हिंदी और उर्दू बोलने वाली दुनिया जब ऊंघ रही थी, उस वक़्त 28 अगस्त, 2015 के रोज़ एक करिश्मा हुआ। ट्विटर पर अंग्रेज़ी बोलने वाली नौजवान पीढ़ी को कोई याद आ गया। दोपहर होते-होते ट्विटर पर फ़िराक़ लफ़्ज़ रोमन में (#firaq)टॉप ट्रेंड कर रहा था। पाकिस्तान से हिंदुस्तान और दुनिया भर में उर्दू सुखन के चाहने वाले, ट्विटर पर कम लफ़्ज़ों में ही सही, फ़िराक़ के लिए अपनी दीवानगी, चाहत और पसंद का इज़हार कर रहे थे। हिंदी-उर्दू की इसी दुनिया में कुछ लोगों ने पूछा भी, “फ़िराक़ कौन?” और नौजवान पीढ़ी ने अशआर में ही जवाब दिया…
फ़िराक आइना-दर-आइना है हुस्ने -निगार
सबाहते-चमन-अन्दर-चमन की आँच न पूछ
मुनव्वर राणा, हमारे वक़्त में एक ऐसे अजूबे शायर हैं, जो ग़ज़ल को गेसू ए जानां से मां, मिट्टी और मुहब्बत के नए हवालों तक ले आए हैं। मुनव्वर राणा, को गांव के किसी कुम्हार की चाक पर भी आप उसके मुंह से सुन सकते हैं और किसी स्मार्ट सिटी के तेज़ भाग रहे शख्स से भी…ऐसे में हम आप से फ़िराक़ गोरखपुरी के बारे में कुछ कहने की गुस्ताखी कैसे कर सकते हैं, जब मुनव्वर राणा ख़ुद कह रहे हों…मुनव्वर राणा का यह लेख, उनकी इजाज़त से, हम हिल्ले ले पर शाया कर रहे हैं।
- मॉडरेटर
जो शख्स अपने क़द्रदान से ये कहे कि जब आप अपने नाम के साथ दारूवाला भी लिखते हैं तो आप इलाहाबाद पहुँच कर जिसे भी अपना नाम बताएंगे वो आपको मेरे ठिकाने पर ले आएगा |
जो शख्स इन्शोरेंस एजेंट को डांटते हुए ये बता रहा हो कि मैं कोई मच्छर या मक्खी नहीं हूँ जिस के इन्तिकाल पर नगरपालिकाएं सनद-ए-मर्ग (डेथ सर्टिफिकेट) जारी करती हैं, मैं फ़िराक़ हूँ फ़िराक़ !! मैं जिस रोज़ इस दुनिया को खैराबाद कहूँगा उस दिन चीखते चीखते रेडियो और अख़बारात के गले बैठ जाएंगे |
जिस शख्स ने सारी जिंदगी दस्तख़त कि जगह फ़िराक़ लिखा हो सिर्फ़ फ़िराक़, ना आगे कुछ ना पीछे कुछ, ना ये डिग्री ना वो डिग्री, ना ये अवार्ड ना वो सम्मान! उसकी ख़ुदएतिमादी कि क़सम तो ईमानदार दुशमनों को भी फ़ौरन खा लेनी चाहिए |
जिस शख्स ने चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स कि मीटिंग में बा-बांग-ए-देहल कह दिया हो कि आप लोग उर्दू इस लिए पढ़ लें कि अफ़सर बनने के बाद अफ़सर नज़र भी आएं |
इस बे-बाक़ शायर, क़लन्दर सिफ़त इंसान, साफ़गोई के पैरोकार और उर्दू दर्वेशाना रविश के नुमाइंदे को उर्दू वाले ही इतनी जल्द फ़रामोश कर देंगें, इस बारे में किसी ने कभी सोचा भी नहीं होगा, शायद ऐवान-ए-अदब में अखलाक़ीयात का जाने अनजाने में एक बड़ा क़त्ल हो गया, शायद ओहदों और इक़तिदार के बेशक़ीमती रेशमी क़ालीन पर अपनी अना की खड़ाऊ पहन कर उसका बे-नियाज़ाना गुज़र जाने का अमल उसके हम-असर शोअरा, नाक़ीदीन, अदब, और अरबाब-ए-इक़तिदार के नौनिहालों को भी पसंद नहीं आया, अपनी पुर-सहर शख्सियत और बे-इंतिहा तालीमी लियाक़त के ज़रिए कुछ भी हासिल कर लेने वाले फ़िराक़ साहब मीर के बाद दुसरे ऐसे शायर थे जिन्होंने अरबाब-ए-इक़तिदार और मस्लिहतों के दरबार में में कभी सजदा करने कि कोशिश नहीं की |
हकीकत में फ़िराक़ साहब उर्दू वालों की तंगनज़री, हिंदी वालों के मुतअस्सिबाना रवय्ये और अरबाब-ए-इक़तिदार की चश्मपौशी के शिकार हो गए, वैसे तो फ़िराक़ साहब की इल्मी, अदबी और शेअरी सलाहियत पर तनक़ीद करने के लिए जितने इल्म और दानिशमंदी कि ज़रुरत थी उतना इल्म ही फ़िराक़ साहब के अलावा पूरे बर्रे-सग़ीर में किसी दुसरे के पास नहीं था | यूँ भी फ़िराक़ साहब के पंजए-इल्म के नीचे कई अदबी उक़ाब फडफडाया करते थे, लिहाज़ा उनके दोस्त अहबाब तलाश करना एक कार-ए-मसरफ़ ही था, फैज़ अहमद फैज़ अपनी कमगोई, तरक्क़ी पसंदी के मज़बूत हिसार और अपने पंजाबियों की पंजाब नवाज़ी के सबब हर तरह से बच गए, जिगर साहब जब बैचारे अपने हुस्न-ए-सुलूक और ख़ाकसाराना रविश के सबब तनक़ीद को भी देहाती मुसलमान कि तरह तबलीग़ के अंदाज़ में चुपचाप सुनने की वजह से किसी हद तक महफूज़ रहे |
लेकिन फ़िराक़ साहब किसी समझोते, किसी शरीफ़ाना मसलिहत और किसी मुनाफ़िकाना डिप्लोमेसी के क़ायल ही नहीं थे, बोलने से कभी चूकते नहीं थे, आदम बेज़ारी के साथ ख़ुदसताई जैसी मोहल्लिक बीमारी के शिकार थे, अपने बेबाक फ़िक्रों और बेहंगम क़ेहक़हों से किसी भी महफ़िल के मूंह का मज़ा बिगाड़ देते थे, जिसके नतीजे में उनकी सारी उम्र अदबी अदालत के कटहरे में खड़े खड़े ही गुज़र गई | हालांकि फ़िराक़ साहब की ये तमाम ग़ैर-शाइराना हरकतें, अख्खड़पन और चिडचिडा लहजा उनकी उम्र भर की नामुरादियों और उदासियों के खौफ़नाक चेहरे पर पड़े हुए दबीज़ परदे की तरह थीं, लेकिन तंग-नज़र एहबाब, कम-नज़र दुश्मन, अंडर-ट्रायल नाक़िदीन-ए-अदब और पॉकेट साइज़ शायरों और अदीबों ने उनके होंटों पर जमी हुई पान की पीक को भी किसी मज़लूम का लहू साबित करने में ताखीर नहीं की, शबनम नक़वी और रमेश दीक्षित जैसे कुछ क़दरदानों ने अफ़वाहों का कोहरा साफ़ करने की बहुत कोशिश की लेकिन तब तक ज़माना तेज़ रफ्तारी से आगे बढ़ चूका था |
यक़ीनन फ़िराक साहब कि बहुत सी कमजोरियां बहुत ताक़तवर थीं जिनसे वो सारी ज़िन्दगी पीछा नहीं छुडा सके, लेकिन अब इसको क्या कहा जाए कि अदब का बड़े से बड़ा पारख भी इस मामूली लेकिन ईमानदार सुनार कि बराबरी नहीं कर सकता जो इस्तेमाल-शुदा ज़ेवर का मैल काट कर असली सोने की सूरत क़ीमत निकाल लेता है, यूँ भी तनक़ीद के ना-खुदाओं ने अपने क़लम के चप्पुओं की मदद से बहुत सफ़ीने डुबोएं हैं |
हरचंद के फ़िराक़ साहब की अज़दवाजी जिंदगी की किताब ख़ालिस मायूसियों की रोशनाई से तहरीर थी, इसके बावजूद भी फ़िराक़ साहब ने अपनी अदबी ज़िम्मेदारियों को निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन क्या उसे फ़िराक़ जैसे हुस्न-पसंद, मुबल्लिग़-ए-जमालियात व एहसासात की बदनसीबी में शुमार नहीं किया जाएगा, कि उनकी एह्लिया को उनका एक शेर भी याद नहीं था |
ना-ख़ुदा-ए-सुख़न हज़रत मीर तक़ी मीर अत्तार के लौंडे से दवा लेने के बावजूद भी मीर बने रहे, लेकिन फ़िराक बैचारे नई नई सी राहगुज़र की तलाश में बहुत आसानी से मार लिए गए |
हिंदुस्तान के पहले वज़ीर-ए-आज़म के बे-तकल्लुफ़ दोस्त, हिंदुस्तान के सबसे ताक़तवर वजीर-ए-आज़म के तक़रीबन हक़ीक़ी चाचा, ऑल इण्डिया कांग्रेस पार्टी के सबसे चहेते शायर और दानिश्वर रघुपति सहाय अल-मुतखल्लिस फ़िराक़ गोरखपुरी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के अलॉट शुदा मामूली से मकान में मर खप गए, हालांकि उनके एक अदना से इशारे पर इलाहाबाद से ले कर दिल्ली तक में उनके नाम कोठियां अलॉट हो सकती थीं लेकिन
खरा शायर कभी अज़मत के चक्कर में नहीं रहता
फ़िराक़ साहब अपनी अलालत (बीमारी) के सिलसिले में काफ़ी दिनों तक दिल्ली के ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टिट्यूट में ज़ेर-ए-इलाज रहे, एक दिन जब उन्हें मालूम हुआ कि मोहतरमा इंदिरा गांधी उनकी मिजाज़-पुर्सी के लिए आ रही है, तो वोह बे-इंतिहा खुश हुए, बे-तरतीब ज़िन्दगी और बे-तरतीबी के साथ लिबास का इस्तेमाल करने वाले फ़िराक़ साहब ने रमेश जी को बुला कर कहा कि मुझे लिबास ठीक से पहना कर चादर भी सलीक़े से ओढ़ा दो, आज मुझ से इंदु मिलने आ रही है, सख्त बीमारी के आलम में और होश-ओ-हवास तितर-बितर होने के बावजूद भी उर्दू तहज़ीब के इस सिपाहसालार को मालूम था कि किसी के सामने कितना बरहना होना चाहिए |
अगर दुनिया की किसी दूसरी ज़बान का इतना बड़ा शायर, मुफ़क्किर और आलिम इस दार-ए-फ़ानी से कूच करता तो उसके नाम-नामी से कोई छोटा सा शहर बसा दिया जाता, उसके नाम पर शाहराहों, स्टेशनों और स्कूलों के नाम रखे जाते, लेकिन महात्माओं से भरे इस मुल्क में बजाए फ़िराक़ साहब की यादगार क़ायम करने के, उनकी ग़ुरबत-ज़दा यादों से यूनिवर्सिटी का मकान भी ख़ाली करा लिया गया, उनका तमाम अदबी सरमाया पहले तो ख़ुर्द-बुर्द होने दिया गया, फिर बची-कुची यादों को मकान ख़ाली कराने के बहाने सड़क पर बिखेर दिया गया | हैरत है कि मामूली और पॉकेट साइज़ लीडर और धर्म गुरुओं के मरने के बाद उनकी सरकारी कोठियां हुकूमत ख़ाली नहीं करा पाती, लेकिन ये इन्तिहाई शर्म और अफ़सोस की बात है कि मुश्तरिका हिन्दुस्तान के अदब और उर्दू ज़बान में जमालियाती मसलक का पहला इमाम निहायत कसम-पुर्सी के आलम में इस दुनिया से रुखसत हो गया, ये इंसानी और अखलाक़ी ना-क़दरी भी इसी कांग्रेस पार्टी के ज़माने में हुई, फ़िराक़ साहब जिस के फाउंडर मेम्बर ही नहीं, सिपह-सालार भी हुवा करते थे, हैरत है कि फ़िराक़ साहब की यादों के सरमाये से यूनिवर्सिटी का मकान ख़ाली करा लिया गया और क़रीब ही खड़ी हुई हाई-कोर्ट कि पुर-शिकवा इमारत उस ना-इंसाफ़ी को हाथ बांधे हुए देखती रही |
फ़िराक़ साहब ने कभी ख्वाब में भी अपने साथ उस ना-इंसाफ़ी और इतनी ना-क़दरी के बारे में नहीं सोचा होगा, वरना मुमकिन है कि वो भी ग़ज़लों के लिए नई नई ज़मीनें तलाश करने के बजाय अपने इलाहबाद, या दिल्ली में हज़ार-दो हज़ार ग़ज़ का प्लाट ले कर छोटी-मोटी कोठी बना लेते, फ़िराक़ साहब मिज़ाजन नागा साधू थे, लेकिन रस्म-ए-दुनिया का पास रखने के लिए कभी कभी बहतरीन लिबास भी ज़ेबतन कर लेते थे, मगर उनकी क़लन्दरी हमेशा उनके लिबास से दूर खड़ी मिलती थी, वरना वो किसी भी वक़्त पैदल को वज़ीर से पिटवा कर किसी भी यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर बन सकते थे, फ़िराक़ साहब ना मुशायरे में पढ़ते थे, ना ही क्लास में तल्बा को पढ़ाते थे, बल्कि वो लफ़्ज़ों की चलती फिरती कहकशां सी अपने सुनने वालों की पेशानी पर टांकते चले जाते थे, उनकी आँखें लफ़्ज़ों कि कतरनों से शहज़ादी-ए-ग़ज़ल के लिए ऐसा लिबास तैयार कर देती थी, कि ग़ज़ल भी बिलक़ीस कि तरह सुलेमान के अदबी महल में दाखिल होती थी |
तनक़ीद-ए-रक़क़ासा के दुपट्टे कि तरह तरक्क़ी पसंदियत, जदीदियत और माबाद-ए-जदीदियत कि खूँटियाँ बदलती रही, और तख्लीक़ बेचारी नंगे सर नाक़द्री के सहरा में डोलती रह गई |
फ़िराक़ साहब से अहमद मुश्ताक़ का तक़ाबुल वैसा ही है जैसे कूचा-ए-अरबाब-ए-निशात की टकाहियों का मवाज़ना मुन्नी बाई हिजाब और उमराव जान से किया जाए, यहाँ मेरा मकसद अहमद मुश्ताक़ को छोटा साबित करना कतअन नहीं है, बल्कि यहाँ मैं सिर्फ़ इतना अर्ज़ करना चाहता हूँ कि बे-ईमान बनिया भी मोल-तोल में इतनी बद-दयानती नहीं करता है, जितनी बद-दयानती हमारे अदब में दर आई है |
ज्ञानचंद जैन की बे-वफ़ाई को इश्यु बनाने से बहतर तो यही था कि फ़िराक़ साहब की उर्दू ज़बान से जूनून की हद तक मोहब्बत पर बहस की जाती, मेरा ख़याल है कि ज्ञानचंद जैन की ना-शुक्री पर तबसरा करने की बजाय फ़िराक़ की उर्दू नवाजी पर नए सिरे से बहस की जाए ताकि पिछली गलतियों का कुछ तो इज़ाला हो सके, क्यूंकि आधी सदी से ज़्यादा गुज़र जाने के बाद भी पूरी उर्दू दुनिया में बैक-वक़्त कई ज़बानों पर यकसां उबूर रखने वाला फ़िराक़ के अलावा दूसरा कोई शायर नज़र नहीं आता |
दस्त-बस्ता ये भी ग़ोश-गुज़ार करना चाहता हूँ कि फ़िराक़ साहब के बाद उर्दू ज़बान के पास अपना कोई भी सच्चा और दबंग वकील नहीं है, ये बेचारी मज़लूम ज़बान एक मुद्दत से अपने मुक़दमे की पैरवी ख़ुद कर रही है, आज भी ये बदनसीब ज़बान हज़रत नूह (अ.) के कबूतरों की तरह ज़मीन की तलाश में भटक रही है, और ज़मींदारी सोंपने के लिए किसी रघुपति सहाय को तलाश रही है |
मुनव्वर राना – हिंदुस्तानी शायरी का वह नाम, जिसके लिए कुछ भी कहना, कम ही रहेगा। मुहाजिरनामा के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं, तो मां पर कही नज़्मों-ग़ज़लों के लिए दुनिया भर में माने जाते हैं। हिंदुस्तानी ज़ुबान में अपनी तरह के अकेले शायर। इसलिए भी ज़्यादा कहना सही नहीं है, क्योंकि आप सब, उनके बारे में सब तो जानते हैं।
मुनव्वर राणा, हमारे वक़्त में एक ऐसे अजूबे शायर हैं, जो ग़ज़ल को गेसू ए जानां से मां, मिट्टी और मुहब्बत के नए हवालों तक ले आए हैं। मुनव्वर राणा, को गांव के किसी कुम्हार की चाक पर भी आप उसके मुंह से सुन सकते हैं और किसी स्मार्ट सिटी के तेज़ भाग रहे शख्स से भी…ऐसे में हम आप से फ़िराक़ गोरखपुरी के बारे में कुछ कहने की गुस्ताखी कैसे कर सकते हैं, जब मुनव्वर राणा ख़ुद कह रहे हों…मुनव्वर राणा का यह लेख, उनकी इजाज़त से, हम हिल्ले ले पर शाया कर रहे हैं।