(वुसतुल्लाह ख़ान के इस ब्लॉग में पाकिस्तान में बनने वाली एशिया की सबसे बड़ी हाउसिंग सोसायटी बहरिया टाउन का जिक्र है जिसके मालिक रियाज मलिक के टीवी पर एक ‘प्लांटेड इंटरव्यू’ ने पिछले दिनों पाकिस्तान में खूब सुर्खियां बटोरीं. दरअसल मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी के बेटे अरसलान इफ्तिखार पर रियाज मलिक से करोड़ों का फायदा हासिल करने के आरोप लगे हैं)
यार लानत है ऐसे पत्रकार और उसकी पत्रकारिता पर, मैं तो शर्म के मारे किसी से आंख मिलाने के काबिल नहीं रहा!
क्यों? क्या तेरा नाम भी बहरिया टाउन के लेटर हेड पर आ गया है?
नहीं आया ना ! यही तो दुख है. हर कोई तंज कर रहा है कि अबे तुम कैसे पत्रकार हो कि बत्तीस साल से छक मार रहे हो. तुम्हारे बाद इस पेशे में पैदा होने वाले मोटर साइकिल से उतर कर लेक्सस पर चढ़ गए, तीन मरले के मकान से फॉर्म हाउस में शिफ्ट कर गए, गोसिया होटल के बेंच पर चाय सुड़कते सुड़कते नादिया कॉफी शॉप में दरबार लगाने लगे, राष्ट्रपति को आसिफ और प्रधानमंत्री को गिल्लू कह कर पुकारने लगे और तुम आज भी उबेदुल्लाह अलीम के इस शेर को झंडा बना कर घूम कर हो कि:
अभी खरीद लूं दुनिया कहां की महंगी है,
मगर जमीर का सौदा बुरा सा लगता है.
साले ये भी कहते हो कि हमारी मानो तो पत्रकारिता को अच्छा अच्छा कह कर बदनाम करने से बेहतर है कि प्रेस क्लब के सामने बिरयानी का ठेला लगा हो. इतना मुनाफा तो होगा कि वेज बोर्ड भूल जाओगे.
अच्छा तो तुम फिर ऐसे ताने मारने वालों को क्या जबाव देते हो?
जवाब क्या देता हूं. बस शर्मिंदगी से गड़ जाता हूं. इससे पहले सूचना मंत्रालय से सीक्रेट फंड हासिल करने वालों की कई लिस्ट आईं, इनमें भी मेरा नाम नहीं था. लोग पूछते थे कि यार तुम वाकई पत्रकार हो या फिर हमे कार्ड दिखा कर… बना रहे हो. मैं ये कह कर टाल जाता था कि भाइयों में बड़ा पत्रकार हूं, लेकिन इतना बड़ा भी नहीं कि कोई मुझे सीक्रेट फंड की लिस्ट में डाल दे. इस लिस्ट में आने से पहले और बाद में बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं. लेकिन अब मैं लोगों को क्या जबाव दूं? तुम ही इंसाफ करो कि क्या मैं इस काबिल भी नहीं कि बहरिया टाउन की असली या जाली लिस्ट में भी मेरा नाम आ जाता??
मेरा ख्याल है कि तुमने संजीदगी से कोशिश नहीं की होगी!
उड़ाले उड़ाले तू भी मेरा मजाक उड़ा ले. जाहिर है मुझे अपने बच्चों के भविष्य की क्या परवाह. जिस स्तर की शिक्षा पीले स्कूल की लंगड़ी बेंच पर टूटी हुई खिड़की के जरिए आती है, वो पब्लिक स्कूलों के बंद एयर कंडीशंड क्लास रूम में कहां से घुसेगी. जाहिर है जो सुकून दो कमरे वाले फ्लैट में है, वो दो कनाल की कोठी में कहां और जैसी उम्दा हवा होंडा मोटर साइकल पर लगती है, वो होंडा अकॉर्ड वालों को कहां नसीब.
अबे कोशिश. मुझसे ज्यादा कोशिश किसने की होगी. एक दफा एक इंटेलिजेंस एजेंसी का सादा सा मेजर मिला. कहने लगा सर मैं आपके लेखों का प्रशंसक हूं. मैंने कहा कि अगर मैं इतना ही काबिल हूं तो फिर आप मुझे मुल्क और कौम की खिदमत करने का खास तौर से मौका दें और अपने साथ रख लें. मेरा ख्याल था कि मेजर इशारा समझ गया है और मेरी पेशकश पर खुशी से उछल पड़ेगा. लेकिन पता है, उसने क्या कहा?
खान साब, हा हा हा हा.. जितने बढ़िया आपके लेख होते हैं, उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प आपकी बातें हैं. ये कह कर वो बस हाथ मिला कर निकल लिए.
पता है मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा कब आता है?
जब लोग कहते हैं कि खान जी आपने अपनी कलम से माशा अल्लाह बहुत इज्जत कमाई है. आपके तो हजारों प्रसंशक हैं.
मियां भाड़ में जाए ऐसी इज्जत और ऐसा गरीब प्रशंसक. अगर मैं इतना ही बड़ा कलमी सर्जन हूं तो फिर कोई दो नंबर ताकतवर और पैसे वाला आदमी मुझे क्यों नहीं बुलाता. मेरा कलमी मुजरा क्यों नहीं करवाता. मेरे फिक्रे की काट पर नौलखा हार उतार कर कदमों में क्यों नहीं फेंकता. मेरी दलील के ठुमको पर प्राडो की चाबी मखमले डिब्बे में रख कर पेश क्यों नहीं कर देता. मेरे अंदाजे बयां पर इतने ही अभिभूत हैं तो मुझे सरकारी खर्चे से हज पर क्यों नहीं भिजवा देते हो.
मेरी बीवी के सामने मुझसे आखिर क्यों नहीं कहता कि बस खान साब आप चुप रहें, ये चार कनाल मैंने अपनी बहन को दिए हैं. आप बहन भाई के मामले में अपने उसूलों की टांग न अड़ाएं.
आप कहते हैं कि मैं इन पत्रकारों की निंदा करूं?
क्यों करूं भला?
भाई ये मुझ जैसे सल्फेट थोड़े ही हैं. ये बड़े लोग हैं, जीने का हुनर जानते हैं.
वुस्तुल्लाह खान पाकिस्तान के मशहूर कलमकार हैं। उनकी यह टिप्पणी बीबीसी से साभार।

शानदार ,ईमानदारी की कीमत कुछ ऐसी ही होती है ,
ग़ज़ब…