कुछ इंसान था – Mayank Saxena

Mayank Saxena
Mayank Saxena

देवताओं से भरी थी पगडंडियां
जहां धरो कदम
पांव के नीचे आ जाता था
एक न एक
उन्हीं से बचते हुए
चाहता था चलना
उन्हीं में फंस कर
लड़खड़ा कर गिर पड़ता था
मुंह के बल
और वो जड़ रहते थे
उनके बीच कहीं कहीं
कुछ इंसान था
जो टूट गए देवताओं को
हटा कर
रास्ते में रख देते थे
नए देवता टूटने के लिए
वो जानते थे
जब राह में बिखरे हों
इतने देवता
तो फंसेगा पांव
लड़खड़ाएगा इंसान
झुक कर आ गिरेगा
इन्हीं के आगे
और ये जड़ देवता
महिमामंडित हो जाएंगे
पैरों में आ गिरे
मुसीबत के मारों की गिनती से
बचते चलना है बिना गिरे
तो सुनो
बीनते चलो रास्ते से
एक एक देवता
हटाते चलो राह से
बढ़ते रहो
गिरोगे भी तो इंसान सा
भक्त सा तो नहीं

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