पुल कागज़ों पर बने
वहीं थी क्योंकि नहर
और सड़क भी
कागज़ों पर ही
मिलती रही विधवाओं को
पेंशन
होते रहे किसान अमीर
और कभी भी
कहीं भी
भूख से नहीं मरा कोई
पूरे मुल्क में
सिर्फ कागज़ों पर ही
वो कागज़ ही थे
जहां नहीं मारी गई
कोई महिला
दलित
नहीं हुए दंगे
नही हुए घोटाले
नहीं हुआ इंसानियत का
बलात्कार
आप समझ रहे हैं न
कितने अहम हैं कागज़
इस नष्ट होती जाती दुनिया में
इसीलिए कागज़ बचाइए
कागज़ बचेगा तो देश बचेगा
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(29-03-2013)
हे ईश्वर, ज़िंदा दुनिया की आत्मा को शांति देना
ख़बर आई है कि
‘वो मर गई…’
हालांकि इसमें कुछ भी
अजीब नहीं है
मरना तो था ही उसको
ठीक वैसे ही
जैसे मरते हैं
सभी बूढ़े लोग एक दिन
हां….स्वाभाविक मृत्यु ही है
और वो भी
बड़े आराम से
हां…सोते में ही…
ईश्वर सबको दे ऐसी ही मौत
शांति से,
बिना तकलीफ़ के
तो कुल जमा वो मर गई
स्वाभाविक मृत्यु से
लेकिन क्या
वाकई स्वाभाविक थी ये मृत्यु
क्योंकि
मर चुकी थी वो
उससे काफी पहले
और कई बार
कई बार तो हर रोज़
कुछ बार
कुछ घंटों के अंतराल पर
तो क्या ये स्वाभाविक था
कि मरने का अभिनय करे
कोई मुर्दा?
और वो शांति की मौत
जो उसको दी
ईश्वर ने
बिना तकलीफ़
क्या नहीं चाहती थी
वो ऐसी ही ज़िंदगी भी?
ख़ैर
ख़बर ये ही है
कि ज़िंदगी भर
बर्तन धोते
रसोई में खटते
बच्चे पैदा करते-पालते
खेत में काम करते
पति से पिटते
गाली खाते
ज़बरन भोगी जाती
ढली उम्र में उपेक्षित
अकेली
बेटों से डरते
हर रोज़ मरते
वो आखिरकार
अब अपने पीछे भरा पूरा
सुखी परिवार छोड़
आखिरकार
आखिरी बार
मर गई!
कितनी किस्मतवाली थी
काश वो पहली बार में ही
मर जाती…
हे ईश्वर, ज़िंदा दुनिया की आत्मा को
शांति देना…
