हम इतने असहज क्यों है सेक्स को लेकर ? -Vishwa Deepak

संदीप के मामले में जो प्रतिक्रियाएं आई हैं, वो बताती हैं कि हमारा समाज कितना पाखंडी है. ‘नैतिकता’ का ढोल पीटने वालों का दिमाग खोलकर देखिए – वहां सेक्स का कल्पना सागर लहराता हुआ मिलेगा.

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न्यूज़ चैनलों की नैतिकता और इसके संपादकों का हाहाकारी विलाप इसी पाखंड का हिस्सा है. हर न्यूज चैनल में आपको कम से कम 10 लोग ऐसे मिल जाएंगे जिनके आगे संदीप का टेप कुछ भी नहीं है. टीवी में काम करने वाले ज्यादातर लोग इस बात को जानते समझते हैं.

लेकिन मुद्दा ये नही हैं. मुद्दा ये है कि हम इतने असहज क्यों है सेक्स को लेकर ? किसी आदमी के कुछ निजी मिनटों के लिए अपना घंटो बर्बाद कर डालते हैं.

कभी सोचा है कि हमारे यहां आइंस्टीन, न्यूटन नहीं हुए लेकिन वात्स्यायन हो गए, क्यों ? इसीलिए क्योंकि भारतीयों का ज्यादातर वक्त सेक्स के बारे में सोचने में बीतता है. चूंकि सेक्स सहज उपलब्ध नहीं है, इसीलिए सेक्स को लोग कल्पना में जीते हैं.

असल में कल्पना और यथार्थ का संबंध सत्ता संरचना से है. इसीलिए जब सत्ता आती है तो इनमें से आगे चलकर कोई नारायण दत्त तिवारी तो कोई आसाराम बापू तो कोई अभिषेक मनु सिंघवी और कोई संदीप बनता है.

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