इन को ये नहीं पता है कि यहां और वहां के बीच में प्याज़ और चीनी समेत न जाने कितनी चीज़ों का आयात-निर्यात होता है…जिससे न केवल महंगाई पर नियंत्रण किया जाता है…बल्कि ज़रूरतें और रोज़गार भी पूरा होता है…
इनकों इससे भी मतलब नहीं है कि एक मुल्क से होकर दूसरे मुल्क में गैस औऱ तेल की पाइपलाइन का मामला भी चल रहा है…जिससे तेल औऱ गैस के अहम मसले सुलझ सकते हैं…
इनको ये भी नहीं पता है कि कई दरिया हैं, जो इधर से उधर या उधर से इधर बहते आते हैं…जाते हैं…और मुल्कों के रिश्तों का पानी की किल्लत, सूखे और बिजली बनने से भी सम्बंध है….
पता नहीं ये जानते हैं भी या नहीं कि दो मुल्कों में तमाम लोग अपने सगे भाईयों-बहनों और बेटियों से मिलने आते-जाते हैं…कई लोग किसी से मिलने नहीं आते-जाते हैं, अपने तीर्थ स्थानों पर जाते हैं…और कई लोग सिर्फ अपने जन्म स्थान या पुरखों की ज़मीन को देखने आते-जाते हैं…
जब ये लोग ये सब नहीं जानते-समझते हैं…तो ये क्या समझते होंगे कि एक देश की भाप दूसरे देश में पानी बन कर बरसती है…एक देश का पंछी दूसरे देश में उड़ कर बिना एयरफोर्स और एटीसी की इजाज़त के आता-जाता रहता है…और सरहदों की बाड़ों के आर-पार न केवल बच्चे आपस में खेलते और खिलौने अदल-बदल करते हैं…बल्कि गांव वाले संगीत सुनते हैं…खाना और सामान की अदला बदली करते हैं…और शाम ढले अक्सर इन बाड़ों के दोनों ओर फ़ौजियों के झुंड एक-दूसरे के गानों के अंतरे पूरे कर रहे होते हैं या चुटकुलों पर ठहाके भी लगा रहे होते हैं…
इन के हाथ में एक माइक है…सामने कैमरा है…पैनल है…पैनलिस्ट हैं…और इनके लिए दो मुल्कों के बीच कोई दाऊद, कोई सईद, कोई शांति वार्ता, कोई सूबा औऱ कोई अहम (ईगो) मुद्दा है…अंध राष्ट्रवाद और मीडिया मिल कर मुद्दों को ऐसे ही मारता है…समझ को ऐसे ही दीमक लगाता है…टीवी के पत्रकारों और एंकर्स की समझ को सलाम करते हुए समझिए कि इनको देख-सुन कर अपनी राय बनाना आपको इनकी ही तरह मूढ़ और विमूढ़ बना देगा…
बेहतर है कि कोई अच्छा गाना सुनिए…उस पार वाले, इस पार का और इस पार वाले उस पार का गाना सुनें…और दुआ करें कि प्याज़ और चीनी की अदला बदली कभी बंद न हो…दोनों ओर गरीबों का घर चलता रहे…और दोनों ही मुल्क धोखेबाज़ सियासतदानों और मूर्ख सहाफियों से आज़ाद हों…
