याद है फिल्म देव डी।
देव के किसी ने कान भर दिए कि वो पारो के साथ सो चुका है। देव का दिमाग खराब। वो बिना सोचे-समझे इस बात को सच मान लेता है और पारो को लूज कैरेक्टर।
अगर वह पारो मीना कुमारी, मधुबाला और यहां तक कि माधुरी दीक्षित और जूही चावला भी होती तो क्या करती? देव के पैरों में गिर जाती, अपनी शुचिता, पवित्रता और बेदाग चरित्र की दुहाई देती। देव से हाथ जोड़कर कहती कि वो झूठ बोल रहा है। ये सच नहीं है। मैंने तुम्हारे अलावा किसी को नहीं छुआ। मेरे शरीर पर सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा हक है। एंड ब्ला-ब्ला-ब्ला डायलॉग मारती।
लेकिन इस पारो की सबसे खास बात ये थी कि बावजूद इसके कि उस आदमी ने झूठ कहा था, पारो एक भी बार अपनी सफाई नहीं देती। एक भी बार रो-रोकर ये नहीं कहती कि मैं बेदाग हूं, वो झूठा है। उल्टे कहती है – “लोमड़ी साले, तूने उसका सिर फोड़ा रसिका को गाड़ी में घुमाने के बाद। तू करे तो ठीक और मैं करूं तो?” बावजूद इसके कि उसने कुछ नहीं किया, वो ये सफाई देने को तैयार नहीं कि मेरा यकीन करो, मैंने कुछ नहीं किया।
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इसलिए पारो मुझे पसंद है। वो सफाई नहीं देती। मुझे भी सफाई देना पसंद नहीं। इनफैक्ट सही बात ये होगी कि पहले देती थी क्योंकि डरती थी। सफाई न देना भी मैंने वक्त के साथ सीखा है। पहले भी ब्वॉयफ्रेंड था। हां था तो, लेकिन ये स्टुपिड क्वेश्चन पूछा ही क्यों। क्यों मैं रो-रोकर किसी को ये एहसास दिलाती फिरूं कि तुम गलत बोल रहे हो। मैं ऐसी नहीं हूं।
तुम्हें लगता है कि ऐसी हूं तो ऐसी ही सही।
हां, हूं। ऐसी ही हूं। तो? जो करना है, कर लो। भाड़ में जाओ। वैद्य जी ने नहीं कहा कि मेरे साथ रहना जरूरी है।
गलती मैंने नहीं की है, जो सफाई दूं। गलती तुम्हारी है। मुझसे ऐसा सवाल पूछने की तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई। चोर की दाढ़ी में तिनका। मिलान कुंदेरा को पढ़कर क्या उखाड़ोगे, अगर हमारी आंखें नहीं पढ़ सकते।
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आज भी अपने आसपास जब मर्दों को उंगली टेढ़ी करके और आंखें तरेरकर सवाल करते देखती हूं और लड़कियों को सफाई देते कि “ये झूठ है, मैं अच्छी हूं” तो बहुत गुस्सा आता है।
लड़कियों ! सफाई मांगने वाले मर्द खुद चोर हैं। उनकी दाढ़ी में छिपा हुआ तिनका देखो। याद रखना कि किसी को सफाई नहीं देनी। सफाई सिर्फ अपने आपको देनी है। सच सिर्फ अपने आप से कहना है। ईमानदार सिर्फ अपने आप से होना है।
सवालिया उंगली उठाए मर्द इस सच और ईमानदारी के काबिल नहीं।
