आज किसी से बात करते हुए मुझे दादी की एक बात याद आई। वो अकसर कहा करती थीं कि लड़की को पानी की तरह होना चाहिए। जिस बर्तन में डालो उसी का आकार ले ले।
मेरी मां कॉमरेड नहीं थीं। जयगुरूदेव का भक्त था उनका परिवार। शादी कॉमरेड से हो गई तो लेनिन-मार्क्स की होकर रह गईं। मैं अकसर पापा से पूछती थी कि अगर इसका उल्टा हुआ होता यानी मां कॉमरेड होतीं और आप जयगुरूदेव के भक्त तो क्या आप कॉमरेड हो जाते या बेचारी कॉमरेड औरत को जयगुरूदेव की पूजा करनी पड़ती। बहुत खोदने पर वो यही कह पाते कि उस जमाने की दुनिया और तरीके थे, तुम्हारी मां को ही बदलना पड़ता। वही बात कि लड़की को पानी की तरह होना चाहिए।
लेकिन मैं पानी की तरह नहीं हूं। बिलकुल नहीं। मैं ठोस पत्थर हूं। बर्तन टूट जाएगा, लेकिन मेरा आकार बदलने से रहा। मुझे ठोंक-पीटकर तोड़ने की कोशिश करोगे तो मैं मैं ही नही रहूंगी। टूट जाऊंगी, लेकिन तुम्हारे बर्तन के आकार की नहीं होऊंगी। मैंने एक लड़के को इसलिए जिंदगी से आउट कहा कि खुद दूसरी जाति की लड़की के साथ अफेयर करने के बावजूद अपनी बहन के अफेयर की बात खुलने पर पानी उसने पूरे घर के सामने उसे एक थप्पड़ मारा था। मेरी एक दोस्त ने अपने एक ब्वॉयफ्रेंड को इसलिए जिंदगी से आउट किया क्योंकि खुद एक्स रिलेशन में होने के बावजूद वो लड़की के एक्स रिश्ते की बात पर वॉयलेंट हो जाता था। मिरांडा हाउस में पढ़ने वाली एक दोस्त उन सारे मूर्ख परामर्शदाताओं को अपनी जिंदगी से डिलिट कर देती थी, जो सलाह देते थे कि अपने पति और प्रेमी को अपने गुजरे प्रेम के बारे में नहीं बताना चाहिए।
ये सारी लड़कियां पानी नहीं, ठोस चट्टान हैं। हमारा अपना व्यक्तित्व है, सोच है, अपने विचार हैं। जिंदगी को जीने का अपना तरीका है। दो इंसानों के सहज और बराबरी वाले कॉम्प्रोमाइजेज की बात अलग है, लेकिन कुछ खास बातें हमसे इसलिए करवाना चाहोगे कि हम लड़की हैं तो हम तुम्हारा भूत बना देंगे।
चूल्हे में जाओ और जाकर अपनी अम्मा से बोलो कि तुम्हारे लिए पानी जैसी लड़की ढूंढ दें। हम पानी, चट्टान है
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अगर लिखने का हुनर बराबर भी हो तो आदमी और औरत कैसे लिखते हैं।
आदमी शांति से अपनी स्टडी में बंद होकर एक सिगरेट सुलगाता है, अपनी किताबों पर उंगलियां फिराता है, लिखे हुए पन्नों को उलट-पलटकर देखता है, पुराने इश्क को याद करता है, लैपटॉप खोलता है और शांति से लिखता है। उसकी स्टडी के बंद दरवाजे के भीतर कुकर की सीटी नहीं सुनाई देती, उबलते हुए दूध की महक नहीं आती, बच्चे गुल नहीं मचाते। वॉशिंग मशीन की आवाज कानों को नहीं सताती। बर्तन धुलने की खटपट नहीं होती, अखबार वाला आवाज नहीं लगाता, पुराने बिलों का हिसाब-किताब नहीं जोड़ा जाता। सास-नंदोई का फोन नहीं आता। उस स्टडी में सिर्फ आदमी रहता है, उसकी किताबें और उसके शब्द।
और एक औरत-
औरत भागते-भागते लिखती है। कुकर में दाल चढ़ाकर आती है और लिखती है। बच्चे की दूध की बोतल तैयार करते हुए लिखती है। कपड़े सुखाते हुए लिखती है, बाई को कामों की ताकीद करते हुए लिखती है, दफ्तर से लौटते हुए रोजमर्रा के जरूरी सामानों की लिस्ट बनाते हुए लिखती है। फर्नीचरों पर पड़ी धूल झाड़ते हुए लिखती है, फ्रिज में रखे स्प्राउट्स का जंगल साफ करते हुए लिखती है, बच्चे का होमवर्क कराते हुए लिखती है, सास के फोन का जवाब देते हुए लिखती है, दूधवाले, अखबार वाले के बिल का हिसाब जोड़ते हुए लिखती है। नौकरी से लौटकर आने के बाद पूरे घर को संभालकर, खिलाकर, सुलाकर लिखती है।
आदमी लिखता है क्योंकि उसे सुख-चैन है।
औरत इतनी तकलीफों के बावजूद लिखती है क्योंकि वो बेचैन है
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कभी-कभी सोचती हूं कि औरतों को बराबरी नहीं चाहिए या कि सिर्फ बराबरी नहीं चाहिए।
सबकुछ इक्वल-इक्वल नहीं। इक्वल से भी कहीं ज्यादा, और ज्यादा।
औरतों को सबकुछ ज्यादा मिलना चाहिए।
ज्यादा प्यार, ज्यादा दुलार, ज्यादा ख्याल, ज्यादा देखभाल।
मेरे एक दोस्त ही पत्नी का प्रेग्नेंसी के छह महीने बाद अबॉर्शन हो गया। वो यूं भी सेंसिटिव था, लेकिन उस दौरान उसने जिस तरह अपनी पत्नी को दर्द में तड़पते-बिलखते देखा, वो बुरी तरह डर गया। बाद में कहता था कि मुझे तो औरत होने के ख्याल से ही डर लगता है। किसी में इतना दर्द झेलने की ताकत कैसे हो सकती है। मेरी दीदी ने अपने पहले बच्चे के जन्म के बाद मुझे बताया कि बच्चे के जन्म के समय इतना दर्द होता है, इतना दर्द कि अगर उस समय कोई चाकू से गला भी रेते तो उसका दर्द महसूस नहीं होगा। सचमुच क्या इतना दर्द होता है। मुझे तो अभी तक बस यही लगता था कि पीरियड्स में ही दर्द होता है। और उसी के कारण जिंदगी में आफत हो गई है। लेकिन सिर्फ समाज ही नहीं, प्रकृति के दिए दर्द की भी कोई लिमिट नहीं है।
सिर्फ पुरुष ही क्या, मैं भी उस दर्द की सिर्फ कल्पना ही कर सकती हूं। इसलिए स्त्रियों को अपमानित करने वाले, उनके साथ बुरा सलूक करने वाले, उनके बारे में अभद्र टिप्पणियां करने वाले और उन्हें तकलीफ पहुंचाने वाले हर पुरुष को सिर्फ एक बार उस दर्द की कल्पना करनी चाहिए, जिसे सहकर किसी स्त्री ने उन्हें पैदा किया है।
हमारे देश में ये कंपलसरी कर देना चाहिए कि हर पुरुष अपनी पत्नी की डिलिवरी के समय कमरे में मौजूद रहे। उस दर्द को अपनी आंखों से देखे, चीखों को अपने कानों से सुने।
शायद अगली बार कभी पत्नी को चोट पहुंचाने से पहले वो दस बार सोचे। शायद उसे भी एहसास हो कि स्त्रियों को सबकुछ बराबर नहीं, ज्यादा चाहिए।
ज्यादा प्यार, ज्यादा दुलार, ज्यादा ख्याल, ज्यादा देखभाल।
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एक लड़की साइंटिस्ट थी। इलाहाबाद के मेहता रिसर्च इंस्टीट्यूट में। एक बड़ा प्रोजेक्ट था उसके पास। जान लगाकर काम कर रही थी। लेकिन तभी प्रेग्नेंट हो गई। वो बच्चा नहीं चाहती थी। लेकिन घर पर कोई अबॉर्शन के लिए तैयार नहीं हुआ। वो घरवालों से लड़ नहीं पाई। उसे प्रोजेक्ट छोड़ना पड़ा। साइंस में वैसे भी मेहनत बहुत ज्यादा थी और पैसे कम। जिम्मेदारियां बढ़ती चली गईं। पहला बच्चा, फिर दूसरा बच्चा। वो कभी साइंस में लौटकर नहीं गई। अब एक इंटर कॉलेज में फिजिक्स पढ़ाती है। एक दिन हम घर से बाहर अकेले मिले। मेरे कंधे पर सिर रखकर खूब रोई। कह रही थी कि मुझमें अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं थी। मैं अपने बच्चों से प्यार करती हूं, लेकिन फिर भी मेरा घर और बच्चों में बहुत ज्यादा मन नहीं लगता। सास भी कभी-कभी ताना देती है कि तुम घर-गृहस्थी ठीक से नहीं चलाती। बच्चों के प्रति लापरवाह हो। वो भी क्या करे। उसका दिल तो फिजिक्स में था। फिजिक्स छुड़वाकर उसे दो बच्चे पकड़ा दिए गए। और अब उम्मीद की जाती है कि वो इसे संसार का सबसे महान काम मानकर करे। क्यों करे। दिल नहीं लगता उसका गृहस्थी में। बस उसमें लड़ने की ताकत नहीं थी। वो विरोध नहीं कर पाई। अब सिर्फ कुढ़ती रहती है।
एक दिन कह रही थी कि मैंने वो प्रोजेक्ट पूरा किया होता तो आज मैं यूएस जा सकती थी। (उसका पति भी साइंटिस्ट है और फिलहाल यूएस में ही है।)
वो भी जाएगी यूएस। लेकिन अब साइंटिस्ट बनकर नहीं, साइंटिस्ट की बीवी और उसके दो बच्चों की मां बनकर
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अभी मैं बैठकर कुछ हिसाब लगा रही थी। हिसाब के नतीजे कुछ इस तरह हैं-
1- मेरी 34 सहेलियों ने मीडिया, कॉरपोरेट, आईआईटी और टेलीविजन सीरियल की दुनिया में 8-10 साल की नौकरी के बाद काम छोड़ दिया। नए पैदा हुए बच्चे को पालने के लिए। 34 में से 31 अब तक काम पर लौटकर नहीं गईं। बच्चे की जिम्मेदारियां कभी खत्म ही नहीं होतीं।
2- जिन लड़कियों ने बच्चा किया और नौकरी नहीं छोड़ी, वो पागल बनी फिरती हैं। जब भी मिलो, एक ही रोना। काम, काम और काम। मैं बहुत थक गई हूं सब संभालते-संभालते।
3- ऑफिस में स्मोकिंग जोन में रोज एक लड़की मिलती है। उसके दो बच्चे हैं। हमेशा थकी-थकी। एक दिन कह रही थी कि मैं डबल शिफ्ट में काम करती हूं। नौ घंटे ऑफिस में और नौ घंटे घर। बच्चों के एग्जाम्स आने वाले हैं। घर भागकर उन्हें पढ़ाना है।
4- अपने इतने सालों के कॅरियर में मैंने देखा है कि हर शादीशुदा और बच्चों वाली स्त्री जल्दी से जल्दी ऑफिस से छूटकर घर भागना चाहती है। वो कभी खुद इनीशिएटिव लेकर नहीं कहती कि नए प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी मुझे दो। मैं करूंगी। वो सुबह 7 बजे ऑफिस आने और रात 2 बजे तक काम करने को तैयार नहीं होती। घर पर बच्चा अकेला है। फैमिली को देखना है। कॅरियर जैसे चल रहा है, चलता रहे। इससे ज्यादा नहीं कर सकती।
5- मेरी एक दोस्त आईआईटी में बहुत शानदार कॅरियर छोड़कर कॉन्वेंट स्कूल में टीचर बन गई। अब उसे बच्चे के लिए ज्यादा वक्त मिलता है।
6- एक दोस्त ने नौकरी तो नहीं छोड़ी, लेकिन बाकी सब छोड़ दिया। अब कभी आउट ऑफ स्टेशन किसी सेमिनार में नही जाती। न किताब लिखती है। कई फैलोशिप्स मिलीं। इंडिया के बाहर जाना था दो-दो साल के लिए। सब रिजेक्ट कर दिया। उसने आगे बढ़ने के सारे ऑफर ठुकरा दिए हैं। बच्चा अभी छोटा है। लेकिन पति की जिंदगी पर कोई फर्क नहीं पड़ा। जनाब अभी-अभी एक साल इस्तांबुल रहकर लौटे हैं। पति का नाम है। पत्नी की पहचान खो गई।
7- मैं अपनी नौकरीपेशा बहनों को देखा है। घर, नौकरी, बच्चों के बौराई रहती हैं। फोन करो तो बात करने की भी फुरसत नहीं। अभी मैं बेटे को पढ़ा रही हूं। अभी फलां काम कर रही हूं, अभी ढिमका काम कर रही हूं। उसके काम कभी खत्म नहीं होते और उसके पास अपने लिए वक्त लिए।
ये सब क्या है? क्या मातृत्व का गौरव है? प्रेम का प्रतीक है। न्याय, समता, बराबरी का राग है। एक खूबसूरत, मानवीय संसार की झलकियां हैं। आखिर क्या है।
और जिस लड़की ने ये सब होने से इनकार किया, वो क्रूर हो गई। औरत ही नहीं है वो तो। डायन है, कुलटा है, स्वार्थी है। नए जमाने की दुष्ट, मॉडर्न लड़की है।
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