अहिंसक विरोध प्रदर्शन मनुष्य का मौलिक अधिकार है – अमीर रिज़वी

loving constitution

अहिंसक विरोध प्रदर्शन मनुष्य का मौलिक अधिकार है
विरोध का माध्यम और विरोध का रूप विरोध करने वाले स्वयं चुनते आए हैं
किसी भी विरोध प्रदर्शन का तात्पर्य होता है कि प्रदर्शनकारियों की आवाज़
उन तक पहुंचे जो कानून/ व्यवस्था/ सरकार इत्यादि के अधिकारी हैं.

जब जब बड़ी ताक़तों का और दबंगों का विरोध हुआ है
वे विरोध के रूप को अधर्म, अनैतिक, संस्कार के विरुद्ध इत्यादि की संज्ञा
देकर विरोध प्रदर्शन करने वालों की आवाज़ को दबाना चाहते हैं.

भारतीय क़ानून दो वयस्कों को अपनी मर्ज़ी से एक साथ रहने, घूमने,
खाने-पीने, हंसने-बोलने, गाने-नाचने, गले लगने या चुम्बन लेने का पूरा
अधिकार देता है.

हो सकता है, कि कुछ भारतियों का धर्म, उनका समाज, उनकी परंपरा, उनके
कबीले, उनकी खाप,
या उनकी पंचायत इस संवैधानिक, कानूनी अधिकार को सही नहीं मानती हो.
परन्तु समाज का बहुत बड़ा वर्ग लोगों के निजी कानूनों से सहमत भी नहीं है.
जैसे बाल-विवाह, सती-प्रथा, नारी को जायदाद में हिस्सा न देना, तीन बार
बोलकर तलाक़ दे देना इत्यादि गैर संवैधानिक अपराध आज भी कई समाज का हिस्सा
है… परन्तु सही नहीं है !!!

जबतक रूढ़िवादियों के चंगुल से समाज को स्वाधीन नहीं किया जाता, समाज के
दबंग अपने खोखले आडम्बर को आम नागरिकों पर थोपते रहेंगे.

इसलिए मैं “kiss of love” जैसे प्रदर्शनकारियों के साथ हूँ.

स्वतंत्र समाज में आपको अपने हिसाब से रहने की पूरी छूट होती है
आप बुरखा पहने या जींस, आप नमाज़ पढ़ें या पूजा करें, शाकाहारी हो या
मांसाहारी हों, आप पर कोई पाबन्दी नहीं होती.

परन्तु रूढ़िवादी विचारधारा दूसरों की स्वतंत्रता का हनन करती आई है.
इसलिए ये प्रदर्शन उनके लिय भी उतना ही आवश्यक है, जो जींस-टी शर्ट न भी
पहने, जो हिजाब में रहें.

प्रदर्शन में जाकर सभी एक दूसरे का चुम्बन ले रहे हैं, ऐसा भी नहीं है,
केवल उस प्रदर्शन का हिस्सा बन जाना ही काफी है !!!

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