साफ़ सुथरे शासन के लिहाफ में हिंदुत्व – किशोर

 

 

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बीजेपी द्वारा नरेन्द्र मोदी को अगले साल होने वाले राष्ट्रीय चुनावों की कमान सौपने और  प्रतिक्रिया में अडवाणी के इस्तीफे देने और थोड़े नाटक के बाद वापस लेने के साथ ही पिछले कुछ समय से चली आ रही अटकलों को विराम लगा है. मोदी को चुन के बी जे पी ने अपना नेता ही नहीं चुना बल्कि ये सन्देश दिया है कि वह २०१४ में साफ़ सुथरे शासन के लिहाफ में हिंदुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे.

एक समय मोदी और अडवाणी दोनों को बी जे पी के भीतर एक ही ख़ेमे के खिलाडियों के तौर पर जाना जाता था. बी जे पी में कोई भी प्रगतिशील राजनीति का पक्षधर तो कभी कोई नहीं रहा पर मोदी और अडवाणी दोनों को बी जे पी में घोर कट्टरपंथी ख़ेमे के तौर पर जाना जाता रहा रहा है और बाजपेयी जैसे नेताओं को नरमपंथी ख़ेमे के तौर पर. गुजरात जनसंहार के बाद बाजपेयी ने जरूर राजधर्म की आड़ में मोदी की छुपे तौर पर आलोचना करी थी पर आडवाणी ने हमेशा मोदी का समर्थन और संरक्षण किया है .

इन दोनों नेताओं की मुलाकात ७० के दशक में आपातकाल के दौरान हुई थी और तब से  लेकर २००५ तक आडवाणी मोदी का  समर्थन और संरक्षण करते आये थे. सिर्फ समर्थन ही नहीं मोदी को उंगली  पकड़ के सत्ता के गलियारों की उचाईयों तक पहुचाने में भी आडवाणी की अहम भूमिका रही है. केशुभाई पटेल और शंकर सिंह वाघेला जैसे दिग्गजों को पछाड के मोदी के गुजरात के राजनैतिक पटल पर चमकाने में भी आडवाणी की भूमिका रही है .मोदी ने भी १९९१ में आडवाणी को गांधीनगर से चुनाव जितवा के और आडवाणी की रथयात्रा को सफल बनाने में योगदान देकर अपने शिष्य धर्म  को बखूबी निभाया था .

२००५ में पाकिस्तान में आडवाणी के जिन्ना पर दिए गए बयान के बाद दोनों नेताओं  के संबंधों में दरार दिखनी शुरू हुई थी और ये मतभेद २०११ में मोदी के सदभावना उपवास के दौरान साफ़ साफ़ नज़र आने लगे. प्रश्न ये उठता है जब दोनों एक ही ख़ेमे से सम्बन्ध रखते थे तो इनका  आपस में द्वन्द कैसा? सच्चाई ये है कि पिछले कई वर्षों से गठबंधन की राजनीति  करते करते आडवाणी  के तेवर थोड़े नरम हुए है और वो अब सामजस्य की रणनीति में ज्यादा यकीन करते है.आडवाणी के शिष्य ने अपनी मजबूत और दबंग नेता कि छवि के सहारे अपने गुरु को पठ्खनी देकर अपने लिए राष्ट्रीय राजनीति का रास्ता साफ़ किया है.

कुछ लोगों को एक शिष्य की अपने गुरु के  प्रति  ये गुस्ताखी नागवार हो सकती है पर इस शिष्य ने राजनीति के ये दाव अपने गुरु से ही सीखे हैं. राजनीती में अपने रहबर को अडंगी मारकर आगे निकलने का यह खेल पहली बार नहीं खेला गया.  राजनीति के इतिहास में अवसरवादिता के ना जाने ऐसे कितने ही उदहारण मिलेंगे. हाँ इस प्रकरण ने पार्टी के आदर्शवादी और अनुशासित होने के दावों की कलई जरूर खोल दी. इस अंतर्कलह के बाहर आने से पार्टी की अनुशासित पार्टी होने की छवि की जो फजीहत हुई है वो हम सब के सामने है.  पार्टी के अहम  निर्णयों में संघ परिवार की क्या भूमिका रहती है ये और भी स्पष्ट तौर पर सामने आया है.

जिस कट्टरपंथी ख़ेमे और राजनीति का प्रतिनिधित्व मोदी और आडवाणी काफी समय से करते आ रहे थे उसके लिए एक मजबूत, दबंग और करिश्माई नेता की छवि की जरूरत है और उस भूमिका को नरेन्द्र मोदी ज्यादा बेहतर ढंग से निभा सकते हैं. ये तथ्य बी जे पी को अच्छी तरह मालूम था और इसी आधार पर ये फैसला  लिया गया है. इस फैसले के कारण पार्टी एन डी ऐ गठबधन के कई साथियों को खोएगी और पार्टी में भी कुछ उठा पठक हो सकती है. इन सब खतरों के बावजूद बी बीच जे पी ने मोदी के साथ जाने का निर्णय लिया है.

मामला मात्र आडवाणी बनाम मोदी या दो नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा का नहीं है , जैसा की मीडिया काफी समय से दिखाने की कोशिश कर रही है . मामला पार्टी की राजनैतिक दिशा का है. मुद्दा व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध का नहीं बल्कि मुद्दा ये था कि पार्टी किस तरह की राजनीति में अपना भविष्य देख रही है. मोदी को चुनावों की कमान सौपने के साथ साथ बी जे पी ने ये सन्देश भी दिया है कि वो किन मुद्दों के इर्द गिर्द चुनाव लड़ेगी और पार्टी की राजनैतिक दिशा क्या होगी. मोदी को चुनावों की कमान सौंप कर पार्टी ने तय किया है की वो अगले चुनावों में हिंद्त्व और अच्छी शासन व्यवस्था के घालमेल को मुद्दा बना के चुनाव लड़ेगी.

बी जे पी ने जरूर आकलन किया होगा की सत्ता में आने की संभावनाएं किस तरह की राजनीति में है. उसके पास एक विकल्प एन डी ऐ के सभी घटकों के साथ मिलकर महंगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार  और घोटालों जैसे मुद्दों के इर्द गिर्द चुनाव लड़ने का भी था पर उसने हिंदुत्व और शासन व्यवस्था को मुद्दा बना के चुनाव लड़ने की ठानी है. अगर बी जे पी का इतिहास देखें तो हमेशा उसने जनता के मुद्दों पर लड़ने की बजाय मंदिर मस्जिद को जनता का मुद्दा बनाने की कोशिश ही ज्यादा की है और उसे इसका फायदा भी मिला है .

पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस की सरकार कई घोटालों में फंसी और उसकी नीतियां बहुसंख्यक आवाम के हक में नहीं रही है. बी जे पी इन मुद्दों को लेकर आवाम को गोलबंद करके ऐसी कोई कारगर राजनीति नहीं कर पाई जिसके चलते जनता उसे कांग्रेस के विकल्प के तौर पर चुने. सरकार के तमाम घोटालों, भ्रष्टाचार और गलत नीतियों के खिलाफ लोगों में गुस्सा है और ये गुस्सा अलग समय में लोगों ने सड़क पर उतर के दिखाया भी है .ये गुस्सा अन्ना हजारे आन्दोलन में स्पष्ट तौर पर देखने में आया था और महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने में शासन की नाकामयाबी के विरोध में भी दिखा था .ये गुस्सा और आन्दोलन राजनैतिक दृष्टि के आभाव में कोई बड़ा राजनैतिक बदलाव लाने में नाकामयाब रहा. पर एक बात स्पष्ट तौर पर सामने उभर के आई की लोग कांग्रेस की शासन व्यवस्था से नाखुश है उनमे सरकार के खिलाफ गुस्सा भरा पड़ा है . बदकिस्मती से कोई भी राजनैतिक पार्टी जनता के इस गुस्से को राजनैतिक बदलाव के लिए दिशा देने में नाकामयाब रही है . यू पी ऐ की तमाम असफलताओं के बावजूद बी जे पी समेत  कोई भी दल अपने को कांग्रेस के विकल्प के तौर पर पेश करने में सफल नहीं हुआ है .

राजनैतिक शुन्य की यह स्थिति पिछले कई वर्षों से बनी हुई है और मोदी के उभार और आडवाणी  के पतन को भी इसी राजनैतिक रिक्तता के परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए. बी जे पी को मालूम है की जनता में गुस्सा है, रोष है और आवाम विकल्प की तलाश में है.  आवाम में मौजूद गुस्सा और राजनैतिक रिक्तता की यह स्थिति दक्षिणपंथी और फासिस्ट राजनीति के लिए बहुत ही उपजाऊ ज़मीन है जिस पर कदम रख कर वह सत्ता की फसल उगा सकते हैं .फासिस्ट ताकते अक्सर ऐसे समय में धर्म की आड़ में साफ़ सुथरा शासन का वायदा करके सत्ता में काबिज होने की कोशिश करते है.

जनता अपने विकल्प खुद खोजने में सक्षम नहीं दिख रही  और कोई राजनैतिक ताक़त उन्हें दिशा देने के लिए मौजूद नहीं है .ऐसे में आवाम किसी ऐसे करिश्मे की उम्मीद करती है जो उन्हें इन तमाम मुसीबतों से निजात दिला सके. ऐसे मैं कई लोग ये भी कहते सुने जाते है इन राजनीतज्ञों से अच्छा तो सेनिक शासन आ जाये जो हमें इन भ्रष्ट राजनीतज्ञों से मुक्त कराये और शासन व्यवस्था कायम करे .

पिछले कई सालों में मीडिया की मेहरबानी के चलते मोदी की छवि एक ऐसे मजबूत हिंदुत्व समर्थक नेता के तौर पर उभरी है जो राजनैतिक नफे नुक्सान से परे सुशासन और विकास के लिए प्रतिबद्ध है. मौजूदा राजनैतक परिप्रेक्ष्य में बी जे पी ये उम्मीद कर रही है की लोग ऐसे नेता को पसंद करेंगे  और बी जे पी को सत्ता में लाएंगे.  नरेन्द्र मोदी की अच्छे शासक  और विकास के प्रति समर्पित नेता की छवि कितने तथ्यों पर आधारित है ये चर्चा का विषय हो सकता है पर बी जे पी को लगता है कि इस छवि को भुनाया जा सकता है और इसके जरिये सत्ता में काबिज हो सकते है.

नरेन्द्र मोदी के सुशासन और विकास के मॉडल की बात करे बिना ये लेख अधूरा ही रहेगा. तो आइये मोदी शासन के इन दावों की भी चर्चा की जाए. नरेन्द्र मोदी का जिक्र अक्सर आर्थिक विकास के लिए किया जाता है .भारत ने पिछले दो दशकों में मोदी के बिना भी ६-१० % की दर से विकास किया है इसलिए गुजरात में हुआ आर्थिक विकास कोई करिश्मा नहीं है .पर विश्लेषण का विषय यह है कि इस विकास का कितना लाभ देश की आम जनता को मिला है. देश के विकास की तरह ही गुजरात का आर्थिक विकास भी समेकित नहीं रहा है और उसका लाभ आम जनता तक नहीं पहुँच पाया है . गुजरात के ४८ % बच्चे आज भी कुपोषण के शिकार है और लगभग औरतों की आधी आबादी  खून की कमी का  शिकार  है. ध्यान रहे ये आंकड़े देश के औसत आंकडो से कहीं ज्यादा है. और जब मोदी से सवाल पुछा गया कि गुजरात में क्यों इतना कुपोषण है तो उनका जवाब था की लड़कियां अपना फिगर बंनाने के लिए कम खाती हैं और उनके कुपोषण का कारण उनकी अज्ञानता है. किसानो द्वारा आत्महत्या के मामले में गुजरात  सबसे ज्यदा आत्महत्या करने वाले राज्यों में से एक  है और एक अखबार की माने तो गुजरात में प्रतिदिन १० किसान आत्महत्या करते हैं. गुजरात जनसंहार में राज्य कि क्या भूमिका रही थी इसकी चर्चा बहुत हो चुकी है . इसके आलावा और भी ऐसे कई तथ्य हैं जो मोदी के सुशासन की पोल खोलते हैं पर यहाँ मैं उनकी चर्चा नहीं कर रहा. ये चंद आंकड़े इसलिए पेश कर रहां हूँ की मोदी के सुशासन की सच्चाई सामने आ सके जिसके लिए उसे देश के मुखिया के तौर पर  पेश किया जा रहा है .

भारत की आवाम ने अलग अलग चुनावों में अपने निर्णय लेने की क्षमता और दूरंदेशिता के बल पर कई चुनावों में कई विशेषज्ञों को चोकाया है . धरमनिर्पेक्षता भारत की आवाम के मूल्यों में कूट कूट के भरी पड़ी है. बी जे पी ने यह सब जानते हुए भी यह जुआ खेला है क्योंकि सत्ता में आने का उसके पास ये आखरी रास्ता था .पर बी जे पी का ये दाव कितना कारगर होगा ये तो अगले चुनाव ही बताएँगे……….किशोर

 

 

 

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