अज्ञात – मृत्युंजय प्रभाकर

mrityunjay

अज्ञात
21/10/2013

पता नहीं वे कौन सी ताकतें हैं
जो जीवन को रेगिस्तान में बदल देना चाहती हैं
जबकि आदमी घिसटता है
लहूलुहान टखनों के साथ
एक पोर दूब और दो बूँद पानी के लिए!

मसला
14/10/2013

मसला तो यूँ कुछ भी न था
पर कुछ ज़िन्दगी की कसक
और कुछ बजबजाती हकीक़तों ने इसे
अच्छा-खासा मसाला बना दिया!

सच
23/04/2013

अजीब विडम्बना है

अपनी आहत भावना लेकर

यहाँ हर कोई आखेट पर निकला है!

ज़िन्दगी
5/04/2013

जब तक रहूँगा, परेशान करेगी

कदम-कदम पे, जीना हराम करेगी

रोते-हँसते सुबह से शाम करेगी

ऐ ज़िन्दगी बता, तू बला क्या है

खैरियत
14/03/2013

बड़ी अदा से पूछते हैं वो, सब खैरियत तो है

पीठ पीछे जाते ही, खंजर से वार करते हैं

हिंदी
6/03/2013

हिंदी का खाता हूँ
हिंदी का पीता हूँ
हिंदी में पढ़ता हूँ
हिंदी में लिखता हूँ
हिंदी ही सोता हूँ
हिंदी ही ओढ़ता हूँ
हिंदी में गाता हूँ
हिंदी में रोता हूँ
हिंदी में जीता हूँ
हिंदी में कुढ़ता हूँ।

मृत्युंजय प्रभाकर

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