पिछले दिनों नस्लवादी भेदभाव पर बहसों का बाज़ार गर्म रहा. दिल्ली के मुख्तलिफ़ हिस्सों में उत्तरपूर्व और अफ़्रीकी मूल के लोगों के खिलाफ होने वाले व्यवहार पर रोष प्रगट किया गया और विरोध प्रदर्शन भी हुए. सियासी पार्टियों ने इन घटनाओ के विरोध में बयान दिए, इनके रहनुमाओ ने उन समूहों से मुलाकात करके अपनी एकजुटता दिखाई और नस्लवाद के ख़िलाफ़ उनके साथ खड़े होने का वायदा किया.
हमारे अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भी नस्लवाद के ख़िलाफ़ स्पष्ट प्रतिबद्धता दिखाई और ऐसे हर हादसे का पर्दाफाश करने की कोशिश की. एक बार फिर हमारे पत्रकार बंधुओं ने खुल के नस्लवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई और साबित किया कि तमाम समस्याओं के बावजूद रंगभेद और धर्म के आधार पर होने वाले किसी भी भेदभाव के खिलाफ उनका रुख साफ़ है. इंसानी बराबरी का मूलभूत मूल्य भारतीय पत्रकारिता के ताने बाने का अभिन्न अंग है. तमाम अन्य मुद्दों पर जब हम उनकी आलोचना करते हैं तो हमें उनके धर्म निरपेक्ष चरित्र और मानवता के मूल सिद्धांतों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की सराहना भी करनी चाहिए. ध्यान रहे मैं मीडिया के एक बड़े भाग की बात कर रहा हूँ, कुछ अपवादों की नहीं
इस सन्दर्भ में राजनैतिक दलों के नेताओं के बयान भी दिलचस्प और काबिले गौर हैं.
राहुल गाँधी का कहना है कि “ मैं एक ऐसे भारत में विश्वास रखता हूँ जहाँ भारत का हर नागरिक सम्मान, गरिमा और स्वतंत्रता का हकदार हो चाहे वह उत्तरपूर्व का रहने वाला हो, चाहे दक्षिण का या किसी और क्षेत्र का “
नरेन्द्र मोदी के अनुसार “उत्तरपूर्व भारत का हिस्सा है और हमें यह सुनश्चित करना कि हर व्यक्ति को बेहतरीन सुविधाएँ प्राप्त हों. नीदो की मौत एक राष्ट्रीय शर्म की घटना है ”
सोशल मीडिया में भी मुख्य स्वर इसी तरह के थे और ज्यादातर लोगों ने इस तरह के भेदभाव का विरोध ही किया हालांकि हम अच्छी तरह जानते है कि मानव समानता जैसे मूल्यों के प्रति एक औसत भारतीय का क्या नज़रिया है. सोशल मीडिया के बहुत से तब्सिरों में नीदो और अन्य उत्तरपूर्व के लोगों के प्रति एकजुटता दिखाते हुए कहा गया कि उत्तरपूर्व के लोग भी उतने ही भारतीय हैं जितने की देश के बाकि हिस्सों के लोग या सभी भारतीय सामान है और उनके प्रति किसी भी किस्म का भेदभाव निंदनीय है.
प्रधानमंत्री पद के दो प्रबल दावेदारों के बयानों और सोशल मीडिया में उभरी कुछ आवाजों में एक बात सामान है. दोनों ही नस्लवादी रवैये के विरोध में राष्ट्रवादी आधार पर समानता की बात करते हैं.
हिन्दुस्तानी जम्हूरियत और संविधान में हर “नागरिक” के प्रति समानता और भाई चारे के मूल्य का मैं सम्मान करता हूँ. साथ ही उत्तरपूर्व के सभी बाशिंदों की अपनी राष्ट्रीय पहचान के समर्थन में किये गए हर दावे का समर्थन करता हूँ. इस बात में कोई दो राय नहीं कि अगर उत्तरपूर्व का कोई भी बाशिंदा चाहे तो उसे भारतीय कहलाने का उतना ही हक़ है जितना की किसी और नागरिक को.
किन्तु नस्लवाद के सन्दर्भ में इन वक्तव्यों की बारीक समीक्षा की आवश्यकता है. जब हम ये कहतें है कि उत्तरपूर्व भारत का हिस्सा है और वहां के लोगों के प्रति भेदभाव नहीं होना चाहिए तो कहीं न कहीं हम अखंड-अभिन्न भारत और राष्ट्र की बात कर रहें है. अगर कल को उत्तरपूर्व का कोई राज्य भारत से अलग होने की मांग में सफल हो गया और भारत का भाग नहीं रहा तो आप क्या कहेंगे ? क्या अखंड भारत का नागरिक न होने के कारण उसके साथ भेदभाव न्यायोचित होगा ? अगर यही भेदभाव और नस्लवादी व्यवहार किसी अफ़्रीकी मूल के व्यक्ति के साथ होता है, जो भारतीय नहीं है, तो क्या वह ठीक है? क्या भेदभाव के खिलाफ हमारा नजरिया राष्ट्र के आधार पर होना चाहिए या मानव समानता के सिद्धांत के आधार पर?
अगर हम राष्ट्रीयता की बुनियाद पर भेदभाव का विरोध करते हैं तो ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में भारतियों के खिलाफ नस्लवादी व्यवहार और हिंसा का विरोध किस आधार पर करेंगे? यूरोप में गैर यूरोपिओं के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणियों की मुखालफ़त किस बुनियाद पर करेंगे.
राष्ट्रीयता की यही भावना आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट का आधार है जिसका उपयोग करके सैकड़ों निर्दोष उत्तर पूर्व के लोगों की हत्या की जा चुकी है लेकिन वह आज भी कायम है.ऐसे ही अन्य कानूनों और नीतियों के खिलाफ संघर्ष करने के आरोप में कितने ही लोगों को राष्ट्र विरोधी कह कर जेल भेजा जा चुका है.
खैर यहाँ मैं दमनकारी कानूनों और नीतियों के आधार पर भारत की अखंडता को बचाने के मुद्दे पर बहस नहीं कर रहा. सवाल यह है कि नस्लवादी भेदभाव के विरोध की बुनियाद क्या हो? यह विरोध राष्ट्रीयता के आधार पर हो या इंसानी बराबरी के मूल्यों के आधार पर?
राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव के विरोध मे समस्या यह है कि उसमे गैर राष्ट्रीय लोगों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ कोई तर्क नहीं है, बल्कि ऐसी कई मिसाले है जहाँ किसी समुदाय या व्यक्ति विशेष को राष्ट्र विरोधी घोषित करके राज्य ने उनके खिलाफ भेदभाव और हिंसा को उचित ठहराया है और साथ ही इस भेदभाव और हिंसा के समर्थन में जनमत भी खड़ा किया है. आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट का जिक्र मैंने इसी सन्दर्भ में किया था. यह कानून एक समुदाय के खिलाफ भेदभाव और हिंसा को राष्ट्रीय हित के नाम पर इसे संस्थागत रूप में स्थापित करता है. इस तरह के कानून को देश की “मुख्यधारा”, जिसमे उदारवादी अखबारनवीस भी शामिल हैं , में व्यापक जन समर्थन हासिल है. इसके नाम पर होने वाले भेदभाव और हिंसा का शायद ही कहीं विरोध होता हो. इसी तरह किसी भी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ भेदभाव या हिंसा करने के लिए इतना ही काफी है कि उसे देशद्रोही घोषित कर दिया जाये. इस मायने मैं राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव या नस्लवाद का विरोध संकीर्ण सोच को जन्म देता है जो मानवीय समानता के मूल्य के विरुद्ध जाती है.
नस्लवाद के विरोध में मानव समानता के सिद्धांत के इतर कोई भी आधार लोक लुभावन तो हो सकता है पर यह जरूरी नहीं की वह तर्क पर आधारित हो. बल्कि कई घटनाओं में यह आधार संकीर्ण, नस्लवाद समर्थक और भ्रामक भी हो सकते हैं. शायद यही कारण है की हम भारत में नस्लवाद के अस्तित्व को लगातार नकारते रहें है और इसे अन्य नामों से संबोधित करते रहें है. मुख्यधारा के अलावा ये भ्रम शायद तथाकथित प्रगतिशील ताकतों और उदारवादी मीडिया में भी मौजूद है जिस कारण इस विषय पर आजतक शायद अर्थपूर्ण बहस नहीं चल पाई. इसलिए नस्लवाद या किसी भी भेदभाव का विरोध करने से पहले यह जरूरी हो जाता है कि हम तय करे कि इसके विरोध के पीछे हमारा मूलभूत सिद्धांत क्या है.
(लेखक डेवलेपमेंट प्रोफेश्नल के रूप में टेरे डेस होम्स, जर्मनी में कार्यरत हैं और पिछले कई सालों से बाल अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।)
