
चम्पादक कमोड पर बैठे थे, सिगरेट अर्से पहले छोड़ दी थी सो प्रेशर बनने और क्लीयर होने दोनों में वक़्त लगता था…ताकत लगा कर पिछली रात के सारे पैकेज गिरा रहे थे, तभी अचानक फोन पर तबला और सारंगी बज उठे…जामुन (ब्लैकबेरी) हाथ में लिया सर पर दूसरा हाथ रखा…नम्बर के ऊपर नाम लिखा था…’सर’
सर यानी कि मालिक…फोन को कमोड में डाल कर पुराना पैकेज बना देना चाहते थे…लेकिन क्या करते उठाया और हैंडवॉश सा विनम्र होकर बोले…
चम्पादक – जी सर…गुडमॉर्निंग…
मालिक – काहे की गुडमॉर्निंग यार…यहां रात भर सो नहीं पाते, चिंता के मारे…तुम बता रहे हो गुडमॉर्निंग…कल रात फोन लगाते रहे…कहां थे यार..
चम्पादक – सर वो चैनल वाले चम्पादक के घर पार्टी थी…उनकी शादी को 730 दिन पूरे हो गए…
मालिक – ओह…और वो चैनल का चम्पादक कैसा है…
चम्पादक – पता नहीं सर…कल भी पार्टी में वो अपने ही घर सबसे बाद में पहुंचा…इतनी पिए था कि किसी को पहचान ही नहीं रहा था…बस बड़बड़ाता जा रहा था…योर ऑनर मैं पत्रकार हूं ही नहीं…फिर मैं भी अन्ना…मैं भी केजरीवाल…और आखिर में मैं भी आम आदमी का नारा लगा कर बेहोश हो गया…
मालिक – ओह…यही तो कमी है उसमें…रात को पीकर चम्पादक से सम्पादक बनने की एक्टिंग करने लगता है…नहीं तो उसे कब का तुम्हारी जगह बिठा दिया होता…
चम्पादक (हकलाते हुए) – जी..जी..जी..जी…क्या कह रहे हैं सर…क्या मैं ठीक काम नहीं कर रहा…
मालिक – चेतते हुए…अरे नहीं यार मैं मज़ाक कर रहा था…वैसे जो हालात हैं, लगता है आपके बारे में सोचना ही पड़ेगा…क्या है साहब चैनल सीआरपी (चीपनेस रेटिंग प्वाइंट्स) में तो ऊपर है…चार नम्बर पर रहता है…जिस हफ्ते पेमेंट लेट हो, उस हफ्ते भले ही पांच या 6 हो जाए…फिर साला डिस्ट्रीब्यूशन भी ठीक ही है अब…क्या चक्कर है…
चम्पादक – हें हें हें हें सर…लेकिन देखिए चैनल आजकल अच्छा कर रहा है…फिलिम-सिनेमा वाले प्रोग्राम अच्छा कर रहे हैं…कामेडी सर्कस के अश्लील चुटकुले सुन कर लोग लोट पोट हुए जा रहे हैं…और लादेन को अमेरिका ने भले ही मार दिया हो, हम ज़िंदा रखे हैं…चाचा साहेब की शोक सभा की भी हालत ठीक ही है…
मालिक – चैनल अच्छा कर रहा है…पर उससे हमारा क्या फ़ायदा है…ये कोई दानखाता तो है नहीं…कमपानी साहब भी कब तक पैसा लगाएंगे…बिज़नेस लाइए….
(चम्पादक को अचानक लगता है कि कमोड पर बैठे बैठे ही उनका दिमाग सुन्न हो गया है…और कमर से नीचे का हिस्सा पैरालाइज़्ड हो गया है…प्रेशर बनते बनते रुक जाता है…और एक ही वाक्य निकलता है…)
चम्पादक – अब सर कुछ दिन बिज़नेस की बात मत कीजिएगा…कम से कम महीने भर तक बिज़नेस नहीं ला सकते हम लोग…और चीआरपी मशीनें भी बंद हैं आजकल…
मालिक (भड़क कर) – अब तुम बताओगे कि क्या बात करनी है…क्या नहीं…
चम्पादक (गिड़गिड़ाते हुए) – देखिए सर…मैं आपके हाथ जोड़ता हूं…किसी हालत में किसी बिज़नेस की बात मत कीजिए…डर लगता है फोन कहीं टैप न हो रहा हो…कोई वेबसाइट वाला या फेसबुक का पागल पाइप पर चढ़कर कान न लगाए हो…जिनको अपनी थाली में खिलाया, वो ही ड्रिल मशीन लेकर खड़े हैं….
मालिक – फिलहाल तो ऐसा है कि कल एक मीटिंग में जाना है आपको…साथ में सीईओ और मार्केटिंग के एक दो लोग भी जाएंगे…
चम्पादक – सर देखिए…मुझे बिज़नेस डील से माफ़ कीजिए….
मालिक – ऐसा है…ज़्यादा सम्पादक बनने की कोशिश न करो…परभास जी गए, उनका वक्त भी गया…जाना तो पड़ेगा ही…
चम्पादक – देखिए सर…समझने की कोशिश कीजिए…आजकल केबिन से निकल वॉशरूम तक भी जाता हूं तो लोग खुसुर पुसुर करने लगते हैं कि लगता है डील करने गए हैं…बच्ची को लेकर मॉल नहीं जा पाता…फेसबुक पर भी जाने से डर लगता है…
मालिक – वो तो ठीक है…पर किसे पता कि तुम जा रहे हो…कल दी मरी डायन होटल में मीटिंग है…वैसे भी विज्ञापन ही लाने हैं…दलाली नहीं…
चम्पादक – सर होटल में तो खाना खाने…और पार्टी तक में नहीं जाते हैं हम लोग आजकल…सर लोग समझते हैं कि कुछ गड़बड़ है…
मालिक – चुप रहो यार…तुमको पहचानते ही कितने लोग हैं…
चम्पादक – सर…मैं ये नहीं कर सकता…मैं इस्तीफ़ा दे रहा हूं…
मालिक – ठीक है, एक घंटे में भेज दो…नहीं तो मैं निकाल दूंगा…
चम्पादक – जी…जी…जी सर आप तो बुरा मान गए…वो मैं तो बस ऐसे ही…जाने दीजिए…ये बताइए…मीटिंग कितने बजे है…और क्या बात करनी है वहां…और हां सर, मैं सीधे घर से ही जाऊंगा…दफ्तर के बाहर लोग निगाह रखते हैं…
(इस कहानी का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है….अगर लेना देना हो तो वो उसकी खुद की ज़िम्मेदारी है….)
Mayank Saxena is a poet, story teller and a journalist. He is not liked by many Editors/Sampadaks/Champadaks for reasons best known to CIA, KGB, RAW, ISI, Poirot and Sherlock Holmes. We take no responsibility for his writings. He is Gorbachov and Bush’s responsibility
like! a media satire on mandi culture.