AMU: कुछ दिलाने के नाम बहुत कुछ छीने जाने का ख़तरा था

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AMU की सेंट्रल लाइब्रेरी में लड़कियों को इजाज़त होनी चाहिए। इसकी ज़रूरत एक ज़माने से महसूस की गई है। स्टूडेंट्स, प्रोफेसर्स और वीमेंस कॉलेज की स्टू़डेंट्स इसे हमेशा उठाती रही हैं। बराबरी के लिए उठ रही यह आवाज़ कमोबेश किसी उम्मीद भरे नतीजे पर पहुंचने वाली थी कि लेकिन वापस डिब्बे में बंद हो गई है। मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में जाने की आज़ादी मांग रही लड़कियां वापस अब्दुल्लाह वीमेंस कॉलेज तक महदूद कर दी गई हैं। इसके लिए सीधे तौर पर मेनस्ट्रीम मीडिया का लापरवाही भरा रवैया ज़िम्मेदार है। सही सवाल को ग़लत अंदाज़ और इरादे के साथ बेचने की कोशिश की गई। AMU को एक पुराने ज़माने का मदरसा और यूनिवर्सिटी को एंटी वुमन के तौर पर प्रोजेक्ट करने की कोशिश की गई। निचोड़ यह कि मुसलमानों को लेकर समाज में मौजूद स्थापित पूर्वाग्रहों को मेनस्ट्रीम मीडिया ने और मज़बूत बना दिया। अच्छी-ख़ासी तहरीक़ पर बीच में झपट्टा मारकर सब चौपट कर दिया।

AMU में लड़कियों की आज़ादी और बराबरी की आवाज़ कैंपस से, मुस्लिम समाज से या फिर किसी विश्वसनीय और प्रोग्रेसिव तबके से उठनी चाहिए। इस तरह के संवेदनशील मुद्दे पर फिलहाल मेनस्ट्रीम बाज़ारू मीडिया को साथ लेकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। सब जानते हैं कि मेनस्ट्रीम इंडियन मीडिया की दिलचस्पी मुसलमानों के ख़िलाफ हेट रिपोर्टिंग करने में रही है। प्रफेसर गिलानी से लेकर मोहम्मद आमिर तक और फर्ज़ी मेरठ गैंगरेप से लेकर रांची के लवजिहाद तक, किस्से ही किस्से हैं। मुसलमानों के लिए RSS, BJP से ज़्यादा मुश्किलें संघी विचारधारा से समर्थित मीडिया पैदा कर रहा है यही वजह है कि इंटलेक्चुअल्स, मुस्लिम इंटलेक्चुल्स और कैंपस के स्टूडेंट्स ने आगे बढ़कर मेनस्ट्रीम मीडिया को इससे दूर किया। लड़कियों को बराबरी दिलाने के बहाने मीडिया में जारी फूहड़ विमर्श सिर्फ AMU की निगेटिव इमेज गढ़ रहा था। इस तरह की निगेटिव कैंपेनिंग और इमेज के और भी ख़तरे हैं, ख़ासकर यूनिवर्सिटी के चरित्र और उसके वजूद को लेकर। यह मंशा एक हद तक साफ हो चुकी थी कि थोड़ा बहुत मिलने के नाम बहुत कुछ छीना जा सकता है। यही डर है मुसलमानों में और इसीलिए प्रोग्रेसिव मुस्लिम इंटलेक्चुअल्स से लेकर ग्रेजुएशन में पढ़ने वाली लड़कियों तक ने मीडिया को इस मुद्दे से दूर रहने के लिए कहा।

दुनिया में मौजूद सभी संसाधन पर पुरुष या स्त्री का हक बराबर है और AMU या मुस्लिम समाज उससे अछूता नहीं है। सारे पुराने सड़े-गले नियम-कानून ध्वस्त कर देने चाहिए लेकिन यह ज़रूरी काम बीजेपी समर्थित बेइमान और बिकाऊ मीडिया क्यों करेगा? मीडिया अगर इतनी ही बेक़रार है तो वह पहले मुसलमानों का विश्वास हासिल करे। मुस्लिम समाज के बुनियादी सवाल पर बहस करे, किसी नतीजे तक पहुंचाए। फिर उसी कड़ी में AMU या इस तरह के सारे मुद्दे आ जाएंगे और ज़ाहिर है कि लोग ख़ुद आगे बढ़कर अपने सवाल या बात रखने की कोशिश करेंगे। इंडियन मीडिया के इतिहास में यह पहला मौका है जब ढांचे से लेकर एडिटोरियल पॉलिसी कॉरपोरेट कंपनियां तय कर रही हैं। इन्हीं कॉरपोरेट कंपनियों ने नरेंद्र मोदी को पीएम की गद्दी पर बिठाने के लिए रुपया पानी की तरह बहाया है। लिहाज़ा मीडिया संदिग्ध है और कम से कम इसका शिकार हो रहे मुस्लिम समाज को 1 फीसदी भी संदेह नहीं है । निगेटिव इमेज गढ़ने के साथ-साथ मेनस्ट्रीम मीडिया मुस्लिम समाज का नुकसान भी करता है। जैसे इस बार कैंपस में उठ रहा एक ज़रूरी सवाल मीडिया की वजह से दबकर रह गया। इन्हीं नुकसानों की वजह से AMU स्टूडेंट्स ने मीडिया के ख़िलाफ नारेबाज़ी करके अपना स्टैंड साफ किया और आख़िर में मीडिया को अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर भागने में ही भलाई नज़र आई। मुसलमानों के ख़िलाफ जड़ कर चुके स्थापिक पूर्वाग्रहों के कारोबार को आगे बढ़ाने वाली मौजूदा मीडिया ने फिर कोई शिगूफ़ा छेड़ा तो विरोध के साथ-साथ इस बार अंडे और डंडे जैसी सौगातों का भी इंतज़ाम होना चाहिए।

सोशल मीडिया के क्रांतिवीरों ने क्या किया?
क्रांति को क्रांति की दहलीज़ तक पहुंचाने के बाद वापस अपने-अपने दड़बों में वापस चले गए कॉमरेडों ने हेट रिपोर्टिंग में मीडिया का साथ दिया। क्रांति के उत्साह में इसके ख़तरों को नज़रअंदाज़ किया। बड़बोले और नए-नवेले कॉमरेड भूल गए कि अब उनकी ताक़त मुट्ठीभर रह गई है। एएमयू में क्रांति सोशल मीडिया पर बेतुकी बहस उसी तर्ज पर की गई, जैसे मेनस्ट्रीम मीडिया कर रहा है। अपनी इन्हीं गलतियों का ख़ामियाजा आज कॉमरेडों को भुगतना पड़ रहा है। कॉमरेड्स भूल गए कि मोदी जीता नहीं है, बल्कि वे हारे हैं और बुरी तरह हारे हैं। सोशल मीडिया के काबिल कॉमरेडों को ज़रा भी इल्म नहीं हुआ कि बराबरी की बहस एक धोखा हो सकती है। कॉमरेड्स भूल गए कि फिलहाल वे कमज़ोर हैं और बीजेपी, संघ की प्रयोगशालाएं में चल रहे अजेंडा को उनकी मुट्ठीभर जमात नहीं रोक पाएगी। आख़िर में लड़ने-मरने, यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए उसी AMU के स्टूडेंट्स मोर्चा संभालेंगे। मारे जाएंगे तो भी मलाल नहीं क्योंकि उनकी आने वाली नस्लों को पढ़ने के लिए इसी यूनिवर्सिटी में छत मिलती है।

सारे कॉमरेडों की नेकनियती पर शक नहीं होने के बावजूद यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं है कि लेफ्ट पार्टियों का अतीत और वर्तमान स्याह है। बड़ी लड़ाई लड़ने से पहले अपने भीतर की छोटी-मोटी लड़ाइयों में रोज़ मरते-कटते हैं। गद्दारों की लिस्ट बनाना पहला प्रिय काम है। बार-बार ये सिद्ध करते हैं कि संघी लंपटों की तरह ये लेफ्टी लंपट हैं। आरएसएस हेडक्वॉर्टर पर एक बेहद कामयाब प्रोटेस्ट करने के ठीक अगले दिन जेएनयू में किया गया ‘किस ऑफ लव’ दरअसल लंपटई थी। शाबाशी की जगह थू-थू हुई। दुनिया बदलने की क्रांति का सपना संजोए सोशल मीडिया के कॉमरेडों को इतनी भी तमीज़ नहीं कि अलीगढ़ में चल रहे आंदोलन को कैसे उसके अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। कैसे उन लड़कियों के लिए मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी का दरवाज़ा खोला जा सकता है। मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया के कॉमरेड भी इस तहरीक़ को दबाने के लिए बराबर के ज़िम्मेदार हैं।

2 thoughts on “AMU: कुछ दिलाने के नाम बहुत कुछ छीने जाने का ख़तरा था

  1. आश्चर्यजनक रूप से इस लेख में लेखक का नाम भी नहीं है। इसलिए सबसे पहले तो इस लेख में लेखक का नाम सार्वजनिक किया जाए, या फिर यह बताया जाए कि उसे लेख में नाम देने से किस से और किस तरह का ख़तरा है।
    इस लेख पर…सबसे पहली बात जो शायद इसे प्रकाशित करते वक्त ही प्रकाशक की निगाह में आ जानी चाहिए थी, वो यह थी कि पहले ही वाक्य के दूसरे हिस्से से बेहद घिनौनी बू आ रही है…बू जो औऱतों को किसी एक चहारदीवारी में क़ैद रखना चाहती है। जैसे-जैसे ये लेख आगे बढ़ता है, मीडिया के दुष्चरित्र के बहाने ये संघी औऱ उसकी राजनीति या एएमयू पर निशाना साधने की कोशिशों के खिलाफ़ कम और धीरे धीरे इस्लामिक समाज के अंदर औरतों में आ रही जागरुकता के खिलाफ़ ज़्यादा दिखाई देता है।
    जब आप कहते हैं कि इस्लामिक दुनिया में औरतों के हक की लड़ाई सिर्फ उस दुनिया के अंदर के लोग लड़ेंगे औऱ उसके लिए आवाज़ उठाएंगे तो आप उसी सड़क पर चल रहे होते हैं, जिस पर संघी चल रहे होते हैं। ये किस तरह की बात है…फिर क्यों सती प्रथा से लेकर के दहेज तक के लिए हिंदू-मुस्लिम एक्टिविस्ट साथ मिल कर लड़े…लेखक महोदय ने क्या लड़कियों को इस्लाम या हिदू धर्म की जागीर समझ रखा है?
    ज़ाहिर है इस लेख के कई हिस्सों से उसी साम्प्रदायिकता की बू आती है, जैसी सड़ांध किसी हिंदू कट्टरपंथी की बातों से आती है…फ़र्क झंडों के रंगों का है। जब आप कहते हैं कि लड़कियों मे मीडिया का विरोध किया…तब दरअसल आप यह नहीं कह रहे होते हैं कि मीडिया का विरोध हुआ, लड़कियों को चहारदीवारी में रखने की आपकी बीमार मानसिकता कहना चाह रही होती है कि दरअसल लड़कियों ने वीसी का समर्थन किया।
    मीडिया चोर है, भ्रष्ट है…बेईमान है…लेकिन आप का निशाना कहां है साथी? आप किसको उल्लू बना रहे हैं? जनाब जो आपको इस वेबसाइट पर आ कर पढ़ रहे हैं, वो लाइनों के बीच औऱ सन्नाटे के शोर को पढ़ सकते हैं, इसीलिए यहां आ रहे हैं।
    मैं आपका नाम नहीं जानता लेकिन साफ है कि आपके लेख में खासकर वामपंथियों के खिलाफ निजी किस्म की रंजिश भरी है। कमाल है, इतने नाज़ुक मौके पर भी आप बजाय असल दुश्मन के, वामपंथियों के खिलाफ़ नारेबाज़ी कर रहे हैं। आप को अगर ये भी समझ नहीं है कि कोई बुरा व्यक्ति वामपंथी नहीं होता…वो सिर्फ बुरा व्यक्ति होता है…तो यक़ीनन आपकी ये समझ भी कच्ची होगी कि कोई बुरा व्यक्ति हिंदू या मुसलमान नहीं होता है…सिर्फ बुरा व्यक्ति होता है…जनाब इस समझ को साम्प्रदायिकता कहते हैं और आपके लिखे हुए को समाज की आड़ में व्यक्तिगत निशाने साधना…
    अब आगे सुनिए, औरतें किसी की जागीर नहीं हैं…कोई तय नहीं करेगा कि वो किस चहारदीवारी में रहेंगी या नहीं…आप आज क़ैद भी कर लेंगे तो वो कल उस चहारदीवारी को आग लगा कर निकल जाएंगी…औरतों को अपनी बपौती समझना, इसे शुद्ध भाषा में शॉविनिज़्म कहते हैं। इस लेख को पढ़ने के बाद भी किसी महिला की प्रतिक्रिया न आना आश्चर्यजनक है…बाकी याद रखिए मीडिया पर अंडे या डंडे की धमकी दे कर आप सिर्फ उसको हद से ज़्यादा तवज्जो दे रहे हैं…और संघियों से बराबरी कर रहे हैं…
    इसका जो हासिल है, वो सिर्फ हिंसा है और उस में नुकसान आम आदमी का ही होना है….और बदनाम होगी एएमयू….चला लीजिए डंडे…
    एक ही इल्तिजा है कि औरतों के फैससे ख़ुद लेना बंद कीजिए…और बचपन से ही दिमाग में कूड़ा भर दिए जाने के बाद औरतें चाहें सड़क पर आकर बुर्के के हक़ में नारे लगाएं या फिर सती प्रथा का समर्थन करें…वो सिर्फ ढोंग है…आज़ादी नहीं…क्योंकि उनके दिमागों का रिमोट आप जैसे मर्दों के हाथ में है…और किस से मत डरिए, आपकी मां ने भी आपको कई बार चूंमा होगा…
    (एक औरत…यह मान कर कि यह लेख किसी मर्द ने ही लिखा होगा…)

  2. एक संदेश सम्पादकों औऱ एडमिन के नाम भी…कि हम लोग इस तरह के लेख पढ़ने के लिए यहां नहीं आते हैं…

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