मैं वो सब नहीं जो तुम मुझको अब तक समझते रहे – Ila Joshi

मैं कोई मिट्टी नहीं,
जो रौंदी जाएगी
तुम्हारे जूतों के तले,
जिसे काटेंगे तुम्हारे ताने
बाड़ के पानी की तरह…

Ila Joshi

न हूँ मैं कोई कली,
जिसे जब चाहो तुम मसल दो
अपने बिस्तर की सिलवटों में,
या लपेट लो अपनी कलाई में
किसी गजरे की तरह…

मैं कोई आंसू नहीं,
जो बस यूँही बह जाए
एक आँख के कोने से,
या तुम्हारे दिए ज़ख्मों पर
बिख़र जाए एक मरहम की तरह…

मैं कोई चमड़ी नहीं,
जो झुलस जाऊं
जेठ की दुपहरी में,
या सर्दी में चिटकने लगूं
तुम्हारे प्याले की तरह…

मैं वो सब नहीं
जो तुम मुझको
अब तक समझते रहे,
काश ये जानने से पहले
कि मैं क्या हूँ
तुमने जाना होता
कि मैं कौन हूँ…

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