राजेन्द्र यादव का अन्तिम सम्पादकीय :
कुछ विचारोत्तेजक अंश
“देश की नीतियां बनाने वाले मोंटेकसिंह अहलूवालिया, मनमोहन सिंह और पी. चिदम्बरम जैसे अर्थशास्त्री या तो आंकड़े भौंकते हैं या फिर आश्वासन देते हैं कि पांच साल बाद प्याज की कीमतें दो-तीन रुपया कम हो जाएँगी, दालें एक रुपया सस्ती हो जाएँगी और रुपया नियंत्रण में आ जायेगा, ये सारे शेखचिल्ल्यों वाले दिलासे देते हुए अपने प्रधानमंत्री जब जैकेट की जेब में एक हाथ डाले मंद-मंद मुस्कराते ठुमक-ठुमक चलते हैं तो सचमुच पत्थर फेंकने का मन करता है. मूलभूत चीजों और जरूरतों का हल कोई नहीं है, मगर आँकड़ों के इन्द्रधनुष चारों ओर फैलाये जा रहे हैं, साथ ही ये भी बताया जा रहा है किहमारे देश का रहन-सहन किन-किन देशों के मुकाबले बराबर है या उससे बढ़कर है; वहां चीजों की कीमतें किस तरह हमसे अधिक हैं, इन लफ्फाजियों को सुनकर आदमी कलेजा कूटे या माथा फोड़े? एक तरफ इतनी गरीबी है तो एक छोटे वर्ग को इतना संपन्न और विलासी क्यों बनाये जा रहे हो, कि उसके लिए तरह-तरह की कारें और परफ्यूम या अन्य गैरजरूरी चीजें बनाने वाली बाहर की कम्पनियां देश में घुस आयें. पहले कारें-बाइकें बिकवाकर उन्हें मुनाफा दिलवाओगे, फिर कारों के लिए तेल खरीदने में पैसा खर्च करोगे, तो रुपया तो दम तोड़ेगा ही. लगता है किताबी ज्ञान से बीमार बच्चों ने कोई जटिल मशीन खोलकर पुर्जे-पुर्जे बिखेर दिए हैं और अब माथा पकड़े रो रहे हैं कि इन्हें वापस कैसे फिट करें, “हमारे हाथों में क्या जादू है!”
“वह दिन सचमुच डूब मरने का होगा जब ये सरकार दोबारा चुनाव जीत लेगी. मगर मुश्किल है कि उधर गुजरात के चंगेज खां नरेंद्र मोदी तलवारें हिला-हिला कर अगला प्रधानमंत्री बनने की घोषणाएं कर रहे हैं. देखा जाये तो अधिकाँश घोटालों, कमीशनों और स्कैंडलों के प्रारंभकर्ता यही बीजेपी के दिग्गज रहे हैं. एक सांपनाथ है तो दूसरा नागनाथ.
“एक दूर की सम्भावना तीसरे मोर्चे के सत्ता में आने की भी है. मगर वहां इतना बिखराव है कि अभी कोई शक्ल उभरती दिखाई नहीं देती. शर्म आती है कि हमने तो जैसे-तैसे रो-पीटकर जिन्दगी बिता ली, मगर आने वाली पीढ़ी के लिए कौन-सा नरक छोड़े जा रहे हैं. शायद यही विकल्पहीनता है, जो आदिवासियों को नक्सल बनने की तरफ धकेलती है.
“जुलाई के अंक में नक्सलवाद पर मेरी और विवेक मिश्र की बातों की प्रतिक्रिया में दर्जनों पत्र आये हैं- समर्थन और विरोध दोनों में. मैंने कभी नहीं कहा और शायद कहूँगा भी नहीं कि हिंसा जरूरी है. मगर जब मारने और मर जाने के सिवा कोई विकल्प न रहे तो दमन का उत्तर हिंसा के सिवा क्या होगा? कुछ समस्याएं तत्काल हल मांगती हैं. उनके लिए गाँधी जी की तरह पचासों साल तक अहिंसा के प्रयोग वाला धैर्य नहीं रखा जा सकता. जब मंदिरों, स्कूलों, अस्पतालों, पंचायतों को पुलिस या पैरा-मिलिटरी के दुर्गों में बदल दिया गया हो तो उन पर हमले करने के सिवा रास्ता क्या है? भले ही बाद में दुनिया भर में यह फैलाया जाता रहे कि नक्सलियों ने मंदिरों, स्कूल, अस्पताल, पंचायतघर- सब पर हमले किये.” (हंस, अक्टूबर 2013, मेरी तेरी उसकी बात, पृष्ठ 3-4)
