खवाब और सपना
मेरे लिए ख्वाब और सपनों में बड़ा अंतर है. ख्वाब आते हैं, हमारी मर्जी के बिना. हाँ कभी कभी हम ख्वाब लाते भी हैं लेकिन सपने तो हर पल पलते है हमारे अंदर. हम सपने तराशते हैं…मगर सपने हमारे लिए सिर्फ हम नहीं तराशते. हमको सपने बेचे भी जाते हैं. हम खरीदते भी. उम्मीद में कि शायद सपने साकार हो जायें . ख्वाब की ताबीर सिर्फ मुहावरे जैसा है. सपनों का साकार होना उम्मीद है कल के सुहाने होने की . कैसे कैसे सुहाने कल के सपने देखे जाते हैं. सपने बिकते है दाल रोटी के….सपनों का खरीदार इन्तेज़ार करके दम भी तोड़ देता है या फिर सपना छीनता है और मुजरिम करार दिया जाता है ..सपने खरीदता है राजा प्रजा को काबू में रखने और विजय पताका लहराने के. .जंग के साज़-ओ-सामन बेचने के सपने देखता है मौत का सौदागर. जलती हुई सरहदों के सपने देखता है जंगखोर. हर कोई कल के इन्तेज़ार में है. कल जब सपना साकार होगा.
यह कल क्या है. कल दो हिस्सों में बटा है.. एक कल जो बाज़ार बेचता है और दूसरा कल जो आस्था बेचती है. बाज़ार में बिकने वाले सपने हर लहम सड़क चलते घर में टी वी पर ऊंची इमारतें और शानदार मॉल की जगमगाहट में टंगे होते हैं और उतर कर हमारे वजूद में सपना बन जाते हैं.
दूसरे कल का सपना बेचते हैं बाबा , बापू , जन्नत और स्वर्ग के सौदागर , मुल्ले , कातिल तालिबानी..बन्दूक और बमों में पिरोये सपने. गेरुआ लिबाब में लिपटे सपने, अश्लील नृत्य में ईश्वर को शामिल करके बिकने वाले सपने. सपने सिर्फ इस लोक के नहीं होते. सपने बिकते हैं परलोक के भी. सपनों के बीज होते हैं…बीज बोये जाते हैं मासूम, निर्दोष दिल-ओ-दिमाग में..फसल काटते हैं सपनों के सौदागर “नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिले”…. खमीर अगर उठ जाये आस्था का सपनों में तो सपने आत्मघाती दस्ते तैयार कर देते हैं. सपने अपने दिल दिमाग के, दूसरों के दिल-ओ-दिमाग के चीथड़े उड़ा देते हैं…सपनों के टी वी चैनल चौबीस घंटे बीज बेचते हैं सपनों के. ज़लालत के साथ. बेशर्मी की तमाम हदें पार करते हुए. वही सौदागर है यह जो जिस्म के हर अंग में बेशर्मी, अश्लीलता और ज़लालत देखते हैं. मगर इनकी शर्म या बेशर्मी ढकी होती है. सफ़ेद और गेरुए कपड़ों में बाबाओं बापुओं और खुतबा ख्वान मौलानाओं की दाढियों में.
ऐसे सपने तैयार करते हैं जुर्म की दुनिया…इस दुनिया में रहते है वह जो रोटी का सपना पूरा न होने पर चंद कदम चल कर जेल में दो वक्त की रोटी तलाश लेते हैं.
दूसरी दुनिया जुर्म की बारूद के साज़-ओ-सामान लेकर तबाह करती है खुद को और उस से ज्यादा उनको जो “उन” जैसे नहीं हैं. तबाही इंसानियत की सपने खरीदने वालों के हाथों जो सिर्फ इसलिए सपने खरीद रहे होते हैं कि कल बेहतर को. दोनों कल. इस जिंदगी का कल और इस जिंदगी के बाद का कल..
सपनों पर उगने वाली फसल काटने वाले आरामगाहों में नए सपने की खरीद-फरोख्त की सपने देख रहे होते हैं.