी के बेटे – बेटी या माता-पिता नहीं . इनकी बात सुनना तो दूर, खुले आम इनकी “ज़ुबान काट लेने” की धमकी देने की भी सबको खुली छूट है I
इस चिल्ला-चिली में कौन कहने की हिम्मत करेगा की किसी को पाकिस्तानी कहना गाली नहीं है, पाकिस्तान में भी हमारे ही जैसे लोग बसते हैं? और कौन सुनेगा की किसी को वैश्या कहना अपमान नहीं है क्योंकि वैश्याओं का भी स्वाभिमान होता है! “ग़ैरों” का कैसा स्वाभिमान, वो तो इंसान से कुछ कम ही होते हैं I ये जो पेड ट्विटर एकाउंट्स से हर उस इंसान के खिलाफ ज़हर उगला जा रहा है- जो मुसलमान है, दलित है, लाल सलाम कहता है – वो ज़हर अब सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प के रस्ते हमारे घरों मैं घुस चुका है I और हम रोज़ अपनों को ग़ैर कह कर चिन्हित कर रहे हैं I और अपने बच्चों को इस नफरत की घूंटी पिला रहे हैं .
जैसे नशा करने वालों को अपने नशे की डोज़ बढ़ाये बिना नशा नहीं होता उसी तरह अब किसी दलित या मुस्लमान का गौ रक्षकों के हाथों पिटना, या गौ रक्षा के नाम पर बलात्कार हमें रोज़ मर्रा की खबर लगने लगी है I इस नफरत का ज़हर अब इतना आम हो गया है की हमें विचलित होने के लिए अब कोई और बड़ी-और घिनोनी घटना चाहिए I कोई ऐसा “ग़ैर” चाहिए जिसे हम इंसान ही ना मानते हों !सुना है आजकल सोशल मीडिया पर लोग पाकिस्तान पर परमाणु हमले की मांग कर रहे है …
बे- मौसम लाल सलाम कहने वाली कोई “ग़ैर”
(Pic Courtesy: Kamala Bhasin’ Ultee Sultee Amma)
Very unfortunate to know that old friends are so embroiled in Politics that they forget to pay due respect to ladies in group. I think Lalit and the group is only concerned about Modi.Show some respect to the old school friend and ask the fellow members to abstain from dirty comments.