सफेदी-काली दाढ़ियों से टपक रहा है इशरत का लहूः आशुतोष कुमार

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यह एक ऐसी सचाई है जिसका सामना करना आसान नहीं है . क्या यह मुमकिन है कि आईबी झूठी ख़ुफ़िया जानकारियाँ पुलिस को देती हो , जिसके आधार पर पुलिस झूठी मुठभेड़ों की योजना बना सके , जिसे सफ़ेद , काली और सफ़ेद-काली दाढ़ियों के इशारे पर अंजाम दिया जा सके ? 

इशरत जहां मामले में एक पुलिस अधिकारी ने इल्जाम लगाया है कि आईबी अधिकारी राजेन्द्र कुमार ने पुलिस अफसर बंजारा को ‘ मुठभेड़’ के पहले ही ये खबर दे दीथी कि सफ़ेद और काली दाढ़ियों ने ‘योजना ‘ को अपनी मंजूरी दे दी है . सीबीआई के मुताबिक़ सफ़ेद दाढी का मतलब है मोदी और काली दाढ़ी का मतलब है अमित शाह .सी बी आई ने सम्बंधित फोनवार्ताओं का मिलान कर लिया है , और वे इस इल्जाम को अपने आरोपपत्र में दाखिल करने जा रहे हैं . 
क्या ऐसा हो सकता है कि खुफिया एजेंसियां लोगों को लालच और भय से पहले अपना इन्फार्मर बना लेती हैं , उन्हें आतंकवादियों से सम्पर्क करने के लिए बाध्य करती हैं , और फिर जरूरत पड़ने पर , उन्ही ‘संपर्कों’ के आधार पर अपने ही ‘इन्फार्मरों ‘को आतंकवादी करार दे कर या तो झूठी मुठभेड़ों में मार डालती हैं या किसी और मकसद से इस्तेमाल कर लेती हैं . 
खबर है कि इशरत जहां के साथ मारे गए जावेद शेख पहले से राजेन्द्र कुमार के सम्पर्क में थे . 
आज सीबीआई भले ही गुजरात आईबी की खाल उधेड़ रही हो , लेकिन 2007 में दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार दो कश्मीरी नौजवानों ने इल्जाम लगायाथा कि उन्हें आईबी के हुक्म की तामील न करने की वजह से आतंकवाद के आरोप में फंसाया गया है .इनमें से एक इरशाद अली ने मनमोहनसिंह को चिट्ठी लिखी थी कि आईबी के लोग मुस्लिम मुहल्लों में मौलवियों को भेज कर नौजवानों को जिहाद में शामिल होने के लिए प्रेरित करते हैं , फिर उन्ही नौजवानों को पकड कर अपने इन्फार्मर बना लेते हैं , जिनका फिर वे जैसा चाहें इस्तेमाल कर सकते हैं .हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआइ ने इस मामले की जांच की थी और नौजवानों के इल्जाम सही पाए थे . 
देश भर में पकडे जा रहे मुसलमान आतंकवादी इसी प्रक्रिया में आतंकवादी बनाए जाते हैं . इस लिए अधिकतर अगर मुठभेड़ में ही न मार दिए जाएँ — किसी बड़े मकसद के लिए , जैसे इशरत के मामले में हुआ , जिसमें मकसद साफ़ तौर पर सफ़ेद दाढ़ी के लिए जनसहानुभूति पैदा करना था — तो वे सारी उम्र जेलों में सड़ाए जाने के बाद भी अंत में कोर्ट से बेदाग़ छूट जाते हैं . 
अफज़ल गुरु भी ऐसे ही एक ‘आतंकवादी’ और ‘इन्फार्मर’ थे .वे जरूर एक बार पकिस्तान हो आये थे , लेकिन ”जिहाद” के सचाई देख कर उन्होंने अगले ही बरस समर्पण कर दिया था . 
उसके बाद से वे लगातार एसआईटी के इन्फार्मर के रूपमें इस्तेमाल किये गए .इसी लिए आप कभी यह नहीं जान पायेंगे कि संसद हमले के असली अपराधी कौन थे .

निश्चिंत रहिये . न सफ़ेद दाढ़ी का कुछ बिगड़ने वाला है , न काली दाढ़ी का , न काली -सफ़ेद दाढ़ी का , न सफाचट दाढ़ी का .सब की दाढ़ियाँ एक दूसरे से उलझी हुयी हैं .

 

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