डेंगू का मच्छर शरई मच्छर है।

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डेंगू का मच्छर शरई मच्छर है। यह फज़्र और मग़रिब के वक्त काटता है, बाकी दिन नहीं काटता। बाकी दिन रोज़े रखता है। जिन लोगों की टांगें और बाज़ू नंगी हों, उनको पहले काटता है। पर्दादारों को नहीं काटता है, बुर्क़ापोश ख़वातीन को नहीं काटता है। उसकी एक वजह शायद यह भी है कि बुर्क़े के अंदर से हमेशा ख़ातून नहीं निकलतीं, मौलवी भी बरामद हो जाते हैं। मौलवी को भी नहीं काटता क्योंकि मौलवी उल्टा इसे काट लेते हैं।

मौलवी तो डेंगू का इलाज कर लेगा, लेकिन बेचारा मच्छर मौलवी का इलाज कहां से कराएगा? मौलवी का इलाज मच्छरों की मस्कीन-सी क़ौम से बहुत ताक़तवर क़ौमों ने ढूंढा है। तुर्कों ने ढूंढा, मुग़लों ने ढूंढा, अंग्रेज़ों ने ढूंढा, लेकिन नहीं मिला। सब इसी नतीजे पर पहुंचे कि मौलवी का कोई इलाज नहीं।

आखिर में तुर्क भी मौलवी हो गए, मुग़ल भी मौलवी हो गए और अंग्रेज़ भाग गए। इसी में उनकी भलाई थी, अगर यहां रह जाते तो वो भी मौलवी हो जाते। सफ़ेद टोपियां पहन लेते, इसलिए ज़रूरत से ज़्यादा किसी को नहीं छूना चाहिए।

मौलवी छूने से फैल जाते हैं। इतना फैल जाते हैं कि अपने आपका पीरों से मवाज़ना करने लगते हैं। फिर लोगों के लिए उनको छूना मजबूरी हो जाती है। पैरों पर, घुटनों पर, हथेलियों पर और अक्सर लोग हथेलियों से छूते हैं या मुंह से। मगर हथेलियों पर रुपये से छूना पड़ता है। अगर किसी मौलवी को बहुत ज़्यादा छू लिया जाए तो वो अपने लिए कोई सुनहरा लक़्ब चुन लेता है। मसलन शेख़-उल-इस्लाम, अमीर-उल-मोमिनीन वगैरह। इसके बाद वो नाम से नहीं पुकारा जाता, सिर्फ लक़्ब से।

मच्छर ऐसा नहीं करते। वो अपनी शिनाख्त नाम से ही कराते हैं। एक-दूसरे को लक़्ब नहीं देते। दे भी दें तो क्या देंगे? शेख-उल-बुखार या अमीर-उल-बवासीर को कौन मुंह लगाएगा?

डेंगू की बीमारी अक्सर लोगों में जानलेवा या मोहलिक नहीं साबित होती। कुछ रोज़ अस्पताल में गुज़ारने पड़ते हैं, टीके लगवाने पड़ते हैं, कड़वे पत्ते खाने पड़ते हैं, फिर आदमी घर आ जाता है। बुखार उतर जाता है और तवानई वापिस आने लगती है।

मौलवी की बीमारी अक्सर जानलेवा और मोहलिक साबित होती है। अस्पतालों में जाने का कोई फायदा नहीं, टीके लगवाने का कोई फायदा नहीं। टखनों से ऊंची शलवार ले आएं। मिसवाक की गठरी ले आएं। आप तो मारे गए।

डेंगू को मुहावरतन ‘कमरतोड़ बुखार’ भी बोला जाता है। यही बीमारी आदमी का गुरूर खत्म कर देती है। उसका सिर झुका देती है। आजज़ी सिखाती है। मुसलमान बनाती है।

मौलवी भी कमर तोड़ देता है, लेकिन मुहावरतन नहीं, असल में। कभी अपने वज़न से, कभी अपनी बातों के वज़न से। वाक़ई में कमर टूट जाने से कोई आजज़ी नहीं आती, अवाज़ारी आती है, आदमी लाचार हो जाता है, बेज़ार हो जाता है, खुदा से दूर हो जाता है, लोगों से भी, बल्कि लोग उससे दूर हो जाते हैं क्योंकि उसकी तो कमर टूटी पड़ी है, वो तो टस से मस नहीं हो सकता।

तो ये था हमारा आज का सबक़। प्यारे बच्चों, ये मच्छर इस मुल्क में शरियत नाफिज़ करने आया है। लोगों को पूरे कपड़े पहनाने आया है। फज़्र और मग़रिब की याद दिलाने आया है। मौलवी इनमें से कोई काम करने नहीं आया है। कोई अगर फज़्र के वक्त उठ भी जाए तो मौलवी उसको ललकार कर भगा देता है। मौलवी पर ना रहना, मच्छर की मान लो।

बस। 

हबीब फैसल पाकिस्तान के युवा मज़ाहनिगार हैं। इस्लामाबाद में रहते हैं। यह व्यंग्य उनके ब्लॉग इबलीस से उठाया गया है। 

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