बच्चों की सुरक्षा , हम सबकी जिम्मेदारी – Kishore Kha

 

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दिल्ली में पांच साल की बच्ची के साथ हुए बालात्कार की घटना के बाद पूरा देश स्तब्ध दिखाई पड़ रहा था पर अब इस घटना के विरोध में उभरा गुस्सा धीरे धीरे शांत होता दिखाई दे रहा है. दिल्ली की सड़कों पर उतरे लोग भी अपने अपने घरों और दफ्तरों में जा पहुंचे है और अख़बारों की सुर्ख़ियों में अब दूसरी ख़बरें हैं. बच्चों की सुरक्षा का सवाल एक बार फिर हाशिए पर जाता दिख रहा है. किसी भी तरह की हिंसा से सुरक्षा हर बच्चे का मूलभूत अधिकार है पर इस घटना ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि हम अपने बच्चों को सुरक्षित रखने में नाकाम रहें हैं. इस वीभत्स मामलें की बारीकियों ने मीडिया और जनता दोनों का बच्चों के साथ होने वाली हिंसा की तरफ ध्यान खींचा और लोगों की प्रतिक्रिया से ऐसा लग रहा था कि ये कोई अनोखा और इकलौता मामला हो. पर वास्तविकता यह है कि गुडिया जैसे बहुत से बच्चे और बच्चियां है जो आये दिन यौन शोषण का शिकार होते हैं पर उनकी कहानियां सामने आ ही नहीं पाती. खुद महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा किये गए सर्वे के अनुसार ५३% बच्चों को यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है. मासूम बच्चे यौन हिंसा के सबसे आसान शिकार है और वो अपराधी जो इस हिंसा को अन्जाम देते हैं वो भी इस बात को भली भांति जानते है कि बच्चे इस हिंसा का विरोध करने में सक्षम नहीं है . आखिर क्या कारण है की तमाम कानूनों और व्यवस्थाओं के बावजूद हम बच्चों की हिफाज़त करने में नाकामयाब रहें हैं.
इस नाकामयाबी के लिए कई कारक जिम्मेवार है पर उन सबमे सबसे महत्वूर्ण पुलिस का रवैया है. ऐसे मामलों में पुलिस का प्रयास रहता है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज ही ना की जाए. उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के कितने ही ऐसे आदेश हैं जिसने कहा गया है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट बिना देरी के दर्ज की जानी चाहिए पर फिर भी पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी करती रहती है. रिपोर्ट दर्ज करने से इनकार करना सीधा सीधा न्यालाय की अवमानना है पर ऐसे पुलिस अधिकारीयों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जाती. बच्चों के साथ होने वाले दुराचार के विरुद्ध संरक्षण कानून २०१२ (POCSO) के तहत बाल यौन हिंसा के हर मामले को दर्ज करना अनिवार्य है पर इस कानून का भी पालन नहीं हो रहा . अगर गुडिया के मामले को भी देखे तो पुलिस नें तीन दिन तक गुडिया की गुमशुदगी की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की और ना ही अपनी जांच पड़ताल शुरू की. अगर पुलिस ने सही समय पर रिपोर्ट दर्ज करके इस मामले की जाँच शुरू की होती तो हो सकता है कि गुडिया को इस वीभत्स अपराध से बचाया जा सकता था. बच्चों के साथ होने वाले दुराचार के विरुद्ध संरक्षण कानून २०१२ के तहत कानून की अवहेलना करने पर छह माह के लिए सजा का प्रावधान है . इसलिए ऐसे सभी पुलिसकर्मियों पर उक्त धारा के अंतर्गत केस दर्ज किया जाना चाहिए जिन्होंने दुराचार की शिकायत मिलने के बावजूद तत्काल कार्यवाही नहीं करी.
नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार हिन्दुस्तान में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता होता है और हम चालीस प्रतिशत बच्चों को भी ढूँढने में कामयाब नहीं होते. गैर सरकारी संगठन द्वारा लगभग ४०० जिलों में किये गए सर्वे के अनुसार २००८ और २०१० के बीच लगभग १,२०००० बच्चे लापता हुए. गृहमंत्रालय द्वारा शुरू की गयी ZIPNET सेवा में लापता बच्चों की सूचना दर्ज की जाती है. पुलिस समझती है कि इस वेबसाइट में सूचना दर्ज करने के बाद उनका काम खत्म हो गया और बच्चे को खोजने का काम भगवान भरोसे छोड दिया जाता है. ये बच्चे कहाँ है और इन्हें किस तरह के शोषण का सामना करना पड़ रहा होगा इसका अंदाजा आप सब लगा सकते हो.
बाल यौन दुराचार के मामलो में जरूरी है कि जाँच करने वाली अधिकारी महिला हो और उन्हें पीड़ित बच्चों से पेश आने और ऐसे मामलों से निपटने के लिए प्रशिक्षित किया जाए. पर कई मामलों में ये देखा गया है कि महिला जाँच अधिकारी को ऐसे मामलों से निपटने के लिए कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जाता. ऐसे मामलों में यह जरूरी है कि जल्द से जल्द रिपोर्ट दर्ज की जाए और सारे साक्ष्य समय पर इक्कठे किये जाए . ऐसे अधिकतर मामलों में अभियुक्त समय पर इक्कठे ना किये गए साक्ष्यों के आभाव में छूट जातें है .अक्सर वो गवाह जो महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं वो पुलिस द्वारा बनायीं गयी गवाहों की सूची से बाहर रखे जाते हैं. कई मामलों में पीड़ित बच्चियों और उनके परिवार को सुरक्षा की आवश्यकता होती है क्योंकि बेल पर छूटने के बाद आरोपी उन्हें धमकाता है .यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि हमेशा गवाह , पीड़ित और उनके परिवार कमजोर पड़ जाते हैं क्योंकि उन्हें घटना के तुरंत बाद कोई सुरक्षा प्रदान नहीं की जाती. अगर कानून की धारा १६४ के तहत पीडित बच्चे या बच्ची का बयान दर्ज करने में देरी हो जाती है, उसे सुरक्षा प्रदान नहीं की जाती तो केस प्रभावित होता है. पीड़ित बच्चे को इस दौरान नकारात्मक प्रभावों से नहीं बचाया जाये तो लाजमी है कि उसका बयान प्रभावित होगा. खासकर जब अभियुक्त परिवार का ही कोई व्यक्ति हो या वो व्यक्ति बच्चे पर प्रभाव डालने कि क्षमता रखता हो.न्यायालय का माहौल बच्चों के लिए भयावह होता है और बच्चों के बयान देने और उनके साथ होने वाली सवाल जवाब की प्रक्रिया को नकारात्मक रूप में प्रभिवित करता है. इस सन्दर्भ में न्यायधीशों और न्यालय से जुड़े और लोगों के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता है ताकि न्याय व्यवस्था को बच्चों के लिए संवेदनशील बनाया जा सके .
बाल यौन उत्पीडन के मामलों में चिकत्सीय जांच बहुत महत्वपूर्ण है पर कारगर चिकत्सीय जांच के आभाव में ऐसे मामले कमजोर पड़ जातें है. अक्सर पीड़ित व्यक्ति को यह भी नहीं बताया जाता कि उसे किस तरह के परिक्षण के लिए ले जाया जा रहा है. उन्हें बिना पर्याप्त जानकारी दिए उनसे सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए जातें है. सरकारी अस्पतालों में होने वाले चिकत्सीय परीक्षणों में निजता के सभी मानदंडो को ताक पर रख दिया जाता है. यौन प्रहारों से पीड़ित बच्चे/ बच्ची को जिस तरह की देख रेख की जरूरत है उसका बिलकुल ध्यान नहीं रखा जाता . कई बार पीड़ित व्यक्ति को बिना किसी की सहायता के दो दो घंटे डॉक्टर का इन्तजार करना पड़ता है .पीडित व्यक्ति द्वारा बताई गयी बहुत सी महत्वपुर्ण सूचनाएँ चिकत्सीय रिपोर्ट में दर्ज नहीं की जाती. रिपोर्ट में विधि विज्ञानं जाँच के लिए भेजे गए नमूनों और कपड़ो तक का जिक्र नहीं होता. दिल्ली में बच्चों और वयस्कों दोनों के साथ होने वालों बलात्कारों के मामलों को देखने के लिए संकट हस्तक्षेप केन्द्रों (CICs) की व्यवस्था करी गयी है पर इनके पास बालात्कार के आलावा यौन हिंसा से जुड़े अन्य मामलों में कोई समझ नहीं है और इनका प्रशिक्षण भी नहीं किया गया है. अधिकतर मामलों में संकट हस्तक्षेप केन्द्रों (CICs) सहकर्मी तब आते हैं जब चिकत्सीय परिक्षण पूरा हो चुका होता है. इसलिए पीड़ित बच्चे / बच्ची के साथ हुआ मामला दर्ज होने से लेकर परिक्षण होने तक बच्चे की मदद के लिए कोई नहीं होता.
समेकित बाल सरंक्षण कार्यक्रम ( ICPS) के अंतर्गत हर जिले मे बाल सुरक्षा समितियां और हर थाने में विशेष किशोर पुलिस इकाइयों की व्यवस्था अनिवार्य है पर देश के अधिकतर जिलों और थानों में या तो ये समितियां बनी ही नहीं है या उनका अस्तित्व सिर्फ कागजों तक ही सीमित है. किशोर कल्याण अधिकारी के पद के लिए अन्य अधिकारीयों को अतिरिक्त भार दे दिया गया है और उनके पास बाल सुरक्षा के मामलों से निपटने के लिए समय ही नहीं है. इसी तरह इस ईकाई में बच्चों की सहायता के लिए दो सामजिक कार्यकर्ताओं की भी व्यवस्था है पर ज्यादातर स्थानों पर वो नदारद है . जिले स्तर पर बाल कल्याण समितियां और राज्य स्तर पर बाल सरंक्षण आयोगों की भी बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक अहम् भूमिका है पर देश के कई जिलों और राज्यों में ये संस्थाएं गठित ही नहीं की गयी हैं. आज भी देश के चौदह राज्यों में बाल सुरक्षा आयोग ओर लगभग २५० जिलों में बाल कल्याण समितियों का गठन ही नहीं हुआ है. बहुत से जिलो में बाल कल्याण समितियां केवल कागजों पर है ओर ऐसे लोगों से भरी पड़ी है जिन्हें बाल अधिकारों से कोई वास्ता नहीं है.
बच्चों की सुरक्षा हम सबकी सांझी जिम्मेदारी है. बच्चों की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि कानूनों का ठीक से पालन हो और कानून के किर्यान्वन के तौर तरीके ऐसे हो कि पीड़ित बच्चों को और प्रताडना का सामना ना करना पड़े .पुलिस और न्यायपालिका का रूख बच्चों के प्रति संवेदनशील हो और मामला दर्ज होने के साथ साथ उन्हें और गवाहों को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराई जा सके ताकि ताकत और कमजोर प्रक्रिया के कारण बच्चे न्याय पाने से वंचित ना हो .जांच और न्यायिक प्रक्रिया, दोनों में मूलभूत सुधारों की जरूरत है . ऐसे ढांचागत एवं संस्थागत बदलावों की जरूरत है जिसमे बच्चों की देखभाल और सुरक्षा हो सके. आंगनवाडी और स्कूलों से लेकर बालगृहों तक बच्चों की सुरक्षा के इंतजाम हो और देखभाल और सुरक्षा के ये प्रावधान जे जे एक्ट के अनुसार हों. ऐसे सभी संस्थान , सरकारी या गैर सरकारी , जो बच्चों के साथ प्रत्यक्ष या अप्रतक्ष्य रूप में काम करते है उनके पास बाल सुरक्षा नीति हो और उसका कारगर किर्यान्वन हो. समाज के हर तबके और हिस्से को बाल सुरक्षा के प्रति जागरूक करने और प्रशिक्षत करने की आवश्यकता है ताकि वो बच्चों की सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सकें. ये भी जरूरी है कि बच्चों से इस विषय पर खुल कर बातचीत हो और उनका सशक्तिकारण हो ताकि वो अपनी सुरक्षा के लिए सचेत और सशक्त बने. हाल में ही हुई घटनाओं के मद्देनज़र यह जरूरी है कि हम स्थिति का आकलन करें और मिलकर इस तरह की घटनाओ को रोकने के लिए तुरंत सामूहिक कदम उठाये
लेखक डेवलेपमेंट प्रोफेश्नल के रूप में टेरे डेस होम्स, जर्मनी में कार्यरत हैं और पिछले कई सालों से बाल अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

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