तुम…
तुम आई थी
सर्दी सी
याद है न
फिर तुम ही
बन गई थी
गुगुनी धूप
और फिर कभी
तेज़ धूप सी
पसीना छलछलाती
कभी
आफ़ताब सी
चमकती
पहली बौछार सी
गिरती-भिगोती
बिजली सी आंखों में झपकती
तुम आई थी न
फूलों के मौसम में
शाखों पर
सब्ज़ रंग पर
चटख लाल
तुम्हें याद होगा
पहाड़ के पीछे से
उगती
डूबती
गहरे समंदर में तुम
उग आती
पत्थरों पर तुम
दूब सी
हरी..हरी…हमेशा हरी
तुम
हर बार
मौसम बन के आती रहीं
तुम्हारा नाम क्या रखूं
उलझन ही रही हमेशा
पछुआ…पुरवाई
बारिश…बिजली
या वसंत
चलो पतझड़ ही पुकार लेता हूं
तुम्हारी अदा से
मेरा रंग जो उड़ जाता है
