बदलता वक्त , बदलता मौसम और बदलती रामलीला – Kishore Jha

Kishore
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कल कई सालों बाद बचपन के एक दोस्त से मुलाकात हुई . बातों का सिलसिला बचपन के दोस्तों से लेकर उनके साथ की गयी शरारतों तक चला. बातों बातों में उन सब जगहों की सैर भी करी जहाँ बचपन में जाया करते थे और खेला करते थे .
दिल्ली में दो दोस्त मिले और मौसम का रोना ना रोयें ये मुमकिन नहीं. सुना है लन्दन में जब लोग मिलते है तो मौसम पर गुफ्तगू जरूर करते हैं. दिल्ली में भी दो परिचितों के मिलने पर माजरा कुछ ऐसा ही होता है . हमने भी अपना आलाप शुरू किया “ आज गर्मी बहुत है “. ये रोना दिल्ली वाले पिछले छह महीनो से आलाप रहें है. अक्टूबर का महीना शुरू हों गया पर आज भी दिल्ली में एयर कंडीशनर और कूलर चलते दिखाई दे जायेंगे . जहाँ तक याददाश्त जाती है वहां तक याद पड़ता है कि दिल्ली में अक्टूबर का महीना मौसम बदलने का पैगाम लाता रहा है . ये बदलाव अक्टूबर की शुरुआत से शुरू हों जाता था और नवरात्रे शुरू होते होते हवा में ठंडक आने लगती थी . नवरात्रों की शुरुआत के साथ साथ रामलीला और पूजा का दौर भी शुरू हों जाता है. दोस्त ने याद दिलाया कि बचपन में नवरात्रों में जब हम रात को रामलीला देखने जाते थे तो हल्की हल्की ठण्ड भी शुरू हों जाती थी . यहं तक कि कुछ लोग रामलीला देखने आधी बाजु की जर्सी पहन कर आते थे .उस गुलाबी सर्दी में गरम गरम मूंगफली का स्वाद आज भी अपनी जुबान पर महसूस कर सकता हूँ . आज आलम यह है कि रात को भी पंखे और कूलर चल रहे हैं .
रामलीला के जिक्र के साथ साथ दिल्ली में होने वाली रामलीलाओं और उनके बदलते स्वरुप का ख्याल भी जहन में आया. जहाँ मैं रहता था वहां दो किलोमीटर के दायरे में कम से कम पांच रामलीलाएं होती थी . हर चोथी गली में नहीं तो हर दसवीं गली में रामलीला का खेल जरूर खेला जाता था . ये रामलीलाएं बहुत ही छोटे स्तर पर आयोजित की जाती थी . रामलीला करने वाले कलाकार भी मोहल्ले के ही लोग होते थे और इसका आयोजन भी स्थानीय चंदे के बलबूते पर होता था . इक्कीस या एक्क्यावन रूपये का चंदा देने वाले का नाम बाकायदा स्टेज से घोषित किया जाता था . कई महीने पहले रामलीला की तैयारियां शुरू हों जातो थी और मोहल्ले के बच्चे उसमे बढ चढ़ कर हिस्सा लेने की कोशिश करते थे . मझे भी एक बार हनुमान की सेना में शामिल होने का मौका मिला था . 6-7 दिन चली रामलीला में मेरा एक भी डायलाग नहीं था पर पर कई दिन तक बानर सेना का भाग बनने के लिए रिहर्सल करी थी और पुरे सात दिन तक उत्साह से रामलीला में भाग लिया था .
आज इन रामलीलाओं का स्वरुप पूरी तरह बदल चुका है . रामलीला का मंचन पेशेवर नाटक समूहों द्वारा कराया जाता है जिनमे नई नई तकनीकों का प्रयोग किया जाता है . हनुमान जी सच में हवा में उड़ते नज़र आतें है और एल सी डी प्रोजेक्टर की मदद से परदे पर जंगल और समुद्र के दृश्यों का बहुत ही सजीव मंचन होता है ,
हर दसवीं गली में होने वाली रामलीलाएं दिल्ली में होने वाली 20 -25 बड़ी रामलीलाओं तक सिमिट के रह गयी हैं. २० फूट का छोटा सा मंच आज 200 -300 फूट के स्टेज तक जा पहुंचा है. इनका आयोजन बड़े स्तर पर होता और बड़ी बड़ी कंपनियों इन्हें प्रायोजित करती हैं. रामलीलाओं के प्रवेश द्वार पर बड़ी बड़ी कंपनियों के बेनर लगे हैं . ठेले पर मूगफली बेचने वालों की जगह मल्टी क्युसिन व्यंजनों के स्टाल लगें हैं और साथ ही बड़े बड़े झूले लगें है . पुरे मेले का सा माहोल है . रामलीला के बाहर गाड़ियों की लंबी कतार खड़ी है जिसमे बैठ कर बच्चे ये रामलीलाएं देखने आते हैं. सच कहूँ तो रामलीला का कम और मेले का आनंद ज्यादा लेते हैं. उन्हें शायद ही पता हों कि सुग्रीव कौन था और रामायण में अंगद की क्या भूमिका रही थी .
इस मेले में हर चीज़ का व्यवसायीकारण हों चुका है और यहाँ की हर चीज़ बाज़ारू जान पड़ती है . बाज़ार और मेले की इस संस्कृति में अगर कुछ खो गया है तो वह है गली मोहल्लो के लोगो की हिस्सेदारी और स्थानीय भगीदारी . अगर कुछ खो गया है तो वह है वो उत्साह जो दो तीन दशक पहले स्थानीय रामलीलाओं के आयोजन में नज़र आता था . बिना डायलाग के बानर सेना का हिस्सा बनने का वो उत्साह अब बिल्कुल नदारद है.

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