
अंततः राजू और सुष मैच खेलने तो आ गए…लेकिन इस बार भी उनको न तो ओपनिंग मिली…और न ही कैप्टेन बनाया गया…हालांकि वो ज़िद करते रहे…और कई बार कहा कि जाओ हम नहीं खेल रहे…हम नहीं खेल रहे…लेकिन ये तो बुढ़ापे में भी कैप्टेन बनने की ज़िद कर रहे लाला भइया भी एक साल से ज़्यादा से कह रहे थे…फिर उधर से मुरली दद्दा भी बच्चों के साथ खेलने आ गए…राजू अपनी बॉल और सुष अना बैट लेकर घर लौट जाने की धमकी दे ही रहे थे…कि उधर से नंदू अपने नए इम्पोर्टेड बैट बॉल और स्टम्प्स लेकर मैदान में चला आया…
सारी बच्चा पार्टी उधर दौड़ी…चमकते हुए खेल के सामान को छू-छू कर देखने लगी…दरअसल नंदू के अमीर बाप की ओर से उसके लिए ये नया गिफ्ट था…अभी तक नंदू इन बच्चों के साथ नहीं खेलता था…घर में ही अपने विदेशी-देशी महंगे खिलौनों से खेलता था…लेकिन नौकरों पर धौंस जमा कर अब वो ऊब चुका था…कभी-कभी जब वो पार्क में आता था तो वहां नियमित खेलने वाले बच्चे उसे भाव ही नहीं देते थे…
फिर उसने ग़ौर किया कि राजू और सुष अपनी बॉल और बैट की धौंस जमा कर कप्तानी और सेकेंड-थर्ड डाउन बैटिंग करते थे…तो लाला और मुरली हमेशा अपने अनुभव और सीनियरटी की धौंस जमा कर ओपनिंग बैटिंग या बॉलिंग ले लेते थे…नंदू ये सब देखता-समझता रहा…और फिर उसे समझ आ गया कि इनसे कैसे निपटना है…अमीर बाप के बेटे नंदू ने अपने पापा से ये बताया और अब ये नए खेल के साज़ ओ सामान के बाद बाकी सारे बच्चे ख़ुद ही उसके साथ खड़े हो गए…
आंखों में नए बैट और स्टम्पस की चमक लिए राजू ने ख़ुद ही कहा कि नंदू कैप्टेन होना चाहिए…उसे लगा था कि एक बार टीम को नया बैट और स्टम्पस मिल जाएं…फिर निपट लेंगे नंदू से भी…लेकिन उधर सुष का मुंह बन गया और लाला भइया बोले कि मैं घर जा रहा हूं…मुरली दद्दा भी मुंह टेढ़ा करने लगे…तब तक नंदू ने कहा…”देखिए लाला भइया…आप टीम के सीनियर खिलाड़ी हैं…और अब आपको बड़ी ज़िम्मेदारी उठानी है, जिससे खेल का भला हो…और टीम का भी…आप को अम्पायर बनना होगा…” लाला भइया से कुछ कहते न बना…
फिर नंदू ने मुरली दद्दा की ओर देखा…और राजू को इशारा किया…राजू ने मुरली दद्दा से कहा, “देखिए दद्दा…अब आपको ओपनिंग बॉलिंग नहीं…स्लॉग ओवर्स में गेंद डालनी होगी…और साथ ही आप अब सेवेंथ डाउन बैटिंग करेंगे…टीम को आपकी ज़रूरत है, इसलिए आप फील्डिंग भी थर्ड मैन पर कीजिए…”
तब तक नंदू सुष को देख कर मुस्कुरा रहा था…और सुष उसे गुस्से में घूर रही थी…और फिर लाला भइया के कान में नंदू ने न जाने क्या कहा…लाला भइया सुष के पास आए और उससे कहा, “देखो…तुम्हारा गुरू हूं…एक ही बात कहनी है…मेरे हाथ में ज़्यादा कुछ नहीं है…तुम तय कर लो तुम्हें खेलना है या नहीं…वरना कोई और पार्क ढूंढ लो…वैसे शहर में अब ज़्यादा पार्क बचे नहीं हैं, जहां बच्चे खेल सकें…”
ख़ैर मैच शुरु हो चुका है…खिसियाए मुरली शायद खेलेंगे ही नहीं…लाला भइया अम्पायरिंग करेंगे…ज़ाहिर है जिसका नया बैट, बॉल और स्टम्प है, उसे कैसे आउट देंगे…सुष खेल रही हैं…मतलब आप समझिए मत, देखते जाइए…राजू को फर्स्ट डाउन उतारा जाएगा…वाइस कैप्टेन भी बना दिया गया है…आपको क्या लगता है कि इस कहानी का हीरो कौन है…नंदू या उसके पापा???