
आप बात बात में ओह फ़क कहेंगे…आप नेताओं को गाली देंगे…धर्म या अंध आस्था के खिलाफ़ कुछ बी लिखने वालों को कभी सार्वजनिक वॉल पर तो कभी चैट पर गंदी गंदी गालियों से नवाजेंगे…आप धर्म के नाम पर मानव बलि को जायज़ ठहराएंगे…आप समानता के विचार को खारिज करेंगे…लेकिन हां आप राखी सावंत को देखेंगे…चिकनी चमेली पर नाचेंगे…छुप कर पोर्न भी देखेंगे…रेपिस्ट मानसिकता के साथ खड़े होंगे…आप महिलाओं को देवी बनाना चाहेंगे…लेकिन उसे एक इंसान नहीं बनने देंगे…पुरुष गाली देगा तो वो चलन में है…भड़ास है…लेकिन आप नैतिकता की बात करते रहेंगे…और जब कोई स्त्री ऐसे में खड़े होकर चिल्ला देगी….
FUCK YOUR MORALS….
तो आपकी पतलूनें गीली हो जाएंगी…आप को लगेगा…अरे हमारी सत्ता को चुनौती…मॉरल्स…नैतिकता हमने तय की है…कैसे कोई स्त्री, जिसे हमारी जंघा पर या हमारी शरण में होना था…(दोनों आपके लिए एक ही बात है) वो हमारे नियमों को तोड़ेगी…हम रेप करेंगे…लेकिन वो अपनी मर्ज़ी से कैसे संभोग करेगी…हम उसे छेड़ेंगे…लेकिन कैसे वो प्रेम करेगी स्वतःस्फूर्त भाव से…और हम उसे चरित्रहीन कह देंगे…नीच कहेंगे…संस्कारहीन कहेंगे…
आप सब के लिए…आपके चरित्रहीन सामंती समाज के लिए…आपकी धन-देह-सत्ता लिप्सा के लिए…फिर से दोहरा रहा हूं…दोहरा रहे हैं…दोहराता रहूंगा…दोहराते रहेंगे…
FUCK YOUR MORALS
आपको सड़क पर खड़े होकर पेशाब करने में शर्म नहीं आती…
आपको सार्वजनिक स्थलों पर अपने गुप्तांग खुजलाने में असहज नहीं लगता…
आपको कभी भी कहीं भी बहन**, मादर**, भो** के कहना अश्लील नहीं लगता…
आपको मेट्रो, बसों, सड़कों पर महिलाओं को बलात्कारी नज़रों से घूरना ग़लत नहीं लगता…
आपको ज़ोर ज़ोर से अश्लील गाने बजाना ख़राब नहीं समझ आता…
आपको सिनेमा हॉल में किसिंग या इंटीमेट सीन पर चिल्ला कर टिप्पणी करना बहुत सुहाता है…
लेकिन कोई महिला अगर ऐसा (अरे बाप रे…बहुत बड़ी बात हो जाएगी) करे…या फिर छोटे कपड़े ही पहन ले…या कोई गाली बक दे…या बोल्ड हो जाए…तो आपके संस्कार जाग जाते हैं…
ये संस्कार नहीं हैं…ये वो सड़ांध है, जो आपने खुद अपने अंदर पैदा की है…कि ये तो शिकार है…ये निशाना कैसे साध सकती है…शिकारी तो हम हैं…
आपको पता है, आप सब धर्म और संस्कृति का झंडा लिए अधर्म और अपसंस्कृति के जीवाणु हैं…आप का एक ही इलाज है…आपकी बातों का उल्टा करना…एंटीबायोटिक्स देना…आप की बीमारियां ठीक हो जाएंगी…यकीन मानिए…
एक और बात जो रह गई….’भाड़ में जाइए…’
प्रकृति के यौवन का श्रृंगार, करेंगे कभी न बासी फूल
मिलेंगे जा कर वे अतिशीघ्र, आह उत्सुक है उन को धूल