शत्रु की मृत्यु से उपजी जय मेरा धर्म वाक्य है – Himanshu Kumar

मैं उस सभ्यता का वंशज हूं

जिसकी शुरुआत मे एक औरत की जली हुई लाश है

जो मोहनजोदडो के तालाब की आखरी सीढ़ी पर पडी है

और जो सभ्यता वर्तमान मे

एक औरत की योनी मे पत्थर भरने को राष्ट्रीय गौरव मानती है

 
मेरी सभ्यता की सारी पवित्र ऋचाओं

का जन्म अनार्य असुरों

के वध के उल्लास के क्षणों मे हुआ

मेरा धर्म युद्ध का धर्म है मेरा धर्मघोष ही जय है

जय हो जय हो जय हो

मेरा धर्मघोष अगणित शत्रुओं के  शवों के बीच से उठा है

युद्ध मे जय शत्रु की मृत्यु से उपजी जय मेरा धर्म वाक्य है

 
मेरा ईश्वर

स्वर्ण मंडित

शस्त्रधारी

विजेता

वधकर्ता
मेरी सभ्यता मे

शूद्र – श्रमिक

धनिक – श्रेष्ठ

वसुंधरा वीर भोग्या है

और वीरता

शत्रु के वध से निश्चित होती है

 
हम स्वर्ण प्रिय

भोग प्रिय

वध प्रिय
मैं वहाँ से बोल रहा हूं

जहां एक आदिवासी माँ की हत्या करने के बाद

उसके डेढ़ साल के बच्चे का हाथ काटने के बाद

हमारी सेनाए विजय उत्सव मनाती हैं

और हमारे शासक उन सेनाओं को पुरस्कृत करते  हैं

और हम अपनी सेनाओ पर गर्व करते हैं

हम लुटेरों पर गर्व करते हैं

हम हत्यारों पर गर्व करते हैं

हम शील हर्ताओं पर गर्व करते हैं

हम इन पर गर्व करने वाली अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं
जय हो जय हो जय हो

हमारी जय हो

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