क्या संबंध है गुजरात के विकास के मॉडेल और दंगे के मॉडेल में?

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लोकसभा चुनाव हमेशा ही मनोरंजनप्रद रहा है. और जबसे चौबीसों घंटे चलनेवाले टीवी चैनल आए है ये और भी मज़ेदार हो गया है. इस मनोरंजन में चुनाव भी गैरमामूली हो गया है. टीवी स्टूडियो में बैठे आकाओं ने इसे महज़ दो पुरुषों के बीच का कुश्ती बना दिया है.

ये बहुत ध्यान देने की बात है की ना मोदी ना ही गाँधी जनता से जुड़े मुद्दों पर एक दूसरे की आलोचना  करते है. हाँ, सभी  ग़रीबी और भ्रष्टाचार  का रोना रोते है. जो भी इस देश में कुछ होना चाहता है वो बिल्कुल इन दोनों के खिलाफ जंग छेड़कर जनता का मसीहा बनता है पर ये दोनों शैतान की तरह बढ़ते ही जाते है. पूरे देश में मोदी के समर्थक और उसके आलोचक सभी के लिए मोदी की पहचान गुजरात के 2002 के दंगे से बनी है, जिसमें राज्य मशीनरी की खुलेआम मिलीभगत से हज़ारों मुसलमान मारे गये और बाकी बचे सारे मुसलमानों को बस्तियों में हाशिए पे रहने के लिए धकेल दिया. आश्चर्य है कि अपने चुनावी भाषणों में मोदी इसकी कभी चर्चा नहीं करते. और तो और राहुल भी इस मुद्दे पर चुप ही रहते है.

गुजरात के 2002 के दंगे से लोगों का ध्यान हटाने के लिए, मोदी और उसके प्रचारक उनके  तथाकथित विकास-पुरुष की छवि पर ज़ोर डालते है. और इस मुद्दे पर विरोधियों की चुप्पी और भी गहरी है. कॉंग्रेस के साथ-साथ और उनके बाकी आलोचकों की भी. मोदी के गुजरात विकास के मॉडेल की अस्पष्ट पर पुरज़ोर दावा का मुखर विरोध नहीं होता.

विकास-पुरुष, पर ये विकास किसके लिए है?

मीडीया मोदी के गुजरात की तरक्की की कसीदे पढ़ते नहीं थकती. और ये मानी हुई बात है. क्योंकि मीडीया को चलानेवाले सारे उद्योगपति मोदी के मुरीद है. और उन आकाओं के अनुचर मध्यम वर्गीय भी मोदी को हाथों हाथ लेते है.

कुछ महीने पहले हुए वाइब्रांट गुजरात 2013 में मोदी दोनों अंबानी भाइयों अनिल और मुकेश के साथ मंच पर अवतरित हुए. मोदी के प्यार में दोनों भाइयों ने अपने बीच के पारिवारिक झगड़े को दरकिनार कर दिया. अपनी आँखों से मोदी के लिए श्रद्धा छलकाते हुए मुकेशभाई ने मोदी की तारीफ़ अलौकिक दृष्टि वाले एक महान नेता के रूप में की. उनके छोटे भाई अनिल, मोदी की प्रशंसा में उनसे एक कदम आगे निकल गये, उन्होनें मोदी की तुलना अर्जुन से कर दी. उन्होनें कहा की नरेन्द्रभाई की दृष्टि अर्जुन की तरह स्पष्ट है, वें नेताओं के नेता, राजाओं के राजा और आदमी में देवता है. अपने लकदक  कपड़ों में  सुसज्जित रतन टाटा ने कहा की  गुजरात कई मायनों में देश के बाकी राज्यों से अलग है और इसका श्रेय मोदी को दिया जाना चाहिए. उनका ये स्तुतिगान जायज़ है. टाटा के नानो प्लांट को बंगाल की जनता ने जब अपने प्रदेश से बाहर फेंक दिया तो गुजरात में ही प्रश्रय मिला.

लेकिन टाटा ग़लत नहीं है गुजरात को एक अलग राज्य मानने में. लेकिन किस तरह भिन्न है ये गौर करने की बात है.

अगर आँकड़ों की बात करे तो गुजरात कृषि, उत्पादन, मूलभूत सुविधाएँ, और निवेश में काफ़ी आगे है. पिछले दशक में इस राज्य की जीडीपी  का विकास दर राष्ट्र के औसत दर से बेहतर रहा है. केवल महाराष्ट्रा, तमिलनाडु और हरियाणा ही गुजरात के बराबरी में हैं. देखा जाय तो सभी क्षेत्रों में कृषि सहित विकास दर बहुत ही संतुलित है.

अभी हम थोड़ा रुकते है और समझते है जीडीपी को और इसके महत्ता को. जीडीपी( ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट) यानी सकल घरेलु उत्पाद एक  निश्चित अवधि के भीतर एक निश्चित भौगोलिक स्थान के संपूर्ण माल और सेवाएँ के मूल्य का कुल योग है. दूसरे शब्दों में जीडीपी किसी समाज या स्थान की संपत्ति का संपूर्ण परीमात्रा है. जीडीपी ये नहीं बतलाता कि समाज में इस संपत्ति के बँटवारे का स्वरूप क्या है. मान लेते है क और ख दो पड़ोसी गाँव है और दोनों की जनसंख्या दस है. क में गाँव के मुखिए के पास नौ सौ रुपये है और बाकी नौ लोगों के पास दस-दस रुपए है. तो क का जिडेपी हुआ नौ सौ नब्बे. ख गाँव में सभी के पास पचास-पचास रुपये है. तो ख  का जिडेपी हुआ पाँच सौ. जिडेपी के लिहाज़ से क गाँव ख से आगे है. पर बराबरी और जनसमृद्धि में ख गाँव क से बेहतर है.

मोदी का गुजरात क गाँव की तरह है.

मीडीया भले ही इस बात को छुपाती है, सच ये है  कि उद्योगपतियों और व्यवासियों द्वारा प्रशंसित गुजरात विकास के ढाँचे ने राज्य में बेरोज़गारी, ग़रीबी, और असमानता को बढ़ाया है. इस तथाकथित विकास के कारण किसानों को अपनी ज़मीनें गँवानी पड़ी और स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत अधिकार भी आम लोगों की पहुँच से बाहर हो गयी है. न्याय और शांति भी इस विकास की बलिवेदी पर कुर्बान हुई है पर इस पर चर्चा हम बाद में करेंगे.

जनसाधारण और मेहनतकश आवाम के लिए क्या है गुजरात मॉडेल में?

रोजगार: मोदी के विकास में आम लोगों के रोजगार की बलि चढ़ी है. विकास का ज़ोर शुद्ध पूंजी पर है ना कि मानव पर. भारत में गुजरात का निर्माण उद्योग भारी पूंजी पर आधारित है और रोजगार बढ़ने के बजाय घटा है. रोजगार वृद्धि दर जिसे तकनीकी भाषा में कॉंपाउंड ग्रोथ रेट ( सीजीर) कहते है 1993-94 से 2003-2004 के दरम्यान लगातार 2.6% रहा है, वहीं 2004-05 से घटते हुए 2009-10 में शून्य पर आ गया. ये बगैर रोजगार में वृद्धि के विकास का आदर्श उदाहरण है.

निर्माण उद्योग और प्राथमिक क्षेत्र में रोजगार लगातार घटता ही जा रहा है, जो भी वृद्धि हुई है वो है सेवा क्षेत्र में. मूलतः शहरों में. ये नौकरियाँ ज़्यादातर अस्थायी होती है. और इन नौकरियों के लिए जैसी योगताएँ चाहिए होती है मसलन अँग्रेज़ी की जानकारी वो बहुत पिछड़े तबके के लोगों के पास नहीं होती है. जाहिरन, वें इन नौकरियाँ के लिए अयोग्य होते है.   दलितों, आदिवासियों और मुस्लिम समुदाय के लोगों को नौकरी मिलने का प्रतिशत बहुत ही खराब है.

मज़दूरी: निर्माण उद्योग में रोज़गार ही नहीं मज़दूरी भी बहुत कम रहा है गुजरात में. 2000 से 2010 के बीच  राष्ट्रीय स्तर पर वेतन वृद्धि दर 3.7% रहा. जिस दर से धनिकों ने अपने धन को बढ़ाया उसकी तुलना में ये आम लोगों के वेतन में वृद्धि बहुत ही न्यायविरुद्ध है. लेकिन गुजरात में ये दर और भी कम है. इसी समय में गुजरात में वेतन वृद्धि दर मात्र 1.5% रहा. श्रमिकों के वेतन में कमी का कारण काम में बढ़ता ठेकेदारी प्रथा है. 2001 से 2008 के बीच ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों की संख्या 19% से बढ़कर 34% हो गई. तो ये विसंगतीपूर्ण नहीं है कि श्रमिकों के बदतर हालात ने निर्माण उद्योग के लाभ को बढ़ा दिया है और इस बढ़े हुए लाभ से उद्योग में पूंजी निवेश भी बढ़ गया है.

कृषि: गुजरात का कृषि क्षेत्र में हुई वृद्धि राष्‍ट्रीय वृद्धि दर से काफ़ी आगे है. राज्य के आय का 88% हिस्सा खेती से आता है फिर भी रोज़गार में इसका हिस्सा केवल 48% है. निर्माण उद्योग की तरह यहाँ भी वृद्धि ने लोगों को रोज़गार नहीं  दिया है.

ये वृद्धि अनाज के बदले नकदी और उच्चे दामों वाले फसलों की खेती और खेती के ज़मीन को निज़ी कम्पनियों को सौंपने से हुई है. इस व्यवसायीकरण ने ग्रामीण रोज़गार को घटा दिया है और छोटे किसानों और जो भी लोग खेती के विभिन्न कामों से अपनी रोज़ी-रोटी चला रहे थे उनको दरकिनार कर दिया है तथा खेती के ज़मीनों से उन्हें बेदखल कर दिया है. मोदी की सरकार ने भूमि क़ानून को बदल दिया और उसके स्थान पर बहुत ही लचर कृषिभूमि क़ानून लागू किया जिससे गाँव की  सार्वजनिक संपत्ति और भूमि का आसानी से निजीकरण हो सके और ज़मीन पर सट्टेबाज़ी को छूट मिलें. अनाज के उत्पादन में भी कमी आई है जिससे शहर और गाँव के ग़रीबों की हालत और भी खराब हुई है.

ग़रीबी उन्मूलन के मामले में भी गुजरात राज्य की स्थिति में नब्बे के दशक के मुक़ाबले कुछ भी सुधार नहीं हुआ है. 2009-10 के अंत तक गुजरात में ग्रामीण ग़रीबों की संख्या तमिलनाडु और हरियाणा से काफ़ी ज़्यादा थी. ये है मोदी का तथाकथित चमत्कार.

शिक्षा: गुजरात एक धनी राज्य है जो अपने ग़रीबों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य पर बहुत ही कंजूसी से खर्च करता है. अगर तथ्यों पर गौर करें तो साक्षरता के मामले में गुजरात की प्रगति पूरे देश के मुक़ाबले बहुत ही धीमा है. 2000 से 2008 के बीच साक्षरता और स्कूल में नामांकन के पंद्रह मुख्य राज्यों के सूचकांक में गुजरात पाँचवे स्थान से फिसलकर सातवें स्थान पर आ गया. इसी अवधि में 6 से 14 बर्ष के बच्चों के स्कूल में भारती होने की संख्या के पूरे देश के  सूचकांक में गुजरात 21वें से फिसलकर 26वें स्थान पर आ गया.  छः और उससे ज़्यादा उम्र के बच्चे के स्कूल में दाखिला लेने की संख्या के सूचकांक में 1999 के अपने 23वें स्थान से गिरकर 2008 में 30वें स्थान पर आ गया. मूलभूत शिक्षा के मानकों के सभी सर्वेक्षणों में पूरे देश के 35 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के सूचकांक में गुजरात का क्रम 19वें और 30वें के बीच पड़ता है.

राष्‍ट्रीय औसत के मुक़ाबले गुजरात में स्कूल जानेवाली लड़कियाँ की संख्या कम है और  दलितों और अल्पसंख्यक समुदाय से भी कम बच्चें स्कूल जाते है.

हक़ीक़त ये है कि गुजरात सरकार शिक्षा को प्राथमिकता नहीं देती और इस पर बहुत ही कम खर्च करती है. भारत के अन्य राज्यों के मुक़ाबले मोदी का  गुजरात इस बात में अलग है कि ये अपने जीडीपी का बहुत कमतर हिस्सा शिक्षा पर खर्च करता है.

स्वास्थ्य: मोदी के शासन में आते ही गुजरात सरकार द्वारा स्वास्थ्य पर किए गया खर्चा गिरकर राष्ट्रीय औसंत से भी कम हो गया. स्वास्थ्य के मामले में भी निजीकरण को ही महत्ता दी जा रही है. शहरों और गाँवों में  स्वास्थ्य सेवा निज़ी कंपनी के भरोसे है जिसकी उच्ची कीमतों ने ज़्यादातर जनता को इस सेवा से मरहूम कर दिया है. शिशु मृत्यु दर के सूचकांक में गुजरात का स्थान  10वां है. ये दर ग्रामीण क्षेत्रों में और भी अधिक है तथा दलितों और आदिवासियों में शिशु मृत्यु दर और भी बुरा है. नवजात शिशु के देखभाल के मामले में गुजरात का स्थान 1990-95 से 2005-2010 के बीच 9वें से गिरकर 11वां हो गया.

गुजरात में कुपोषण राष्ट्रीय औसत से अधिक है. मतलब कि गुजरात में ज़्यादा लोग भूखे सोते है जबकि राज्य की जीडीपी बुलंदी छूती है. राज्य में इस शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा की बदहाली लापरवाही या भ्रष्टाचार की वजह से नहीं है बल्कि ये गुजरात मॉडेल के विकास का प्रत्यक्ष दुष्परिणाम है.

सरकार की नीति का रुख़: मोदी की बीजेपी सरकार और मनमोहन की यूपिए  सरकार दोनों ही बाज़ार और निज़ी पूँजीनिवेश के भक्त है. इस कदर है उनकी भक्ति कि वें पूंजीनिवेश को सामाजिक कल्याण और जनता के उत्थान का साधन नहीं मानते बल्कि पूंजीनिवेश ही उनका अंतिम लक्ष्य है. निवेशक अपने फ़ायदे के  लिए सरकार की नीतियाँ तय कर रहें है. निजी पूँजीनिवेश से हुए विकास से उद्योगपति के तो पौ बारह है पर रोज़गार उत्पत्ति, आजीविका और ग़रीबी उन्मूलन हाशिए पे धकेले जा रहे है.

इस नीति ने क़ानूनों में तब्दीली करके किसानों के हाथ से उनकी ज़मीन छिन ली है.  ऐसी योजनयों को तरज़ीह दी जाती है जिससे पूंजीनिवेश को बढ़ावा मिले और निवेश का लाभ बढ़े. जनसाधारण की ज़रूरतों को अनदेखा  किया जाता है. रेल और सडक का निर्माण विशेष आर्थिक क्षेत्रों और औद्योगिक इलाक़ों को जोड़ने के लिए किया जात है ना कि लोगों की सुविधाओं के लिए. निज़ी पूंजी और उद्योगों के लिए कारों में भारी छूट दिया जाता है. यहाँ ये बात गौर करने की है ये पैसा ग़रीब जनता का है ना कि सरकार का. साथ ही साथ सार्वजनिक कामों और जनकल्याण के लिए खर्चे में कटौती की जाती है. सरकारी सुविधाएँ रोक दी जाती है. और मात्र मुनाफ़ा कमाने के लिए निज़ी पूँजी से चल रहे संस्थानों के भरोसे जनसाधारण को छोड़ दिया जाता है.

एक बुनियादी सच्चाई हमें हमेशा याद रखनी चाहिए कि धनी, उद्योगपति, संभ्रांत और जनसाधारण और मेहनतकश आवाम के हित ना केवल अलग है बल्कि परस्पर-विरोधी है. जो धनी वर्ग के लिए अच्छा है वो ग़रीबों के लिए कभी अच्छा नहीं हो सकता और जो ग़रीबों के लिए हितकर है वो धनिकों के लिए बुरा है. ये बहुत साधारण और साफ दिखाई पड़नेवाली सच्चाई है जो सत्ताधारी नहीं चाहते कि हम देखे और समझे.

ऊपर के आँकड़ों से ये साफ हो जाता है कि गुजरात के विकास का मॉडेल पूंजीपतियों, उद्योगपतियों और निज़ी पूंजीनिवेश के फ़ायदे के लिए है और ग़रीबों, दलितों, मज़दूरों, औरतों, अल्पसंख्यक और आदिवासियों के खिलाफ है.

मोदी और यूपीए में कोई फ़र्क नहीं है इसलिए कॉंग्रेस चुप है

गुजरात एक आदर्श उदाहरण है कि कैसे बाज़ार संचालित विकास आम जनता पर कहर बरपाती है. कॉंग्रेस गुजरात मॉडेल के खिलाफ या तो कुछ नहीं बोलती या अपने को बेहतर साबित करने की कोशिश करती है क्योंकि बुनियादी रूप से मनमोहन की आर्थिक नीतियाँ मोदी से अलग नहीं है. देखा जाय तो सारे संसदीय दलों की नीतियों का मूलभूत आधार एक ही है. वें जब भी सत्ता में होती है बाज़ार वाली आर्थिक नीति ही अपनाती है. यहाँ ये बात ध्यान में रखने वाली है कि तथाकथित तीसरे मोर्चे ने कभी कॉंग्रेस तो कभी बीजेपी प्रायः दोनों को ही अपना समर्थन दिया है.

मोदी मोदी है क्योंकि वो कॉंग्रेस की नीतियों को कॉंग्रेस से भी बेहतर ढंग से लागू करने में सक्षम है. कॉंग्रेस और अन्य राजनीतिक पार्टियाँ जो सत्ता में साझीदार है जनता के आंदोलनों से डरकर और चुनावी स्पर्धा में अपने आपको बनाए रखने के लिए थोड़ा धीरे-धीरे चलती है. कभी-कभी नाममात्र के लिए वें उदारवादी नीतियों के दुष्परिणामों को हलका करने के लिए कुछ कदम भी उठाती है. बेशक ये कदम नीतियों में बुनियादी बदलाव नहीं लाते बस बाज़ार के वेग को धीमा करके लोगों को थोड़ा राहत पहुँचाते है. इन चुनावी विवशता से उठाए गये कदमों से हमारे महान औद्योगिक नेता व्याकुल हो जाते है और अर्थनीति को राजनीति से अलग करने की माँग करते है. जिसका मतलब है कि सरकार जनसाधारण की इच्छाओं और ज़रूरतों को दरकिनार करके केवल निजी पूंजी के हितों की पूर्ति करें. यहीं मोदी   औद्योगिक नेताओं को भले लगते है.

मज़दूरों द्वारा विरोध के सबसे ज़्यादा घटनाओं के बावजूद  उद्योगपतियों को गुजरात क्यों रास आता है?

2011 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार गुजरात में श्रमिकों के अशांत होने की घटनाएँ सबसे अधिक है. जो कि दयनीय मज़दूरी और काम की शर्तों को देखते हुए अप्रत्याशित नहीं है. पूरे भारत में उद्योगपति मज़दूरों से परेशानी का बहाना लेकर वें अपनी पूंजी बाहर ले जाने की धमकी देते है. पर गुजरात में ऐसा नहीं है. उन्हें भरोसा है कि मोदी के रहते मज़दूरों का विरोध या बवाल कितना भी गंभीर क्यों ना हो, उन्हें नुकसान नहीं होने वाला है.

क्योंकि गुजरात का निवेशकों के हित में बनी हुई नीतियाँ एक विशेष तरह के प्रशासन और राजनीति से संचालित है.

करों में छूट और अनुकूल आर्थिक नीतियों के कारण उद्योगपति 2002 के गुजरात दंगे को भूलकर मोदी को नहीं चाहते बल्कि इसलिए चाहते है कि जिन ताकतों ने राज्य और प्रजातंत्र को ठेंगा दिखाकर हज़ारों की संख्या में लोगों का नरसंहार किया और विस्थापित किया. वहीं ताकतें ज़रूरत पड़ने पर उनकी पूंजी को भी अभयदान देगी.

2002 का गुजरात दंगा दो मायनों में काफ़ी महत्व का है – राज्य मशीनरी की दंगे में मिलीभगत और सुप्रशिक्षित और सुनियोजित गुडों को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने की मोदी और आरएसएस की काबिलियत. अपने आरएसएस नेता और मुख्यमंत्री के दोहरी भूमिका को निभाते हुए, मोदी ने राज्य मशीनरी और अपने गुंडे का बखूबी इस्तेमाल किया. संप्रदायिक भावनाओं को कुशलतापूर्वक भड़का कर जनता का समर्थन हासिल किया गया. मुख्य पुलिस अधिकारियों को हत्यारों को सहायता देने के लिए निर्देशित किया गया और पुलिस बल को तटस्थ रहने के लिए कहा गया. हत्या के संगठकों को सुरक्षा और भौतिक सहायता के रूप में राज्य का पूरा समर्थन मिला. राज्य सरकार की मिलीभगत इस कदर है कि पीड़ितों को इंसाफ़ मिलना लगभग असंभव है. जहाँ ग़लत एफआईर, बेतुका जाँच-पड़ताल और अपराधियों को सरकार का खुला समर्थन हो वहाँ इंसाफ़ की आशा रखना ही ग़लत है. सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप और मुक़दमे को राज्य से बाहर ले जाने के आदेश से भी कुछ नहीं हो सका. जब पूरा तंत्र ही मिला हो तो कुछ हो भी कैसे सकता है?

सीधे लफ़्ज़ों में कहे तो गुजरात का दंगा दिखाता है कि मोदी की कठोर ताक़त बड़े निवेशकों के हितों को नुकसान पहुँचाने वाले किसी भी तरह के विरोध, मज़दूरों के एक होकर लड़ने की क्षमता, बड़ा या छोटा जनांदोलन को बेरहमी से दबा सकता है. कोई भी गुस्ताख अगर विरोध करने का दुस्साहस करता है तो उसे इस ताक़त से रु-ब-रु होना पड़ेगा. मुसलमानों को मारने के बाद  संघर्षरत मज़दूरों को मारना एक सहज प्रक्रिया है. हाल के समय में शिव सेना ऐसा कर चुका है. हाँ, शिव सेना का रास्ता उल्टा था. बीच में लूँगीवाला यानी मुंबई में रहने वाले दक्षिण भारतीय लोगों की पिटाई से पहले शिव सेना ने ट्रेड यूनियन से जुड़े मज़दूरों और उसके नेताओं को मारकर ही अपनी पहचान बनाई और मुसलमानों को मारकर सत्ता में आई.

ग़रीबों को देश के किसी भी भाग में प्रजातंत्र या क़ानून-व्यवस्था से कुछ हासिल नहीं है. पर गुजरात में मोदी ने इसको और भी क्रूरतम बना दिया है. गुजरात में क़ानून-व्यवस्था का पर्याय है तानाशाही की राजनीतिक संस्कृति. अर्थशास्त्री अतुल सूद के अनुसार ये तानाशाही की संस्कृति ही निवेशकाओं को भरोसा दिलाती है गुजरात में पूंजीनिवेश के लिए. भले ही इस संस्कृति ने हाल में अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय, पिछड़ी जातियों और आदिवासियों   के खिलाफ अपना हिंसक रूप दिखाया.  नर्मदा बाँध के खिलाफ चल रहे लोगों के आंदोलन में यहीं हुआ था.

शांति और न्याय का ख़ात्मा बाज़ार संचालित विकास का परिणाम ही नहीं इसका सुचारू रूप से चलने के लिए अनिवार्य भी है.

(ऊपर दिए गये सभी आंकडें आकार बुक्स से प्रकाशित किताब ‘पॉवर्टी अमिड्स्ट प्रोसेप्रिटी: एस्सेज़ ऑन ट्रजेक्टरी ऑफ डेवेलपमेंट इन गुजरात’ से लिया गया है. )

(Written in October 2013, First Published in Morcha in November and December issues)

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