उसने कई बार
अपने बिखरे जिस्म
और रूह को समेटा
पर उनको न रास आई
उसकी ये बेहुदा हरकत
एक आख़िरी बार
तार तार किया
उसकी रूह और जिस्म को
जिसे जमा पिघले मोम संग
रख दिया नुमाइश को
अब रोज़ सूरज संग
पिघलता है,
थोड़ा मोम,
थोड़ा जिस्म,
थोड़ी रूह,
और ढेर सारी इंसानियत…
